

अपनी फेसबुक पर कुलदीप राणा आजाद नरेन्द्र सिंह नेगी की लोकसंस्कृति के संरक्षण में अमूल्य भागीदारी की बात करते हुए उन्हें पद्म पुरस्कार न दिये जाने पर सवाल खड़े करते हैं। वहीं कैलाश बिष्ट लिखते हैं कि 26 जनवरी पर उत्तराखंड की झांकी के साथ नरेन्द्र सिंह नेगी के गीत तो खूब गाये जाते हैं लेकिन जब किसी सम्मान की बात आती है तो नेगी जी का नाम दूर दूर तक नजर नहीं आता ऐसा क्यों? अशोक चैधरी लिखते हैं कि नेगी जी ने हमेशा ईमानदारी से लोकसंगीत के लिये काम किया है। कभी सत्ता की चापलूसी और गुलामी नहीं की है। सत्ताधीशों ने जहां गलत किया वहां जमकर अपने गीतों द्वारा उन्हें बेनकाब किया। नेगी जी को जनता सम्मान देती है। ऐसे ही कई और कमेंट हैं जिसमें लोग नरेन्द्र सिंह नेगी को पद्म सम्मान न दिये जाने पर सवाल खड़ा करते हैं। नेगी जी के प्रशंसक उन्हें सम्मान न दिये जाने पर खुलकर अपनी पीड़ा जाहिर कर रहे हैं।
नरेंद्र सिंह नेगी पौड़ी के रहने वाले हैं। लोक गायन में उनकी अपनी विशिष्ट पहचान है। उनके लोकगीत में उत्तराखंड का समाज पिछले चार दशक से मंत्रमुग्ध रहा है। नेगीजी के टिहरी डूबने पर लिखा गीत टिहरी डुबण लग्यू च, पर्यावरण पर लिखा ना काटा तौं डाल्यूं, जिदेरी घसेरी बोल्यूं मान, प्रकृति का डांडी काठ्यों का मुलक जैली, स्मृति यादों को आधार बनाकर लिखा, तुम्हरी खुद मा, सौण का मैना ब्वे कनुकै रैण, अपनी थाती को लेकर लिखा गीत वीरों गढ़ो कू देश, मेले कौथिक को लेकर मेला खौलो मां जैसे गीत लोगों की जुबान पर है। उन्होंने उत्तराखंड की लोक परंपरा जीवन ऋतु, त्यौहार, सुख-दुख, उल्लास, सैन्य परंपरा हर भाव के गीत रचे और गाए। उत्तराखंड आंदोलन में जनमानस ने उनके गीत प्रभात फेरियों में गाए। रेखा धस्माना के साथ गाए युगल नयु नयु ब्यो च की अलग लहक है तो अनुराधा निराला के साथ गाए खुद कैसेट के गीत सदाबहार हैं मन को छूते हैं। एक समय रेडियो में सुने जाते थे। फिर लोक सांस्कृतकि मंचों में उनके आयोजन की धूम रही।For IOS and IPAD browsers, Install PWA using add to home screen in ios safari browser or add to dock option in macos safari browser