
दून वैली को भूकंप का बड़ा झटका हिला सकता है। इस इलाके में 8 से भी ज्यादा तीव्रता का भूकंप आ सकता है। यह दावा देश के छह नामी संस्थानों के आठ वैज्ञानिकों ने किया है। इस संबंध में उनका शोध पत्र अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘अर्थ एंड प्लेटनरी साइंस लैटर्स’ में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ है।
वैज्ञानिकों का दावा है कि वर्ष 1505 के बाद से कोई बड़ा भूकंप हिमालयन परिक्षेत्र में नहीं आया। भारतीय और तिब्बतन प्लेट आपस में जुड़ने से भूगर्भीय हलचल तेज हो गई है। इस वजह से हर साल करीब 18 मिलीमीटर प्लेट खिसक रही है और भारी ऊर्जा संचित हो रही है।
इन भूकंप जैसे हो सकते हैं हालात
वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड में 28 जीपीएस स्टेशनों पर पांच साल तक शोध के आधार पर यह विश्लेषण किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस लंबे अंतराल ने 8 की तीव्रता के भूकंप की भूमिका तैयार कर दी है। यह भूकंप गढ़वाल और कु़माऊं रीजन पर बुरा असर डालेगा, विशेषकर दून वैली में भारी नुकसान की आशंका है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि मैक्सिको और नेपाल में आए भूकंप जैसे हालात उत्तराखंड में भी पैदा हो सकते हैं। दरअसल, 19 सितंबर 1985 को मैक्सिको शहर में 8 की तीव्रता का भूकंप आया था। इस भूकंप से करीब 5000 लोगों की मौत हुई थी। इसकी गहराई 20 किलोमीटर थी। इस भूकंप में 285 इमारतें जमींदोज हो गई थीं।
मैदानी इलाकों में मिट्टी मच सकती है तबाही
143 इमारतें आंशिक और 181 इमारतों का काफी हिस्सा टूट गया था। इसी प्रकार, 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में 7.8 की तीव्रता का भूकंप आया था, जिसे गोरखा भूकंप के नाम से जाना जाता है। इस भूकंप में करीब 9,000 लोगों की मौत हुई थी और 11,000 लोग घायल हो गए थे।
वैज्ञानिकों का दावा है कि उत्तराखंड से जुड़े गंगा के मैदानी इलाकों में मिट्टी भारी तबाही मचा सकती है। दरअसल, 15 जनवरी 1934 को नेपाल-बिहार में भूकंप आया था। इसकी तीव्रता भी रिक्टर पैमाने पर 8 थी। भूकंप से मिट्टी ने भी तरल की तरह तबाही मचाई थी। कई इमारतों को तो इस वजह से तोड़ना पड़ा था। गंगा के मैदानी इलाकों में भी ऐसी ही तबाही की आशंका वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में जताई है।
इन्होंने किया शोध
राजीव कुमार यादव, इंस्टीट्यूट ऑफ सीसमोलॉजी रिसर्च, रायसन, गांधीनगर
विनीत के गहलोत, नेशनल सेंटर फॉर सीसमोलॉजी, नई दिल्ली
अमित कुमार बंसल, सीएसआईआर नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, हैदराबाद
एसपी सती, उत्तराखंड यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर फॉरेस्ट्री, भरसार
जोशी कैटरीन, सीएसआईआर नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, हैदराबाद
परम गौतम, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून
कीरत कुमार, जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरमेंट एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट, अल्मोड़ा, उत्तराखंड
नरेश राणा, नेशनल सेंटर फॉर सीसमोलॉजी, नई दिल्ली ।
(A u )




