
जानो कैसे विलुप्त हुए थे आदिमानव? इनको मिला जवाब लेकिन चिंता भी, कही विनाशकारी इतिहास दोहराने वाला तो नहीं
बता दे कि
एक स्टडी में दावा किया गया है कि ये आदिमानव प्रजाति जलवायु परिवर्तन से लड़ते हुए खत्म हो गई। धरती का चुंबकीय क्षेत्र खत्म होने और ध्रुवों के पलटने के कारण यह जलवायु परिवर्तन हुआ था।
आदिमानव की प्रजाति नियंडरथल (Neanderthal) आखिर धरती से कैसे विलुप्त हुए थे? इस सवाल का जवाब मिलता दिख रहा है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने अपनी ताजा स्टडी में दावा किया गया है कि धरती का चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) खत्म होने और ध्रुवों (Poles) के पलटने के कारण ऐसा हुआ होगा। यह घटना (Laschamp Excursion) 42 हजार साल पहले हुई थी और करीब एक हजार साल तक ऐसे हालात बने रहे थे। वहीं, वैज्ञानिकों का आकलन है कि यह घटना 2 से 3 लाख साल के अंतर पर होती है और जिस तरह धरती का चुंबकीय क्षेत्र कमजोर हो रहा है, हो सकता है कि ध्रुवों के पलटने का वक्त करीब आ रहा हो।
धरती का चुंबकीय क्षेत्र इंसानों और दूसरे जीवों के लिए जीवन मुमकिन बनाता है। यह सूरज से आने वाली सोलर विंड, कॉस्मिक रेज और हानिकारक रेडिएशन से ओजोन की परत को बचाता है। यह क्षेत्र ध्रुवों पर सबसे ज्यादा होता है लेकिन कभी-कभी यह पलट भी जाता है। यही नहीं, खत्म होने से काफी पहले कमजोर होते चुंबकीय क्षेत्र के कारण बड़ा नुकसान हो सकता है। इसकी वजह से उपकरणों के संचालन में दिक्कत हो सकती है। खासकर अंतरिक्ष में घूम रहे सैटलाइट्स और दूसरे क्राफ्ट्स चलने बंद हो सकते हैं। ‘साइंस’ पत्रिका में छपी स्टडी में बताया गया है कि चुंबकीय क्षेत्र के कमजोर होने से जलवायु में तेजी से बदलाव हुआ। वैज्ञानिकों का मानना है कि Lascamp की घटना को ज्यादा विशेषता से स्टडी नहीं किया गया है।
स्टडी में कहा गया है कि ध्रुवों में हुए बदलाव के नाटकीय नतीजे रहे होंगे और जलवायु के हालात भीषण बन गए होंगे। इसकी वजह से स्तनपायी जीव विलुप्त हो गए। प्रफेसर क्रिस टर्नी ने बताया है, ‘हम इस काल में उत्तरी अमेरिका के ऊपर बर्फ की परत में तेज बढ़ोतरी देखते हैं, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में ट्रॉपिकल रेन बेल्ट्स तेजी से बदलती हुई दिखती हैं और दक्षिणी महासागर में हवाओं की बेल्ट और ऑस्ट्रेलिया का सूखना भी दिखता है।’

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन बदलावों की वजह से खराब मौसम से बचने के लिए निएंडरथल गुफाओं में छिपने लगे। इन हालात की वजह से आपस में हमारे पूर्वजों में प्रतिद्वंदिता बनने लगी होगी और आखिर में वे विलुप्त हो गए। अपनी स्टडी के लिए रिसर्चर्स ने रेडियोकार्बन अनैलेसिस की मदद ली। वायुमंडल में कार्बन-14 के बढ़ने को देखा गया जो कॉस्मिक रेडिएशन की वजह से पैदा होती है। दुनियाभर से मिले मटीरियल को स्टडी करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि जब कार्बन-14 की मात्रा बढ़ी हुई थी, उसी दौरान पर्यावरण में बड़े बदलाव हो रहे थे।
वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती के ध्रुव हर 2 से 3 लाख साल में बदलते हैं। कुछ वैज्ञानिकों ने बताया है कि धरती का चुंबकीय क्षेत्र कमजोर हो रहा है। इसलिए हो सकता है कि ध्रुवों के पलटने का वक्त नजदीक आ रहा हो। हालांकि, कई वैज्ञानिक इस आशंका को नकारते भी हैं। दक्षिण ऑस्ट्रेलियन म्यूजियम के ऐलन कूपर के मुताबिक यह जरूरी नहीं है कि ध्रुव फिर से पलटेंगे ही लेकिन अगर ऐसा होता है तो यह विनाशकारी होगा।




