उत्तराखंड में हर साल बढ़ती जनसंख्या के चलते मूलभूत सुविधाएं मिल पाना आम जनता के लिए मुश्किल हो गया है।अपने छत होने का सपना तो आम आदमी के लिए अब भी एक सपना ही है लेकिन अब साल दर साल पानी की कमी ने भी उनका जीवन दुश्वार कर दिया है।आबादी का बोझ ऐसा है कि गर्मियों के मौसम में तमाम नदियों और गाड गदेरों के होने के बावजूद पानी का संकट बढ़ता ही जा रहा है।

जबकि सरकार हर साल  इस तकलीफ से निजात पाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है।आपको बता दें कि साल 2015 में पानी के लिहाज से संकट ग्रस्त 964 इलाके थे वहीं 12 महीने बाद उनकी ताददा 1165 हो गई है।जबकि जल संस्थान की माने तो इस साल राज्य मे गर्मियों के सीजन में 1544 क्षेत्रों को पानी के भारी संकट से जूझना पड़ेगा।जल संस्थान ने प्रदेश भर 1544 संकटग्रस्त ग्रामीण और शहरी मोहल्ले को पहले ही चिन्हित कर लिया हैं।हर बार की तरह इस बार भी शहरी मोहल्लों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की अधिक किल्लत रहेगी।इस बार 422 शहरी इलाकों में पेयजल का संकट होगा जबकि 1122 ग्रामीण बस्तियों में पानी की दिक्कत होगी।पानी के इस संभावित संकट से निपटने की तरकीब का प्रस्ताव महकमें ने शासन को भेज दिया है। ताकि चिलचिलाती गर्मियों में जनता को वक्त पर राहत दी जा सके। प्लान के मुताबिक सूबे में पेयजल आपूर्ति को सामान्य बनाने के लिए जहां 330 विभागीय टैंकर का इस्तमाल किया जाएगा वहीं 1188 टैंकर किराए पर भी लिए जाएंगे।अब सवाल ये है कि पर्वतीय क्षेत्रों से होकर निकलने वाली नदियों के बावजूद अब भी पर्वतीय इलाकों के ग्रामीण प्यासे क्यों हैं।

प्रशासन ने इस बार के इस पेयजल संकट से निपटने के लिए और कुछ नही बजट की पूरी तैयारी कर शासन को रिपोर्ट भी भेज दी है और 14 करोड़ 27 लाख का प्रस्ताव शासन के पास स्वीकृति के लिए भेजा है।अब सवाल ये भी उठता है कि क्या हर बार पेयजल संकट के नाम पर क्षेत्रों के बढ़ते आंकड़े के पीछे बजट की बंदरबाट तो नही।और पेयजल संकट की जो तस्वीर जल संस्थान पेश कर रहा है वो इतनी विकराल है भी की नहीं।क्योंकि हर साल शासन ये रिपोर्ट तैयार करता है और बजट भी स्वीकृत किया जाता है उसके बावजूद हर दूसरे साल समस्या और विकराल क्यों हो जाती है।क्या बजट सिर्फ फाइलों में ही बट कर रह जाता है या फिर धरातल में कुछ सजीव होता भी है।आम आदमी के लिए हर बार बजट स्वीकृत होता है लेकिन फिर भी आम आदमी प्यासा रह जाता है।स्थिति तब और विकट दिखती है जब उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र पानी होने के बावजूद फाइलों में हुए विकास तक ही सिमट कर रह जाता है।ये वो सवाल है जो हर कोई जानना चाहता है लेकिन जवाब आखिर मिले भी तो किससे।

 



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