
उत्तराखंड के अनुभवी मंत्री हरक सिंह रावत कहते है कि 20 सालो मैं हम सिस्टम को डिवेलप नहीं कर पाए इसके लिए हम सब दोषी हैं मैं भी दोषी हूं ।
वही जब हरक सिंह रावत से यह सवाल पूछा गया कि आखिर 20 साल बाद भी प्रदेश की स्थाई राजधानी क्यों नहीं मिल पाई ? तब हरक सिंह रावत बोले की वही मैं भी कह रहा हूं ना क्यों नहीं निर्णय ले पाते हम लोग ?? कभी गेंद इस पाले से उस पाले में, ओर उस पाले से इस पाले में डालते रहते हैं हम लोग,ये दुर्भाग्य की बात है और जो सच बोलता है उस पर हम मधुमक्खी की तरह चिपक जाते हैं ।
अरे सच बोलो ना
अगर देहरादून राजधानी रखनी है तो निर्णय लो ना कोई तो निर्णय ले
भाजपा और कांग्रेस की दो दो सरकारें हो गई हैं
क्या लीडरशिप में निर्णय लेने की क्षमताये खत्म हो गई ??

मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा आप सच बोलो ना मै तो कह रहा हूँ अगर राजधानी गैरसैंण नही जानी है तो क्यो बेवकूफ बनाये लोगो का।
अब देखो ना कश्मीर के लोगों को बेवकूफ बना रखा था ना , भारत सरकार को भी डरा रखा था कि 370 खत्म होगी तो पता नहीं क्या हो जाएगा , क्या हुआ ?? अमित शाह जी की इच्छा शक्ति थी मोदी जी की इच्छा शक्ति थी धारा 370 खत्म हो गई शांति है आज कश्मीर के अंदर।
आज राम जन्मभूमि के लिए इच्छा शक्ति नही थी क्या देखो अब राम जन्म भूमि का रास्ता साफ हुआ है।
तो मे इसलिए कह रहा हूं कि इस राज्य की राजधानी के लिए एक निर्णय लेना ही पड़ेगा जो निर्णय आपने 40 साल बाद लेना है आज क्यो नही ले भई
हो सकता है कुछ लोग राजनीतिक विरोध करें अगर हम देहरादून राजधानी बनाएंगे तो आरोप लग सकता है कि यह पहाड़ विरोधी हैं और यदि हमने गैरसैण राजधानी बना दी तो आरोप लग सकता है कि हम मैदान विरोधी है लेकिन निर्णय तो लेना पड़ेगा ना ।
बेबाक मंत्री हरक सिंह रावत के इस बयान के बाद आप समझ गए होंगे ना कि हरक को नहीं पड़ता फरक जो दिल में है और जो कड़वा सच है वह बोलने से हिचकते नहीं और इस कड़वी सच्चाई की वजह से हरक सिंह को कई बार राजनीतिक खामियाजा भी भुगतना पड़ता है लेकिन इसके बाद भी हरक सिंह रावत कहते हैं कि देखो मैं अपने आप से संतुष्ट हूं मैंने आज तक जो भी किया मैं उसे संतुष्ट हूं पहाड़ के लिए लड़ा पहाड़ के लिए जी रहा हूं और आगे भी अगर लड़ सका तो पहाड़ के हित के लिए ही लडूंगा ।







