
अगर हम पहाड़ी, हना भल रिवाड़ी।
तो मजबूत इमारत, हनी एक ठाड़ी ।।
मगर क्या यूं नेता, क्या जनता, क्या हम तुम।
सबैं छौं बुशिल ढुङ्ग, सबैं छों ढूंढो छौं बुशिल ढुङ्ग।।
ये पंक्तियां हीरा सिंह राणा जी ने न जाने किस मनःस्थिति में लिखी होंगी। किन्तु अनेक कसौटियों पर ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं।
हमारे विद्यालय राजकीय इंटर कॉलेज चौखुटिया में सन 1987-88 में एक समारोह में उन्होंने अपनी पुस्तक “मनखी पढ्यों में” का विमोचन किया। तब पहली बार राणा जी को देखा, इससे पहले उन्हैं कैसेटों में ही सुना था, इस समारोह में भी कुछ गीत उन्होंने सुनाये। जैसे लस्का कमर बांधा, हे जनमा भूमी त्यर जै जै कारा हो।

हमारे अधिकतर लोक कलाकारों की तरह हीरा सिंह राणा जी का भी अधिकांश जीवन अभाव और विपन्नता में गुजरा। हमने मान भी लिया है कि यह अभाव इन सभी महान संस्कृति के पुरोधाओं का आभूषण है। हम मुंशी प्रेमचंद और बाबा नागार्जुन जैसे मनीषियों के साहित्यिक पक्ष पर जितना गौरवान्वित होते हैं उतना ही उनकी गरीबी को उनकी सफलता में सहायक मानते आये हैं। कुछ समय पूर्व हमने विपन्नता में रहकर कला साधना करने वाले झूसिया दमाईं, गोपाल बाबू गोस्वामी, कबूतरी देवी, चंद्र सिंह राही जैसी विभूतियों को विदा किया।
‘मैं छु हीरू डढोई को’ से अपना परिचय देने वाले हीरा सिंह राणा, जिनके हर शब्द में पहाड़ की मिट्टी और जनजीवन की खुशबू थी। उन्हैं केवल अपने अस्तित्व के लिए महानगर दिल्ली में रहना पड़ा। जिन प्रवासियों पर उत्तराखंड की मनीआर्डर व्यवस्था टिकी है, कोरोना काल में उत्तराखंड लौटने पर आजकल जिन्हें निशाने पर लिया जा रहा है, उन्हीं के मनोबल से हीरा सिंह राणा दिल्ली में रहे। स्वाभिमानी राणा ने कभी संस्कृति विभाग के चक्कर नहीं काटे, अपने प्रमोशन का अभियान नहीं चलाया, प्रचार और प्रशंसकों का कृत्रिम तंत्र खड़ा नहीं किया। उन्होंने श्रृंगार के गीत भी लिखे और गाये उनमें उच्च मानदंडों की शालीनता रक्खी जैसे रंगिली बिंदी घाघरि काई, अजकाल हैरे ज्वाना, होली ऐगे छो रंगदार जैसे अमरगीत आज भी सराबोर करते हैं। उनके गीत सदैव हमारे बीच अमर रहेंगे, विनम्र श्रद्धांजलि।

भाजपा नेता सतीश लखेड़ा जी के फेसबुक वॉल से
तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के मीडिया
सलाहकार रमेश भट्ट लिखते हैं कि
देवभूमि उत्तराखंड ने अपना हीरा खो दिया!
स्वर्गीय हीरा सिंह राणा जी अपने शब्दों में मानीला से लेकर मुनस्यारी तक हिमालय के सौंदर्य को उदीप्त किया है। उनके हर गीत में, हर कविता में, हर शब्द में श्रृंगार रस का बोध एक अलग झलक दिखाता था, वो झलक थी देवभूमि उत्तराखण्ड के सौंदर्य, संस्कृति और सभ्यता की। देवभूमि के सौंदर्य बखान के लिए श्रृंगार रस का ऐसा सुंदर प्रयोग शायद ही पहले किसी ने किया हो। रंगिली बिंदी घाघर कायी, गीत कौन भूल सकता है। इस गीत का एक एक शब्द हमारी जन्मभूमि उत्तराखण्ड के सौंदर्य की चरणवन्दना करता है। हीरा सिंह राणा उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति के एक अमिट हस्ताक्षर थे। आपके जाने से हमारी लोक संस्कृति को गहरा आघात पहुंचा है। आपका जाना मेरे लिए व्यक्तिगत तौर पर बड़ी क्षति है। आपके गीत अणकसी को दोबारा से आवाज देकर लाने की तैयारी में था। सोचा था, आपसे ही इसका विमोचन करवाऊंगा। लेकिन विधाता को शायद कुछ और मंजूर था।
हिरदा आपकी सबसे बड़ी खासियत ये रही कि आप सुपरस्टार होकर भी सदा जमीन पर रहे। अपने आसपास जो भी लोकसंगीत के लिहाज से आपके सानिध्य में आया, उसे आपने सदैव उदीप्त किया।
आप भले ही इस जग में नहीं हैं, लेकिन आपकी यादें, आपके गीत, कविताएँ हमें आपका एहसास कराती रहेंगी। बहुत याद आओगे ‘हिरदा’।
।।अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।।








