
देवी देवताओं की भूमि उत्तराखंड आजकल अशांत है. बेकसूरों की मौत का बढ़ता आंकड़ जहा आये दिन सड़क हादसों मे कई लोग अपनी जान गंवा रहे हैं. कुछ दिन पहले टिहरी में 31 लोगों से भरी बस सड़क से 250 मीटर गहरी खाई में गिर गई थी, जिसमें 14 से जायदा लोगों की जान चली गई थी 
. इसके बाद बीते रोज गंगोत्री हाई-वे पर एक और सड़क हादसे ने लोगों को सदमे में डाल दिया कि वो अब पहाड़ की यात्रा करे भी या नही ।
सोमवार को गंगोत्री हाई-वे पर संगलाई गांव के पास ट्रेवलर वाहन पर मलबा गिरने से वह अनियंत्रित होकर गहरी खाई में गिर गया गया, जिसकी वजह से 13 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो बच्चियां इस हादसे में घायल हो गई थीं. एक बच्ची ने अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया. मतलब 14 लोग यहा भी मौत के काल मे समा गए ये सभी मृतक भंकोली गांव के निवासी थे.
इस दुर्घटना ने एक ही परिवार के तीन बेटों की जान ले ली. हादसे के बाद असी गंगा घाटी में मातम पसर गया. चारों तरफ चीख पुकारी मचने लगी. मृतकों के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था. घटनास्थल के हालात देखकर लग रहा था कि चंद मिनट में सबकुछ खत्म हो गया.
उससे पहले पौड़ी सड़क हादसे ने मे 10 बच्चों समेत 48 लोगो की मौत हो गई थी 
आपको तो मालूम ही है कि अभी एक महीने पहले भी पौड़ी जिले के बमणसैंण-धुमाकोट मार्ग पर बस हादसे में 48 लोगों की मौत हो गई थी. मृतकों में शामिल 11 लोग एक ही गांव के थे. बस मालिक और चालक भी हादसे में मारे गए थे. इस हादसे में भी कई परिवारों के चिराग बुझ गये थे तो कई परिवार ही खत्म हो गये थे. 
उत्तराखंड राज्य मे साल 2013 से ही भारी बारिश और दरकते पहाड़, खिसकती जमीन, टूटती सड़के, ओर भूस्खलन की घटनाएं , ओर फटते बादल की ख़बर आती है ।और दुःखद ख़बर किसी ना किसी गाँव से लोगो के मौत की ख़बर भी मिल ही जाती है ।
सच तो ये है कि अब कुछ लोग पहाड़ आने के नाम से भी डरने लगे है और उससे बड़ा सच ये है कि यहा सरकारे जिसकी भी रही हो या आज है हर सरकारे आपदा के लिहाज से हमेशा चोकनी रही फिर पिछली हरीश रावत सरकार की बात ही या आज त्रिवेन्द्र रावत की ।वो बात अलग है कि राजनीति के चलते ये दोनों राजनीतिक दल एक दूसरे पर समय समय पर आरोप लगाते रहे।
पर सवाल इस बात का है कि विकास के नाम पर पहाड़ों मैं जो संतुलित विकास नही हो पा रहा है वो चिंता की बात है । आपको मालूम ही है कि पहाड़ लगातार खोखला होता जा रहा है पहाड़ो मे बारिश होना, मिट्टी का कटाव और भूस्खलन होना आम बात हो सकती है
पर हमारी प्रकति अपना जो स्वरूप बदल रही है ये चिंता की बात है . बहराल हम तो यही कहेंगे कि पहाड़ से लेकर मैदान तक सन्तुलित विकास हो, अधिक से अधिक पेड़ो को लगाकर उनकी रक्षा कम से कम तीन साल तक कि जाए, जो भी नीतियां पहाड़ के विकास के लिए बने वो भविष्य को देखते हुए बनाई जाए मतलब दीर्घकालिक योजनाएं , किसी भी तरह पहाड़ के लोगो को पहाड़ से पलायन करने से रोका जा सके । जगलो पर गाँव वालों को अधिकार दिया जाए , चीड़ , बाज़ , बुरांस देवदार ,गुइराल , विमल , जैसे पेड़ो का संरक्षण किया जाए इनका उचित प्रयोग किया जाए क्योकि कही हानि होगी तो लाभ भी अवश्य होगा इन्ही से । राज्य के अफसर सचिवालय छोड़ कर ग्राउंड जीरो पर जाकर वहां के अनुकूल योजनाएं बनाये , ओर हर काम मे स्थानीय लोगो की भूमिका को फिक्स किया जाए । पहाड़ के बुजर्गो की सलहा उनके अनुभव को दरकिनार ना किया जाए । पहाड़ के अनुसार ही वह की सड़कों को गुडवत्ता के साथ बनाया जाए तो हम समझते है कि समय रहते हम सभल जायगे तो हम ही सुरक्षित रहेगे वरना ये प्रकति है जनाब इनके आगे फिर किसी की नही चलती
इसलिए सरकार के साथ साथ हम सबको अब जागने की जरूरत है ।अब आज की लापरवहाई हम्हे आगे बड़े जख्म दे सकती है इसलिए हम सब को मिलकर सोचना होगा कि अब प्रकति के साथ कोई भी असंतुलित खिलवाड़ ना हो ।






