हम आह भी भरते हैं तो कर दिये जाते हैं बदनाम, वो कत्ल भी कर दें तो कहते हैं चर्चा न कर” : हर दा के बोल

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“हम आह भी भरते हैं तो कर दिये जाते हैं बदनाम,
वो कत्ल भी कर दें तो कहते हैं चर्चा न कर”।।

आज #भारत की राजनैतिक स्थिति यही है, #कोरोना को लेकर यदि #विपक्ष कोई सवाल उठा रहा है तो उसको नकारात्मक बता कर उस #सुझाव का मखौल उड़ाया जा रहा है, पर कोरोना है जो थम नहीं रहा, कोरोना के खिलाफ ये तथ्य सारी दुनिया ने मान लिया है कि यदि कोई बचाव है तो वो है टीकाकरण, #टीकाकरण पर राज्य और केंद्र में एक राय क्यों नहीं बन पा रही! और मैं एक आम नागरिक के तौर पर सोचता हूँ कि किसी भी टीकाकरण पॉलिसी में जो सबसे पहली बात होनी चाहिए थी टीका उपलब्ध हो और सबको सरलता व सहजता से उपलब्ध हो, उसकी आपूर्ती एका-एक सुविचारित तरीका बने और टीका सस्ता होना चाहिए। राज्यों के बीच में टीके का बंटवारा न्यायसंगत होना चाहिए, केंद्र जिस दाम पर टीका खरीद रहा है उसी दाम पर राज्यों को भी उपलब्ध होना चाहिए और जब आप उसको प्राईवेट क्षेत्र को दे रहे हैं तो आप उसको खुली प्रतियोगिता के तौर पर कह सकते हैं, अभी ऐसा लगता है कि हम एक ऐसी धीमा मुस्ती में फंस गये है कि राज्य सरकारें किसी और देश की है और #राज्य_सरकारों को प्रतिस्पर्धा के लिए छोड़ दिया गया, यदि सब राज्य अपने-अपने तरीके से ग्लोबल बिल्डिंग में जायेंगे तो नतीजा ये होगा कि विदेशी कंपनियां धन कमायेंगी, स्वदेशी भी धन कमायेंगी और राज्य व राज्यों की जनता, आखिर केंद्र की नहीं है! जनता भारत की है, उसको ही इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। अभी ऐसा लगता है, जैसे जो नई #वैक्सीन नीति बनी है वो राज्यों को दंडित करने के लिए बनाई गई है। पहले ऐसा लग रहा था कि टीकाकरण का सारा खर्च केंद्र सरकार उठाने जा रही है, मगर यदि काम बंटना भी है, तो वो बंटवारा पारदर्शी होना चाहिए और राज्यों की स्थिति को देखकर के होना चाहिए, इस समय आवश्यकता थी कि टीके उपलब्ध होते और हम सब टीकाकरण के लिए लोगों को प्रोत्साहित कर रहे होते, यहाँ किसको प्रोत्साहित करें! जब #टीकों की उपलब्धता ही सीमित है।

#COVID19
#Uttarakhand

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