” दिले शिकस्त न समझे जमाना हमें, नाज़ है अपनी हिम्मत पर आज भी, शीशे हिमालय से पुरखों की सदा, दे रही है पयादे शहर आज भी”।।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की कलम से 

उत्तराखंडियत मेरा जुनून”
कल मैंने आप सबके साथ अपना संकल्प साझा किया। आज मैं उस संकल्प को आगे बढ़ाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ रहा हूंँ। मैं कोई भाषा-बोली का विद्वान नहीं, मगर मेरा अंतर्मन का समर्पण है, उसी समर्पण के तहत मैंने गढ़वाल और कुमाऊं विश्वविद्यालय में #गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी भाषाओं के डिपार्टमेंट स्थापित किये और कई निर्णय करिकुलम और यूपीएससी की परीक्षाओं के लिये जो इन भाषा-बोलियों के महत्व को दर्शाएं और एक बड़ा कदम लिया हमारी आकांक्षाओं के विकास केंद्र गोचर में मैंने भाषा-बोली संस्थान, जहां उत्तराखंड की भाषाएं गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, रंग और स्थानीय बोलियां जैसे गंगोली आदि का पठन-पाठन और संवर्धन के लिए काम हो सके, क्योंकि किसी भी भाषा को #राष्ट्रीय_भाषा के दर्जे तक लाने के लिए आवश्यक है कि उसमें बड़े पैमाने पर साहित्य सृजन हो । मैं उस दिशा में एक क्विज प्रारंभ करूंगा, उसका प्लेटफार्म तैयार कर रहा हूंँ, शायद उसमें हफ्ता-10 दिन लगेंगे। उस क्विज में प्रातः मैं उत्तराखंड की विभिन्न भाषाओं-बोलियों का एक शब्द या एक मुहावरा आपके सामने लाऊंगा और उसमें आप सबको जोड़ने के लिये आमंत्रित करूंगा, हर महीने उस क्विज में भाग लेने वाले लोगों के लिए प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार जिसमें ₹500 के कुमाऊं, गढ़वाली व जौनसारी भाषा बोली की पुस्तकें भेंट स्वरूप विजेताओं को दी जाएंगी। मैं समझता हूंँ मेरा ये छोटा सा कदम आप सबको पसंद आएगा। इंतजार करिए, इस क्विज के प्लेटफार्म को अपने सामने आने का।

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” दिले शिकस्त न समझे जमाना हमें, नाज़ है अपनी हिम्मत पर आज भी,
शीशे हिमालय से पुरखों की सदा, दे रही है पयादे शहर आज भी”।।

“#उत्तराखंड_जिंदाबाद”।
#uttarakhand

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