
उत्तराखंड में चंदन नयाल ने जंगलों को फिर से किया ‘जिंदा’, PM मोदी भी कर चुके ‘वाटर हीरो’ की तारीफ
कैलाश सुयाल, रामनगर: नैनीताल जिले के एक छोटे से गांव से निकला एक युवा जिसने न नौकरी को चुना, न शहर की चकाचौंध, उसने चुना जंगल, मिट्टी, पानी और अपने पहाड़ों की पुकार को. जिसे आज देश ‘वॉटर हीरो’ के नाम से जानता है. जी हां, हम बात कर रहे हैं ओखलकांडा ब्लॉक के नाई गांव के चंदन नयाल की. जिनका मिशन है जल, जंगल और जमीन का संरक्षण.
बता दें कि 32 वर्षीय चंदन नयाल उत्तराखंड के नैनीताल जिले के ओखलकांडा ब्लॉक के एक बेहद दूरस्थ गांव ‘नाई’ के रहने वाले हैं, जहां आज भी सड़क नहीं पहुंची है, लेकिन वहां से एक ऐसा बदलाव शुरू हुआ है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनी जा रही है.
चंदन नयाल को हाल ही में भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की ओर से ‘वॉटर हीरो’ का खिताब दिया गया है, लेकिन उनकी ये यात्रा आज से नहीं. बल्कि, 12 साल पहले शुरू हुई थी, जब वे पढ़ाई के दौरान छुट्टियों में गांव लौटे थे.
मैंने देखा कि हमारे जंगल जल रहे हैं. जहां कभी चौड़ी पत्ती के बांज, बुरांश, काफल और रयाज के मिश्रित जंगल होते थे, अब वहां सिर्फ सूखे चीड़ के जंगल रह गए हैं. वहां आग लग रही थी पानी के स्रोत सूख रहे थे, बस यहीं से उन्हें जीवन की दिशा मिल गई.’
जल-जंगल के रक्षक की शुरुआत: चंदन ने तय किया कि वो न सिर्फ अपने गांव के जंगलों को बचाएंगे. बल्कि, जो जल स्रोत खत्म हो चुके हैं, उन्हें भी पुनर्जीवित करेंगे. उन्होंने न तो किसी एनजीओ का इंतजार किया, न किसी फंडिंग का. अपने दम पर बीड़ा उठाया और वन व वन्य जीवों के लिए जीवनदायिनी बनकर उभरे.
उन्होंने पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों पर ध्यान देना शुरू किया. चाल, खाल, पोखर और खंटियां ये छोटे-छोटे गड्ढे होते हैं, जो वर्षा जल को रोकते हैं और धीरे-धीरे जमीन में समा कर भूजल स्तर को बढ़ाते हैं. आज चंदन अपने क्षेत्रों में 6000 से ज्यादा चाल-खाल बना चुके हैं, जिनमें आज भी वर्षा जल जमा होता है.
वनाग्नि को भी मिला विराम: जंगलों में सूखे चीड़ के पत्ते आग फैलाने का सबसे बड़ा कारण होते हैं, लेकिन जब जमीन में नमी होती है तो आग नहीं पकड़ती है. चाल-खाल से जंगल की जमीन में आई नमी ने वनाग्नि की घटनाओं में भी कमी आई है.
“जैसे-जैसे हमने चाल खाल बनाना शुरू किया, वैसे-वैसे ओखलकांडा क्षेत्र में आग की घटनाएं बहुत कम हो गईं.”- चंदन नयाल, पर्यावरण प्रेमी
जंगल को दी नई जान: चंदन सिर्फ जल संरक्षण में ही नहीं रुके, उन्होंने जंगलों की आत्मा को भी फिर से जीवित किया. उन्होंने अब तक करीब 60,000 से ज्यादा चौड़ी पत्ती के मिश्रित पौधे लगा लिए हैं, जिनमें बांज, बुरांश, खर्सु, रयाज, फल्याट, काफल आदि जैसे पेड़ शामिल हैं.
ये पेड़ अब सिर्फ पौधे नहीं रहे, बल्कि, ये आज घने होते जंगलों की शक्ल ले चुके हैं. चंदन बताते हैं कि ‘हमने करीब 8 हेक्टेयर बंजर भूमि को फिर से हरा-भरा बना दिया है. जहां पहले सिर्फ सूखा चीड़ था, वहां आज पक्षियों की चहचहाहट है, नमी है, जीवन भी है.’
पौधे से पेड़ और पेड़ से प्रेरणा तक: चंदन ने एक नर्सरी भी शुरू की है, जहां वो खुद बीज से पौधों को तैयार करते हैं और फिर उन्हें जंगलों में रोपित करते हैं. चंदन कहते हैं ‘मैं हर पौधे को ऐसे देखता हूं, जैसे एक जीवन पल रहा हो. यही सोच उन्हें बाकी सबसे अलग बनाती है.’
अपना अंगदान भी कर चुके चंदन: चंदन नयाल साल 2017 में अपना शरीर सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज को दान करने का निर्णय ले चुके हैं. इसके पीछे उनका कहना है कि ‘मैं इन पेड़ों से इतना प्यार करता हूं, इनके लिए इतनी मेहनत करता हूं कि मेरी मृत्यु के बाद भी मेरे लिए एक भी पेड़ न कटे. कोई प्रेरणा इनसे जुड़ी रहे, इसलिए अपना शरीर दान कर दिया.’
गांव से ग्लोबल पहचान तक: आज चंदन नया के काम को न सिर्फ जल शक्ति मंत्रालय ने सराहा है. बल्कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में चंदन का जिक्र किया और उन्हें पर्यावरण योद्धा भी बता चुके हैं.
पढ़ाई छोड़ी, लेकिन पहाड़ को चुना: चंदन ने पॉलिटेक्निक की पढ़ाई की थी. पढ़ाई के बाद नौकरी का मौका था, लेकिन उन्होंने शहर में रहना नहीं चुना. चंदन कहते हैं ‘जिन पेड़ों ने मुझे छांव दी, जिन नदियों ने पाला, अगर मैं उन्हें ही भूल जाऊं तो पढ़ाई किस काम की?’
दूर-दराज की पंचायतों तक फैलाया संदेश: आज चंदन सिर्फ अपने गांव तक सीमित नहीं हैं, वो आसपास की पंचायतों में भी जाकर स्थानीय युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं. उन्हें सिखा रहे हैं कि कैसे वे अपने जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर सकते हैं?
पेड़ लगाओ, पानी बचाओ– ये सिर्फ नारा नहीं, चंदन नयाल का है जीवन: एक ऐसा युवा, जिसने अपने हिस्से का जंगल बचाया. अपने गांव के धारे-नौले जिंदा करने के प्रयासों में लगे हुए हैं और अब अगली पीढ़ी को प्रेरित कर रहा है. अगर हर गांव में एक चंदन हो तो भारत सच में हरा-भरा हो सकता है.





