उत्‍तराखंड की ये जनजाति नहीं मनाते थे दीवाली, नही फूंकते रावण के पुतले , पर अब मनेगी नई दिवाली । पूरी रिपोर्ट

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उत्‍तराखंड में एक जनजाति नहीं मनाती थी दीवाली, पहली बार मनेगी नई दिवाली
उत्तराखंड की एक जनजाति ऐसी भी है, जो दीवाली का त्‍योहार नहीं मनाती थी। अब जानसौर की जनजाति ने देशवासियों के साथ दीवाली का त्‍योहार मनाने का फैसला किया है।…

उत्तराखंड की एक जनजाति ऐसी भी है, जो दीवाली का त्‍योहार नहीं मनाती थी। उसकी जगह यहां लोग दीवाली के एक महीने बाद बूढ़ी दीवाली का त्‍योहर मनाते थे। अब जानसौर की जनजाति ने देशवासियों के साथ दीवाली का त्‍योहार मनाने का फैसला किया है। आइए जानते हैं इसके पीछे की पूरी कहानी।

हम बात कर रहे हैं उत्‍तराखंड के देहरादून जिले के जनजाति क्षेत्र जौनसार-बावर की। यहां देशभर में मनने वाली दीवाली के ठीक एक माह बाद परपंरागत तरीके से बूढ़ी दीवाली मनाई जाती है, लेकिन इस बार अठगांव खत के लोग सदियों पुरानी परपंरा से हटकर देशवासियों के साथ दीवाली का जश्न मनाने का फैसला किया है।

बूढ़ी दीवाली की परंपरा

अपनी अनूठी संस्कृति के लिए देश-दुनिया में विख्यात जौनसार-बावर में तीज-त्योहार मनाने का अंदाज निराला है। जहां देशभर में लोग दीवाली का त्योहार एक साथ धूमधाम से मनाते हैं, वहीं दूसरी ओर जौनसार के लोग इसके ठीक एक माह बाद बूढ़ी दीवाली को परपंरागत तरीके से मनाते हैं। इसके पीछ़े लोगों के अपने तर्क हैं। कहते हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के 14 वर्ष वनवास काटने के बाद उनकी अयोध्या वापसी की सूचना यहां के लोगों को देर से मिली। जिस कारण यहां एक माह बाद बूढ़ी दीवाली मनाई जाती है। वहीं, दूसरी मान्‍यता ये है कि अधिकांश लोगों का कहना है पहाड़ में अक्टूबर माह के आखिर व नवबंर माह के शुरुआती चरण में फसल की कटाई और अन्य कृषि कार्य ज्यादा रहते हैं। खेतीबाड़ी से जुड़े जौनसार के लोग कामकाज निपटने के एक माह बाद बूढ़ी दीवाली मनाते हैं।

जौनसार-बावर बूढ़ी दीवाली मनाने की परपंरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन समय के साथ आए बदलाव से यहां के लोग देशवासियों के साथ कदमताल कर रहे हैं। बीते मंगलवार को जौनसार के अठगांव खत से जुड़ी रंगेऊ पंचायत, सीढ़ी-बरकोटी, बिरपा-कांडीधार, पुनाह-पोखरी व बिजनू-चुनौठी समेत पांच पंचायत के लोगों की बरौंथा में महापंचायत बैठी। इसकी अध्यक्षता सदर स्याणा विजयपाल सिंह ने की। बैठक में चर्चा के बाद अठगांव खत के लोगों ने सदियों पुरानी जौनसारी बूढ़ी दीवाली को छोड़कर इस बार देशवासियों के साथ नई दीवाली मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। इस मौके पर सदर स्याणा विजपाल सिंह, ग्रामप्रधान मातबर सिंह, स्याणा अरविंद सिंह, स्याणा नत्थी सिंह, रणवीर सिंह सिंह, जयपाल सिंह, अर्जुन सिंह, खजान सिंह आदि मौजूद रहे।

अठगांव खत के लोग परपंरा से हटकर पहली बार देशवासियों के साथ दीवाली का जश्न मनाएंगे। यहां दीवाली मनाने का तरीका परंपरागत रहेगा। लोगों ने अभी से नई दीवाली के जश्न की तैयारी शुरु कर दी है। अठगांव खत के लोगों ने जौनसारी बूढ़ी दीवाली को अलविदा कह कर समाज में नए अध्याय की शुरुआत की है।

जौनसार-बावर में प्रदूषण रहित दीवाली मनाई जाती है। क्षेत्र के लोग आतिशबाजी करने के बजाए चीड़ व भीमल की लकड़ी की मशाल जलाकर गांव के पंचायती आंगन में एकत्र होकर होलियात निकालते हैं। ग्रामीण ढोल-दमोऊ (पारंपरिक वाद्य यंत्र) की थाप पर हारुल व अन्य लोक गीतों से पूरी रात पंचायती आंगन में परंपरागत तांदी-नृत्य कर दीवाली का जश्न मनाते हैं।

