भाई जी गिंदी के मेले में 7 मौत भी माफ़! गिंदी का कौथिग पौड़ी जिले में डाडामंडी, थलनदी , चले आओ

उत्तराखण्ड लोक उत्सवों, लोक परंपराओं और लोक सांस्कृति विरासत को संजोए रखने के लिए हमेशा से जाना जाता है। यहाँ के लोक उत्सवों में देव जागृति होते हैं, तो यहां की सांस्कृतिक विरासत दुनिया के सांस्कृतिक मंचों पर पूजी जाती है। यहां के थौले-मेले यहां की संस्कृति में नये रंग भरते हुए दुनिया को अपनी ओर आकर्षि करती है।

mostbet

इन तमाम मेलों में एक मेला है उत्तराखंड के डाडामंडी में लगने वाला गिंदी मेला जो मकर संक्रांति के दिन लगता है। मकर संक्रांति जिसे गढ़वाल में मकरैण या कुछ स्थानों पर गिंदी का कौथिग, कुमाऊं में उतरैण, पंजाब में लोहड़ी और दक्षिण भारत में पोंगल नाम से मनाया जाता है। मकरैण के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। इस दिन लोग गंगा स्नान करने के लिए जाते हैं। मकर संक्रांति का कौथिग श्री कृष्ण भगवान को याद करने की खातिर लगाया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन कृष्ण भगवान ने कालिंदी नदी में कालिया नाग को मारा था और उसके बाद गेंद खेली थी।

डाडामंडी के गिंदी मेले में सात लाश यानी 07 मौत भी माफ़!
गिंदी का मेला या कौथिग पौड़ी जिले में गिंदी कौथिग के नाम से जाना जाता है डाडामंडी, थलनदी, त्योड़ो गाड़, किमसार आदि जगहों में मकर संक्रांति के दिन गिंदी कौथिग लगता है। डाडामंडी का गिंदी मेला बहुत प्रसिद्ध है। इसके अलावा थलनदी के गिंदी मेले की भी बहुत मान्यता है। देखने में यह खेल लगभग रग्बी जैसा ही होता है। फर्क इतना है कि रग्बी खेलने के कुछ नियम है, जबिक गिंदी के खेल में कोई नियम कानून नहीं चलते हैं। कहा जाता है कि डाडामंडी के गिंदी मेले गिंदी खेलते वक्त अगर सात लाश यानी 07 मौत भी हो जाएँ तो वो भी माफ़ हैं। और वहीँ थलनदी के गिंदी मेले में 5 लाश तक माफ़ मानी जाती हैं। हालाँकि अभी तक ऐसा सुनाई नहीं दिया है कि इस खेल में किसी की मौत हुई हो।

भरपूर पट्टी और लंगूर पट्टी के बीच 20 किलो की गेंद छीनने का खेल है गिंदी
डाडामंडी का गिंदी मेला भरपूर पट्टी और लंगूर पट्टी के बीच 20 किलोग्राम की लगभग 12 से 14 इंच व्यास की चपटी चमड़े की गेंद से खेला जाता है। यहां गिंदी के बारे में एक रोचक जनश्रुति है कि पौष (पूष) के महीने में स्थानीय जमेली गाँव में किसी भी कुटुंब में गाय की मौत हो जाती है। उस गाय की खाल को मोची से निकलवाकर गिंदी (गेंद) बनाई जाती है। और मकरैण से पहले उसकी पूजा की जाती है। उसके बाद भरपूर पट्टी के लोग अपनी पट्टी का झंडा लेकर ढोल दमाऊ के साथ डाडामंडी पहुँचते हैं। वहीँ लंगूर पट्टी के लोग भी गिंदी, अपनी पट्टी का झंडा और ढोल दमाऊ लेकर डाडामंडी पहुँचते हैं। उसके बाद डाडामंडी में दोनों पट्टियों से आये लोगों के बीच ढोल दमाऊ के साथ गिंदी मिलाई (रलाई) जाती है।gindi

अब यहाँ से गिंदी का खेल शुरू होता है दोनों पट्टियों के लोग गिंदी को अपने अपने क्षेत्र की ओर पहुँचाने के लिए जोर आजमाइश करते हैं। जिस पट्टी के लोग गिंदी को अपनी सीमा में लेकर चले जाते हैं उस पट्टी की जीत मानी जाती है। कहा जाता है की पहले गिंदी को अपनी पट्टी में पहुंचाने मैं 7 दिन तक लग जाते थे। डाडामंडी के गिंदी कौशिक को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आज भी वहां पहुंचते हैं डाडामंडी गिंदी कौथिग पुल के नीचे लगता है।

गिंदी के मेले की उत्पत्ति थलनदी से मानी गई है
गिंदी मेले का इतिहास देखें तो पता चलता है कि इस अद्भुत मेले का आगाज पौड़ी गढ़वाल के यम्केश्वर ब्लॉक के थलनदी से हुआ है। यहाँ डाडामंडी से भी कई वर्षों पहले से गिंदी का मेला आयोजित किया जाता आ रहा है। आज भी यम्केश्वर ब्लॉक में कांडी गांव के नजदीक थलनदी में गिंदी का कौथिग होता है। यह मेला भी उतना ही प्रसिद्द है। यहां अजमीर पट्टी और मल्ला उदयपुर के बीच गिंदी खेली जाती है। यहां भी गिंदी खेलते वक्त 05 लाश माफ़ हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार यमकेश्वर ब्लाक के अजमीर पट्टी के नाली गांव के जमींदार की गिदोरी नाम की लड़की का विवाह उदयपुर पट्टी के कस्याली गांव में हुआ था। पारिवारिक विवाद होने पर गिदोरी घर छोड़कर थलनदी पर आ गई। उस समय यहां पर दोनों पट्टियों के गांव (नाली और कस्याली) के लोग खेती कर रहे थे। नाली गांव के लोगों को जब यह पता चला कि कि गिदोरी ससुराल छोड़कर आ रही है तो वे उसे अपने साथ ले जाने लगे। जबकि कस्याली गांव के लोग उसे वापस ससुराल ले जाने का प्रयास करने लगे। दोनों गांव के लोगों के बीच संघर्ष और छीना झपटी में गिदोरी की मौत हो गई। तब से थलनदी में दोनों पट्टियों में गेंद के लिए संघर्ष होता है। गांव गांव से लोग आज भी इस मेले को देखने थलनदी पहुँचते हैं। त्याड़ो और किमसारी में शादीशुदा और बिना शादीशुदा के बीच गिंदी खेली जाती है। इसके अलावा सतपुली के नजदीक बिलखेत (सांगुड़ा) में भी गिंदी का मेला लगता है .।

साभार इंटरनेट

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here