ये ट्राली नही मौत का रास्ता है! जुगाड़ के सहारे है पहाड़ के निवासी !

उत्तराखण्ड के पहाड़ो मै रहने वाले कभी कुदरत की मार झेलते है तो कभी सिस्टम की ओर ये आलम कही एक जगह का नही बल्कि हर गाँव के आस पास अक्सर देखने को मिलता भी है हम बात कर रहे है पुरोल की जहा मात्र छह साल की एक बच्ची ट्रॉली से टौंस नदी में गिर गर्इ। ये हादसा उस समय हुआ जब ये बच्ची मोरी बाजार से सल्ला गांव लौट रही थी। वो अपने परिवार के साथ गांव को जोड़ने वाली ट्रॉली में बैठते समय टौंस नदी में जा गिरी।                                                       सूचना पर पहुंची पुलिस व एसडीआरएफ की टीम ने सांद्र से लेकर त्यूणी तक रेस्क्यू अभियान चलाया। लेकिन बच्ची का कोई पता नहीं चल सका। आपको बता दे कि ट्रॉली से गिरकर टौंस घाटी में बहने की यह तीसरी घटना है। ओर अलग अलग समय पर घायलों की संख्या मै इजाफा हो कर ये शख़्या 20 से अधिक हो चुकी है।
आपको बता दे कि सल्ला गांव के निवासी किशोर चौहान शनिवार के दिन अपनी पत्नी और अपनी छह वर्षीय बेटी राशि चौहान के साथ मोरी बाजार आए थे। जहा उन्होंने मोरी से घर के लिए राशन लिया। जिसके बाद घर जाने के लिए मोरी बाजार से लेकर सांद्रा तक वे गाड़ी से गए उसके बाद सांद्रा से टौंस नदी पार करने के लिए किशोर सिंह ओर उनकी पत्नी पहले ट्रॉली में चढ़े। जब तक वे बेटी को ट्रॉली में चढ़ाने लगे तो ट्रॉली की डोली छिटक गई। जिसके झटके से वह सीधे टौंस नदी में जा गिरी और बहने लगी। इस घटना के बाद जब किशोर सिंह ओर उनकी पत्नी नदी के किनारे पहुंचे, तब तक बच्ची काफी आगे बह चुकी थी। किशोर सिंह ने इसकी सूचना पुलिस को दी। मोरी पुलिस व एसडीआरएफ ने भी सांद्रा से लेकर त्यूणी तक रेस्क्यू अभियान चलाया। पर बच्ची का कुछ पता नहीं चल सका।।             आपको जानकर हैरानी होगी कि सांद्र में 20 साल पहले ट्रॉली लगी थी, जो काफी जर्जर हालत में है। साथ ही ट्रॉली की रस्सी खींचने के लिए भी वहां प्रशासन की ओर से कोई व्यवस्था नहीं की गई। तो क्या इसका मतलब ये समझा जाये कि उत्तरप्रदेश के जमाने से यहा लोग जान झोखिम मे डाल कर सफर करते है और आज तक कि 18 सालो की सरकार ने उन लोगो को एक आदत पल तक मुहैया नही कराया  
मतलब सल्ला गांव को जोड़ने का एक रास्ता ये ट्रॉली ही है जिसके हालत ठीक नही बड़ा दर्द होता है मुझे जब जब मे पहाड़ के इस दर्द की ख़बर को लिखता हूँ छापता हूँ कि क्या है मेरे पहाड़ के लोगो की ज़िंदगी उनको तो ये भी मालूम नही होता कि घर से निकलने के बाद वो घर वापस लौटेंगे भी या। नही क्योकि अपनी जान झोखिम मे डालकर अक्सर वो घर से निकलते है सवाल हर राजनेता के लिए खड़ा होता है कि आप कैसे राजनेता हो ,किस बात के राजनेता हो ,जब आप गाँव की जनता को एक अदत पुल तक नही दे पा रहे है                 सवाल खड़ा होता है कि जब जब हादसे हो जाते है उन हादसों के बाद भी हमारा सिस्टम नही जागता बस अब तो हम थक चुके है इस सिस्टम से इस नाम की व्यवस्था से ये तो सिर्फ एक जगह का दर्द है पर जब मै पहाड़ो मैं जाता हूँ तो मुझे यही दर्द दर्जनों से अधिक गाँव वाले बया करते है यही हाल रहा तो वो दिन दूर नही जब राज्य के पहाड़ी जिले के निवासी एक बड़ा आंदोलन की ओर चलेंगे कयोकि जब हाथ जोड़कर , वोट देकर , नेताओ की चौखट पर जा जा कर भी कुछ नही होता तो फिर वो दिन दूर नही जब बोलेगा उत्तराखंण्ड

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