पिछली बार जौनसार के बाना खत से जुड़े छह गांवों के लोगों ने जौनसारी बूढ़ी दीवाली की जगह देशवासियों के साथ पहली बार नई दीवाली मनाई। इस बार अठगांव खत के लोगों ने परंपरा से हटकर देशवासियों के साथ दीवाली मनाने का फैसला किया है। जौनसार के बाना खत व अठगांव खत की नई पहल से समाज में बदलाव की बयार चल रही है।

बावर व देवघार खत से जुड़े करीब 50 गांवों में पहले से नई दीवाली मनाई जाती है। यहां के लोग देशवासियों के साथ दीवाली मनाते हैं। बावर-देवघार क्षेत्र में दीवाली मनाने का अंदाज परंपरागत है। यहां पांच दिन तक दीवाली का जश्न मनता है। लोग रात का खाना खाकर घरों से चीड़ व भीमल की लकड़ी से बनी मशालें लेकर पंचायती आंगन में होलियात निकालते हैं। आंगन में ढोल-बाजे के साथ पूरी रात नाच-गाने का दौरा चलता है।

जौनसार बावर क्षेत्र में बूढी दीवाली के समापन पर हर गांव में काठ का हाथी तो कहीं हिरन बनाकर गांव के स्याणा को बिठाकर हाथों में तलवार लेकर रात को सात कंधों में बिठाकर नचाते हैं। जिसको देखने के लिए जौनसार बावर के अलावा हिमाचल व मैदानी क्षेत्रों से भी लोग आते हैं। मुख्य आर्कषण बना रहता है।

जनजाति क्षेत्र में नवरात्र में दुर्गा के नौ रूपों में से सिर्फ अष्टमी यानि महागौरी की ही पूजा होती है। प्रत्येक परिवार में घर का मुखिया नवरात्र की अष्टमी को व्रत रखता है, दिन में हलवा-पूरी से मां का पूजन किया जाता है। जौनसारी भाषा में अष्टमी पूजन को आठों पर्व कहा जाता है। जौनसार में हर त्योहार मनाने का अंदाज निराला है। अष्टमी पूजन में हर गांव में हर घर से मुखिया शामिल होते हैं। अष्टमी के दिन घर के मुखिया सपत्निक व्रत रखते हैं। देवी मां की पूजा के दौरान नए कपड़े पहने जाते हैं। उसके बाद देवी मां को कचौरी, हलवा, चावल व गाय के घी का भोग लगाया जाता है। परिवार के सभी सदस्य दूध व चावल का टीका लगाते हैं, अष्टमी के दूसरे दिन गांवों में एक दूसरे को चाय पर आमंत्रित करने का रिवाज है। जिसको हेला कहते हैं।

जौनसार बावर में एक परंपरा यह भी अनूठी है कि यहां पर दशहरा पर रावण, मेघनाद के पुतले नहीं जलाए जाते। यहां पर दहशरे को पाइंता पर्व के रूप में मनाया जाता है। जिसमें तरह तरह के व्यंजन पिनवे, चिवड़ा आदि बनाए जाते हैं। सामूहिक रूप से पंचायती आंगन में सामूहिक रूप से झेंता, रासो व हारुल नृत्य पर महिला व पुरुष समा बांधते हैं।

हर गांव में चिऊडा बनाकर एक दूसरे को प्रसाद के रूप में बांटने का रिवाज है। धान को बीस दिन तक मिट्टी के बर्तन में भिगोकर उसे भूनकर ओखली में कूटा जाता है, उसके बाद बूढ़ी दीवाली पर मंदिरों में चढ़ाने व मेहमान को बांटने के लिए चिऊड़ा बनाया गया। इस पर्व पर चिऊड़े का अपना अलग ही महत्व है और यह परंपरा का हिस्सा है।

जौनसार में बूढ़ी दीवाली पर गांव के हर परिवार से अखरोट एकत्र कर गांव के स्याणा के पास दिया जाता है। जिसे पंचायती आंगन में गांव के स्याणा द्वारा मकान की छत से अखरोटों को प्रसाद के रूप में फेंकने की परंपरा है। इसी को स्थानीय भाषा में भीरूडी कहा जाता है। इस दिन हर गांव के लोग कुल देवता महासू, चालदा, बौठा, वाशिक, पवासिक, शिलगुर विजट, चूड़ू, परशुराम देवताओं के मंदिरों में जाकर माथा टेकते हैं तथा चिऊडा व अखरोट भी चढाते हैं। (d.g)

 

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