वरिष्ठों को दरकिनार कर युवा को तरजीह,अनिल बलूनी जाएंगे राज्यसभा

बीजेपी में राज्यसभा टिकट को लेकर चल रहा सस्पेंस अब खत्म हो गया है। केंद्रीय नेतृत्व ने अनिल बलूनी के नाम पर मुहर लगा दी है। जिसका अब औपचारिक ऐलान होना बाकी है। लंबे वक्त से राज्यसभा सीट के दावेदारी को लेकर केंद्रीय नेतृत्व पर काफी दबाव था और आधा दर्जन दावेदार अपनी ज़मीन तैयार करने की जुगत में जुटे हुए थे। लेकिन पार्टी ने अनिल बलूनी के नाम पर आखिरी फैसला ले लिया है।

 

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आपको बता दें कि उत्तराखंड में राज्यसभा की कुल तीन सीटें हैं। इनमें से एक सीट आगामी दो अप्रैल को रिक्त हो रही हैं। इस दिन कांग्रेस के महेंद्र सिंह माहरा का कार्यकाल पूर्ण हो रहा है प्रदेश से लेकर केंद्र तक कई वरिष्ठ नेताओं ने अपनी दावेदारी के लिए पूरी ताकत झोंक रखी थी। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट, राष्ट्रीय सचिव तीरथ सिंह रावत, राज्य आंदोलनकारी सुशीला बलूनी, उद्योगपति अनिल गोयल के शामिल थे। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की 70 में से 57 सीटों पर जीत हासिल की, लेकिन एक पार्टी विधायक मगनलाल शाह का पिछले दिनों निधन हो गया। फिलहाल यह सीट रिक्त है। इस लिहाज से इस राज्यसभा चुनाव में 69 विधायक ही अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। कांग्रेस के पास कुल 11 विधायक हैं, जबकि दो विधायक निर्दलीय हैं।

अनिल बलूनी पार्टी के उम्मीदों पर खरे उतरते रहे हैं। उन्होंने अपनी काबिलियत और अपने काम के दम पर भाजपा में बड़ा मुकाम हासिल किया। उनकी काबिलयत का अंदाजा पार्टी को था।जिस वजह से उनको पहले राष्ट्रीय प्रवक्ता और फिर राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी जैसा जिम्मेदार पद दिया गया। आपको बता दें कि पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान अनिल बलूनी छात्र राजनीति में सक्रिय थे और दिल्ली में संघ परिवार के संपर्क में रहते थे। वहीं संघ के जाने-माने नेता सुंदर सिंह भंडारी उनसे प्रभावित हुए। जब सुंदर सिंह भंडारी को बिहार का राज्यपाल बनाया गया तो वे अनिल बलूनी को अपना ओएसडी (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) बनाकर अपने साथ पटना ले गए।

बिहार के बाद जब सुन्दर सिंह भंडारी को गांधीनगर भेजा गया तो वे भी गांधीनगर जा पहुंचे.2002 में वे देहरादून लौट आए.2002 में उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव हुए और अनिल बलूनी ने भी कोटद्वार से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन उनका पर्चा मामूली चूक की वजह से रद्द कर दिया।

 

वे मामले को हाईकोर्ट लेकर गए और हाईकोर्ट ने कांग्रेस के विजयी उम्मीदवार सुरेन्द्र सिंह नेगी का निर्वाचन रद्द कर दिया था। कुछ लोगों का कहना है कि ये पर्चा रद्द नहीं हुआ करवाया गया था और इसके पीछे उस वक्त के बीजेपी के कद्दावर नेता बीसी खंडूरी का हाथ था। 2017 में विधानसभा चुनावों से पहले और परिणाम आने के बाद अनिल बलूनी को भी सीएम पद का तगड़ा दावेदार माना गया। हालाँकि तब बाजी त्रिवेंद्र के हाथ लगी थी लेकिन इस बार अनिल बलूनी की किस्मत और काबिलियत दोनों  साथ हैं।

 

केन्द्रीय मंत्रिमंडल में उत्तराखंड के हिस्से सिर्फ एकमात्र राज्यमंत्री का पद ही आया है. यदि 2019 से पहले केंद्र में मंत्रिमंडल विस्तार होता है तो बाकी अन्य के साथ बलूनी भी मजबूत दावेदार होंगे.

 

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