
उत्तराखंड का सबसे बड़ा दर्द
बढ़ता पालयन त्रिवेन्द्र सरकार का सबसे बड़ा दर्द है
अब इस दर्द की दवा ठीक वैसे ही उत्तराखंड अभी तक है जैसे कुछ लोग अभी तक अपनी बनाई दवाई को , कोरोना नाशक बता रहे है
क्योकि अभी तक कोरोना से लड़ने की दवा तैयार नही है, बाजार मे नही है ।
आपको बता दे कि मुख्यमंत्री
त्रिवेन्द्र रावत का बनाया हुवा
पलायन आयोग बस बढ़ते पलायन की रिपोर्ट ही देता आ रहा है, ओर अपना मीटर घुमा रहा है।
पालयन आयोग की
रिपोर्ट के अनुसार
टिहरी जिले मैं पलायन की वो तस्वीर निकल आई है जिसे देख टिहरी लोकसभा क्षेत्र पर राज्य गठन साल 2000 से राज करने वालो को शर्म आएगी या नही ये तो वही जाने
पर हम दुःखी है
जान लो पिछले 10 सालों में ही टिहरी जिले में 58 गांव तो पूरी तरह से खाली हो गए हैं
अब 71 ऐसे गांव हैं जहां की 50% आबादी पलायन कर गई
लगभग 90000 लोगों ने अस्थाई या स्थाई रूप से पलायन किया है
19 लोग पूरी तरह गांव छोड़कर चले गए हैं

ओर फिर पलायन की सबसे बड़ी वजह आजीविका और रोजगार की तलाश ही निकलकर सामने आई है
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि टिहरी जिले के 9 विकास खंडों में से 5 में जनसंख्या बढ़ने के बजाय कम हुई है
इन जिलों में दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर ऋणआत्मक पाई गई है इसमें चंबा और देवप्रयाग जैसे विकासखंड भी शामिल है जो चार धाम की यात्रा से किसी न किसी रूप से जुड़े हैं
ओर जिले में अस्थाई पलायन अधिक है जो सरकार को सजीवनि वाली राहत दे रही है
जिले की कुल जनसंख्या 2011 की जनगणना के मुताबिक 618000 है
इसमें से 338000 ऐसे लोग हैं जिनके पास कोई काम नहीं है उच्च बेरोजगारी दर पलायन का एक बड़ा कारण रहा है और रिपोर्ट से इसकी पुष्टि भी हो रही है रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 52% पलायन रोजगार की वजह से हुआ है

वही रिपोर्ट के मुताबिक जिले में 399 ऐसे गांव हैं जहां लोगों को पानी लाने के लिए 1 किलोमीटर से अधिक की दूरी नापनी पड़ती है
ओर 660 गांव है जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं हैं इतना होने पर भी अधिकतर लोगों ने राज्य के बाहर जाना स्वीकार नहीं किया करीब 40% लोगों ने राज्य के अन्य जिलों में पलायन किया करीब 3% लोग देश छोड़कर ही चले गए करीब 18% लोग गांव छोड़कर नजदीकी कस्बों की ओर चले गए और करीब 29% लोग राज्य से बाहर गए हैं

काम धंधे के हिसाब से भी जिला खास नहीं कर पाया है मुख्य व्यवसाय खेती है और उद्योग से बहुत कम लोग जुड़े हैं जिले की विकास दर कुछ समय पहले तक 7% ही के आसपास थी सीडी रेशों 38 पाया गया जो राज्य के औसत 52% से बहुत कम है
बहराल बुरा ना माने सरकार छोटी मुँह वाली बात है
70 सीटो पर बैठने वाले 70 विधानसभा के विधायक जी
या अन्य लोग , ओर महत्वपूर्ण नोकरशाह , बाबा केदारनाथ की कसम खा कर कह सकता है कि हमको नही मालूम पहाड़ो से पलायन क्यों हो रहा है
ओर हमको मालूम नही की कैसे रुकेगा बढ़ता पलायन !
अगर नही मालूम तो फिर ठीक है
राज्य मै बने पालयन आयोग के सिस्टम पर धन खर्च करना।
ओर अगर मालूम है तो फिर इस धन की बर्बादी रोक यहां खर्च कर
निर्जल गाँव को गोद लकेर उनको सरकार फिर से बसाने पर खर्च करे।
जवाब इसका सबके पास सबके दिमाग़ मैं होगा ही
एक ओर बात पलायन हुवा है और आगे भी होगा इस बात से इनकार नही किया जा सकता है
पर जो पालयन मूलभूत सुविधाओ के अभाव मै हुवा है
ओर आगे ना हो उसे रोका जा सकता है ।
पूरे उत्तराखंड से राज्य गठन
होने के बाद 32 लाख से अधिक लोग
अपना घर छोड़ चुके है
आज मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के द्वारा चलाई जा रही मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना वरदान से कम नही है पर तब जब राज्य के अफसर दिल , दिमाग़ से काम करते नज़र आये,
गाँव के लोगो को बैंक से लोन लेने मै
बेवजह की दिक्कत ना हो
ओर ये नोकरशाह सिर्फ तमाशबीन बनकर ना रह जाये
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र की मेहनत पर पानी ना फेरे !
जब तक स्वास्थ्य मंत्री, शिक्षा मंत्री , पेय जल मंत्री, लोकनिर्माण मंत्री,
पँचायत मंत्री, वन विभाग का मन्त्री,
खेती वाला मन्त्री , सूक्ष्म लघु उधोग मन्त्री , इन महकमे के नोकरशाह ,अधिकारी, कर्मचारी
व विद्यायक, ब्लाक प्रमुख , पटवारी , प्रधान अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा नही करेगे तब तक
जितना मर्ज़ी कह लो कहने मैं क्या जाता है ।
पर सच यही है कि तब तक गाँव वीरान होते रहेंगे , ओर आयोग पर आयोग ओर आयोग सिर्फ अपना मीटर बढ़ता रहेगा और पालयन कि हर साल नई रिपोर्ट तैयार कर हमारे सामने लाता रहेगा।







