वन महकमे को अब आई जगत सिंग जंगली की याद

: राज्य का वन महकमा कभी भी समय पर वो काम नही करता जिसकी जरूरत राज्य को होती है हा जब ऊपर से डाट पड़ जाए तब ये लाइन पर आते है जिसका उदाहरण है जगलो मे लगने वाली आग खेर बोलता उत्तराखण्ड आपको बता रहा है कि इस विभाग ने अब एक काम ठीक किया है मतलब चलो देर आये दुरस्त आये आपको बता दे कि देश ही नहीं दुनिया भी जिस पर्यावरण प्रेमी का लोहा मानती है। जिसने बंजर जमीन को हरा-भरा करके असम्भव को भी सम्भव कर दिया है,                 उस पर्यावरण के रक्षक की याद अब वन महकमे को आगयी है और अव वन महकमे ने पर्यावरण के इस रक्षक जगत सिंह ‘जंगली‘ को देर से ही सही लेकिन दुरस्त आते हुए उत्तराखण्ड का फोरेस्ट ब्रांड एम्बेस्डर बनायाहै। मंगलवार को वन भवन के मंथन सभागार में आयोजित कार्यक्रम मे जगत सिंह ‘जंगली‘ के सम्मान समारोह में प्रमुख वन संरक्षक जय राज ने इसकी घोषणा कर उनके कार्य की सराहना करते हुए कहा कि जगत सिंह जंगली के अनुभव का लाभ प्रदेश हित में उठाया जाएगा जयराज ने कहा कि मिश्रित वनों का जो फार्मूला जगत सिंह जंगली ने प्रयोग किया वो सराहनीय है और हरियाली गांव इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं। उनकी लगन ने ये साबित कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो तो असम्भव को भी सम्भव किया जा सकता है।बोलता उत्तराखण्ड आप को बता दें कि जगत सिंह ‘जंगली‘ दुनियाभर में पर्यावरण का वो चेहरा हैं जिन्होंने जलवायु परिवर्तन को मात देते हुए जलवायु निर्माण करके दिखाया है। रूद्रप्रयाग जिले के कोट मल्ला गांव (हरियाली गांव) में उन्होंने पिछले 40 वर्षो में ,लगभग डेढ़ लाख पेड़ लगाये हैं और बंजर जमीन में से पानी निकाल कर दिखा दिया है। उन्होंने मिट्टी और स्टोन तकनीकी का इस तरह संरक्षण और प्रयोग किया है कि पहाड़ की पथरीली जमीन हरे-भरे वनों में बदल गयी। इसके लिए ना उन्होंने ना कोई कोर्स किया और ना ही किसी तरह की ट्रैनिंग हासिल की। फौज की नौकरी के दौरान अपने पिता के वचन को निभाने के लिए उन्होंने वो कर दिखाया कि देश-विदेश के वैज्ञानिक भी हैरान रह गये। उन्होंने मिश्रित वनों पर कार्य करते हुए 60 प्रजातियों के वन उगाये और फिर नौकरी छोड़कर इसे ही अपनी आय का जरिया बना लिया। हालांकि अभी तक उन्हें सरकार से किसी भी तरह की मदद हासिल नहीं हुई है लेकिन देश-विदेश में कई विश्वविद्यालय उन्हें पर्यावरण का अनुभव साझा करने के लिए बुलाते हैं। ओर इन पर नज़र अब पड़ी वन महकमे की जो काम वन महकमे को 10 साल पहले करना चाइये था वो अब जाकर किया चलो अच्छा है जगत सिंह जंगली के अनुभवों का लाभ वन महकाम उठा सके और राज्य को लाभ हो तो इससे ऊपर ओर कुछ हो ही नही सकता   
आपको ये भी बता दे कि जगत  सिंह  जंगली को राज्य का गर्व कहा जाता है  वन विभाग और विज्ञान दोनों का दावा था कि इतनी ऊंचाई पर हरियाली की बात सोचना ही अवैज्ञानिक किस्म की सोच है. कुछ वनस्पतियां यहां जरूर उग सकती हैं लेकिन जंगल जैसी बातें इतनी ऊंचाई पर संभव नहीं है. लेकिन जंगली ने वह कर दिखाया जो पूरा सरकारी महकमा मिलकर नहीं कर सका. और जो किया उसका प्रसाद आज अकेले जगत सिंह को नहीं मिल रहा है. हरियाली और संपन्नता का प्रसाद समाज के हर हिस्से तक पहुंच रहा है निशुल्क और साधिकार. जगत सिंह ने गढ़वाल में इतने पेड़ लगाये कि लोगों ने आदर से उन्हें जंगली का संबोधन दे दिया. जगत सिंह चौधरी ‘जंगली’ नें साबित किया है कि यदि कोई व्यक्ति अपने मन में ठान ले तो वह बहुत से तथाकथित वैज्ञानिक बातों को भी झुठला सकता है. उत्तराखण्ड के गढ़वाल इलाके में रूद्रप्रयाग जिले के एक छोटे से गांव कोटमल्ला में रहने वाले जगत सिंह चौधरी अब अपने उपनाम ‘जंगली’ के नाम से ही ज्यादा जाने जाते हैं. जगत सिंह चौधरी का जन्म 6 अप्रैल 1954 को कोटमल्ला में हुआ था. तब यह गांव चमोली जिले के अंतर्गत आता था.अब यह रुद्रप्रयाग जिले में है. जंगली के परदादा साधु सिंह और दादा शेर सिंह प्रकृति प्रेमी थे.उनके दादा शेर सिंह अपने जमाने में जंगलों के प्रति अपने लगाव के लिये प्रसिद्ध थे जिसके लिये ब्रिटिश सरकार ने ‘वाकसिद्धि’ की उपाधि दी और पांच रुपये मासिक की पेंशन भी मुहैया करवायी. सन 1967 में जंगली सेना में भर्ती हो गये.शादी हुई,बच्चे हुए और जगत सिंह का जीवन भी आम लोगों की तरह चलने लगा. उनके जीवन में परिवर्तन आया 1974 में जब उनके पिता बहादुर सिंह की मृत्यु हुई.मरते समय उनके पिता ने उनसे कहा कि वह अपनी बंजर पड़ी जमीन को किसी ना किसी तरह से प्रयोग में लायें. उस जमीन में तब कुछ भी नहीं उगता था और उस इलाके में पानी की बहुत कमी थी.जगत सिंह ने पहले उस इलाके में प्राकृतिक वनस्पति उगायी बस तब से ही जगत सिंह जंगली के लिए सभी के दिलो दिमाग मे जगह बन गई 

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