उत्तराखंड में पहली निर्वाचित सरकार से लेकर अब तक हर सरकार में हुआ ये काम

देहारादून- थराली विधानसभा क्षेत्र के जनप्रतिनिधि के लिए हुए उपचुनाव संपन्न होने के बाद अब सभी को इंतजार है 31 मई का। चंद घंटों के बाद थराली उपचुनाव की तस्वीर साफ हो जाएगी। किसके सिर जीत का सेहरा बंधा सबको पता चल जाएगा।

बहरहाल काबिले गौर बात ये है कि उत्तराखंड राज्य में पहली निर्वाचित सरकार से लेकर अब तक हर सरकार के राज में राज्य ने उपचुनाव का दंश झेला है।

हालांकि इससे पहले हर बार सियासी हालात उपचुनाव की वजह बने, ये पहली मर्तबा हो रहा है कि जनप्रतिनिधि का असमय निधन होने से सीट खाली हुई और चुनाव कराने पड़े। वरना इस उपचुनाव से पहले तो जानबूझ कर उपचुनाव का ताना-बाना बुना गया है।

जरा याद कीजिए साल 2002 की पहली निर्वाचित सरकार और कांग्रेस आलाकमान का फैसला। कांग्रेस ने तमाम योग्य विधायकों के होते हुए भी पैराशूट सीएम को तरजीह दी और विकास पुरूष नारायण दत्त तिवारी को उत्तराखंड की कमान सौंप दी।

तिवारी सदन का हिस्सा नहीं थे लिहाजा उनके चेले योगाम्बर सिंह ने अपनी रामनगर की सीट विकास पुरुष के सम्मान में छोड़ दी। जिस पर उपचुनाव हुए और नारायण तिवारी रामनगर विधायक के तौर पर सदन के सदस्य बने और सरकार के मुखिया।

साल 2007 में कांग्रेस सरकार का कार्यकाल पूरा हुआ। आम चुनाव हुए भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला। लेकिन एक बार फिर इतिहास सामने आ खड़ा हुआ। भाजपा आलाकमान ने सूबे के दूसरे मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के होते हुए भी राज्य की कमान सांसद जनरल बी.सी.खंडूड़ी को सौंप दी।

लेकिन जनरल साहब भी सदन के सदस्य नहीं थे, लिहाजा सियासी तिकड़म भिड़ाई गई। मुहब्बत, जंग और सियासत की दुनिया में सबकुछ जायज पर अमल हुआ। वैचारिक विश्वासघात हुआ और धुमाकोट से निर्वाचित कांग्रेस विधायक जनरल टी.पी.एस रावत ने इस्तीफा दे दिया।

राज्य ने फिर उपचुनाव का सामना किया। जनरल खंडूड़ी धुमाकोट से उपचुनाव लड़े जीते और उत्तराखंड विधानसभा के निर्वाचित सदस्य बने जबकि जनरल टीपीएस रावत उपचुनाव के जरिए लोकसभा दाखिल हुए।

भाजपा सरकार का कार्यकाल 2012 में पूरा हुआ फिर आम चुनाव हुए। सरकार कांग्रेस की बनी लेकिन आलाकमान को राज्य के विधायकों में से कोई भी सीएम के काबिल महसूस नहीं हुआ। लिहाजा आलाकमान ने टिहरी सांसद विजय बहुगुणा की ताजपोशी सीएम पद कर दी। पैराशूट सीएम बहुगुणा भी सदन का हिस्सा नहीं थे। ऐसे में कांग्रेस ने भी भाजपा की बोई फसल काटी।

सितारगंज के भाजपा विधायक किरण मंडल ने कांग्रेसी सीएम विजय बहुगुणा के लिए अपनी सीट छोड़ दी। विजय बहुगुणा भी उपचुनाव के जरिए सितारगंज के विधायक बने और उत्तराखंड विधानसभा के सदस्य बने जबकि किरण मंडल को केएमवीएन का अध्यक्ष बनाकर लाल बत्ती से नवाजा गया।

लेकिन गुटों में बटी कांग्रेस के दूसरे गुट को चैन न था। उधर साल 2013 में केदार आपदा का कहर टूटा। सितारगंज के विधायक और सूबे के तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा बिगड़े माहौल का संभाल नहीं पाए। इतनी छीछालेदर हुई कि आलाकमान को जज साहब को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

जबकि बहुगुणा के धुर विरोधी हरीश रावत की ताजपोशी सीएम पद पर कर दी। लेकिन हरदा भी सदन का हिस्सा नहीं थे। लिहाजा हरदा के लिए उनके चेले हरीश धामी ने अपनी धारचूला सीट छोड़ दी। राज्य को फिर उपचुनाव का सामना करना पड़ा। हरदा भी उपचुनाव के जरिए उत्तराखंड विधानसभा का हिस्सा बने।

साल 2017 में कांग्रेस सरकार का कार्यकाल खत्म हुआ। फिर चुनावी घडी सामने थी। चुनाव हुए मोदी रथ पर सवार भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। अनुभवी नेताओं की जमात सदन का हिस्सा थी। ऐसे में माना जा रहा था कि भाजपा विधायकों में से ही नेता चुनेगी। वही हुआ और राज्य के सीएम की जिम्मेदारी त्रिवेंद्र रावत को सौंपी गई। तस्वीर साफ हो गई थी कि साथ ही ये भी पक्का हो गया था कि इस बार राज्य को उपचुनाव का सामना नहीं करना पड़ेगा।

लेकिन ऐसा हुआ नहीं, अचानक से थराली सीट से निर्वाचित भाजपा विधायक मगनलाल शाह की तबियत खराब हो गई। पहले बीमारी का पता नहीं चल पाया जब तक रिपोर्ट आई तब तक विधायक मगनलाल शाह को स्वाइन फ्लू लील गया।

विधायक के असमय निधन से एक बार राज्य ने फिर साल 2018 में उपचुनाव का सामना किया। आने वाली 31 मई को इस उपचुनाव की तस्वीर भी साफ हो जाएगी कि जनता ने किसे जनादेश दिया है।

बहरहाल इस सरकार को भी उपचुनाव का सामना करना पड़ा। यानि उत्तराखंड की अब तक कोई भी निर्वाचित सरकार ऐसी नहीं है जिसने उपचुनाव न झेला हो।

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