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उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने इंदिरा हृदयेश के निधन पर दुःख व्यक्त किया है। उन्होंने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए यह शब्दाजंलि भेंट की है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य के निर्माण का ऐलान हो चुका था और 5 अक्टूबर 2000 को मैं समाजवादी पार्टी से त्यागपत्र दे कर दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय में  अम्बिका सोनी  अजीत जोगी व प्रकाश जायसवाल के साथ प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस में शामिल होने का ऐलान करके बाहर आया ही था कि मोबाइल की घण्टी बजी और मैंने फोन उठाया तो डांटने के अंदाज़ में आवाज़ आयी कि अरे भाई कांग्रेस में शामिल हो रहे हो और हमको खबर भी नहीं, मैनें इंदिरा हृदयेश जी की कड़कती आवाज़ को पहचान लिया था सो मैंने प्रणाम किया और वे आदेशात्मक अंदाज़ में बोलीं मैं यूपी निवास में हूँ मिल कर जाना और मैं उनसे मिला तो वे बहुत खुश हुईं और कहा ये कांग्रेस है बहुगुणा जी की या तुम्हारे मुलायम सिंह की पार्टी नहीं जरा संभल के रहना।
दो विधायकों के विधायक दल की नेता से राज्य की सबसे ताकतवर मंत्री:
राज्य निर्माण के बाद उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष का बहुत ड्रामा चला, इंदिरा जी अध्यक्ष बनते बनते रह गईं और कुछ दिन बाद वे दो विधायकों वाले विधायक दल की नेता बन गईं। जब वे दिल्ली से देहरादून पहुंची तो हमने उनका जबरदस्त स्वागत समारोह किया द्रोण होटल में। वे समारोह के बाद बोलीं क्या फर्क पड़ता है एमएलए दो हों या दस अरे सीएलपी तो सीएलपी होता है। और तब से लेकर राज्य में पहले चुनाव होने तक वे पूरी तरह से सक्रिय रहीं और पहली निर्वाचित सरकार में एनडी तिवारी जी की सरकार में वे सबसे ताकतवर मंत्री के रूप में पूरे पांच साल रही। तिवारी जी सदन में बहुत कम आते थे उनकी जगह डॉक्टर इंदिरा हृदयेश ही सदन में नेता के रूप में फ्लोर मैनेजमेंट से लेकर सदन की कार्यवाही सब कुछ चलाती थीं।

2007 का चुनाव हार गईं इंदिरा जी
1974 में उत्तरप्रदेश की शिक्षक राजनीति से यूपी के उच्च सदन में शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित होने के बाद डॉक्टर इंदिरा हृदयेश ने हार का मुंह केवल एक बार देखा वो भी उत्तराखंड बनने के बाद दूसरे विधानसभा चुनाव में 2007 में। अपने निर्वाचन क्षेत्र में बेतहाशा विकास कार्य करवाने के बावजूद वे हल्द्वानी से चुनाव हार गईं लेकिन उनकी हार के बाद हल्द्वानी के लोगों ने पांच सालों में यह एहसास कर लिया कि उनका निर्णय गलत था और 2012 में उन्होंने अपनी गलती सुधारते हुए फिर इंदिरा जी को भारी मतों से जिता दिया और फिर पांच साल तक इंदिरा जी बहुगुणा सरकार और फिर हरीश रावत सरकार में मंत्री रहीं पूरे पांच साल और फिर जब 2017 में चौथी विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय समेत अनेक मंत्री हार गए हल्द्वानी की जनता ने इस बार 2007 की गलती नहीं दोहराई और उन्होंने इंदिरा जी को आराम से जिता कर विधानसभा पहुंचा दिया और वे 11 विधायकों वाले विधायक दल की नेता यानी नेता प्रतिपक्ष बन गईं।

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पक्ष विपक्ष सब करते थे सम्मान
इंदिरा जी उम्र में तजुर्बे में और सियासत में तीनों में राज्य में सबसे वरिष्ठ थीं। अपार ज्ञान, अदभुत प्रशासनिक क्षमता , हमेशा गरिमा व मर्यादा का पालन करना ये उनके व्यक्तित्व के मुख्य अंश थे । वे कभी हल्की बात नहीं करती थी और कड़वा सच बोलने में भी नहीं चूकती थी। उनके वरिष्ठता और तजुर्बे का पक्ष विपक्ष के नेता इतना ख्याल रखते थे कि वे तिवारी जी और खंडूरी जी को छोड़ कर सभी मुख्यमंत्रीयों को उनके पहले नाम से ही संबोधित कर बुला लेती थी और कभी कभार डांट डपट वाले अंदाज़ में भी बोल देती थी जिसका कभी कोई बुरा नहीं मानता था क्योंकि सब को मालूम रहता था कि उसमें उनका कोई पूर्वाग्रह नहीं है। एक संस्मरण इस संबंध में पूर्व सीएम विजय बहुगुणा के साथ का है जब वे कांग्रेस के सीएम थे और इंदिरा जी मंत्री थीं उनके साथ , सीएम आवास में में भी दोनों के साथ मौजूद था , किसी विषय पर थोड़ी गरमा गरम बहस हो गयी तो इंदिरा जी बोली सुनिए विजय जी आपके पिताजी के साथ काम किया है और बहुत सीखा है उनसे इसलिए मुझे मत समझाइए इस पर विजय बहुगुणा जी आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ गए और बोले यस मैडम यू आर राइट और फिर माहौल एकदम सहज हो गया।
परसों हल्द्वानी जाते हुए और कल शाम अंतिम बार मेरी बात हुई इंदिरा जी से:
11 जून को करीब दोपहर एक बजे मैंने फोन किया तो दीदी बोली अभी प्रदर्शन से फ्री हो कर दिल्ली निकल पड़े हैं ,तुमको तो पता है मीटिंग है वहां , फिर बोली कैसा रहा गढ़वाल में कितनी जगह हुआ , यहां तो पूरे कुमाऊं में हुआ प्रदर्शन, लोगों में बड़ा आक्रोश है जो अब दिख रहा है। जब तक नेटवर्क गायब नहीं हुआ दीदी सवाल दागती रही और मैं जवाब देता रहा। मेरे एक प्रश्न पर उनके चार पांच काउंटर सवाल आते थे। लेकिन उत्साहित थीं और उत्तराखंड में वापसी के लिए उत्सुक भी थीं और आश्वस्त भी थीं लेकिन जो उनकी शंकाएं थी उन पर जरूर बोलती थीं और एक टीचर की तरह सुधार के लिए जरूरी नसीहत भी देती थीं

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कल शाम इंदिरा जी को फोन किया तो बोली अरे भई अब समय नहीं रहा तुम लोग तैयारी ठीक से करो। फिर बोली परिवर्तन यात्रा तय हो रही है तुम जरा अध्यक्ष जी के साथ बैठ कर चर्चा करो। ये अंतिम संवाद था मेरा कल उनके साथ।
वे मेरे लिए व्यक्तिगत रूप में नेता से ज्यादा एक मातृत्व वाली संरक्षक थीं बहुत सारी बातें वे मुझसे साझा कर लेती थी , बहुत स्नेह भी करती थीं और विश्वास भी। उनका जाना कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत बड़ा नुकसान है राज्य के लिए भी अपूरणीय क्षति और मेरे लिए तो व्यक्तिगत हानि है। किंतु “हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ “। इसलिए ईश्वर की इच्छा मानते हुए दिवंगत आत्मा को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए यह शब्दाजंलि भेंट कर रहा हूँ।

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