तो थराली उपचुनाव में सहानुभूति की लहर ने बिगाड़ा कांग्रेस का खेल !

देहरादून- थराली उपचुनाव का जनादेश भाजपा के पक्ष मे गया। दांव पर लगी भाजपा की साख बच गई लेकिन देखा जाए तो चुनाव के नतीजे मानों इशारा कर रहे हैं कि कांग्रेस की लहर में भाजपा की मुन्नी देवी की कश्ती जीत के साहिल तक पहुंच गई।

दरअसल ये बात इसलिए कही जा रही है कि उत्तराखंड में पहली निर्वाचित नारायण दत्त तिवारी की सरकार से लेकर मौजूदा टीएसआर सरकार तक हर राज में राज्य ने उपचुनावों का सामना किया है।  हर उपचुनाव में सत्ता के उम्मीदवार ने जीत हासिल की।

लेकिन उपचुनाव में सत्ता के उम्मीदवारों को मिले मतों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि सत्ता पक्ष के प्रत्याशी ने विपक्षी दावेदार को करीब फटकने भी नहीं दिया। सिवाय बी.सी.खंडूड़ी सरकार में विकासनगर पर हुए उपचुनाव को छोड़ दिया जाए तो।

 दरअसल उस वक्त विकासनगर से भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने लोकसभा चुनाव लड़ने की खातिर भाजपा से बगावत की और बसपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ बैठे। लिहाजा सीट खाली हुई और भाजपा ने विकासनगर उपचुनाव में कुलदीप सिंह को टिकट दिया जबकि कांग्रेस ने नवप्रभात को।

इस उपचुनाव में कांटे का मुकाबला हुआ और भाजपा उम्मीदवार कुलदीप ने कांग्रस प्रत्याशी नवप्रभात को महज 596 वोटों से हराया था। वरना राज्य के उपचुनाव का इतिहास गवाह है कि सत्ता के उम्मीदवार ने विपक्षी को सांस लेने लायक भी नहीं छोड़ा।

जरा याद कीजिए राज्य की पहली निर्वाचित सरकार और एन.डी.तिवारी के लिए योगाम्बर सिंह का रामनगर सीट छोड़ना। तिवारी जी का उपचुनाव लड़ना और 32913 वोट हासिल करना जबकि भाजपा उम्मीदवार रामसिंह एडवोकेट का महज 9693 वोट पर ही सिमट कर रह जाना।

वहीं राज्य की अगली निर्वाचित भाजपा सरकार में सीएम बीसी खंडड़ी का घुमाकोट सीट पर उपचुनाव लड़ना और 22708 वोट हासिल कर कांग्रेस उम्मीदवार सुरेंद्र सिंह नेगी को 8537 वोटों पर रोक देना।

उसके बाद साल 2012 में बनी कांग्रेस सरकार में तो राज्य ने तीन तीन उपचुनाव देखे। पहले पूर्व सीएम विजय बहुगुणा को सदन का सदस्य बनने के लिए सितारगंज से भाजपा विधायक किरण मंडल ने सीट छोड़ी।

किरण 2012 के आम चुनाव में 29280 वोट हासिल किए थे। लेकिन उसी सितारगंज पर जब उपचुनाव हुआ और मुख्यमंत्री ने उपचुनाव लड़ा तो विजय बहुगुणा को रिकार्ड तोड़ 53766 मत हासिल हुए। जबकि उनके निकटम प्रतिद्वंदी भाजपा के प्रकाश पंत को सिर्फ 13812 मत ही हासिल हुए।

उसके बाद परिस्थितिवश बने सीएम हरीश रावत को भी सदन का हिस्सा बनने के लिए उपचुनाव का सामना करना पड़ा। हरदा के लिए उनके चेले हरीश धामी ने सीट छोड़ी और धारचूला जैसे दूरस्थ इलाके में भी हरदा ने अपने प्रतिद्वन्दी भाजपा के बी.डी.जोशी को बीस हजार से ज्यादा मतों से परास्त किया।

वहीं उसी कार्यकाल के दौरान बसपा के भगवानपुर विधायक और तत्कलीन कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र राकेश के निधन होने से रिक्त हुई सीट पर उपचुनाव हुआ। सियासी पासे डाले गए और सुरेंद्र राकेश की पत्नी ममता राकेश को कांग्रेस ने उपचुनाव में प्रत्याशी बनाया।

जनता ने ममता का साथ दिया और उपचुनाव में ममता राकेश ने  59205 मत हासिल किए जबकि उनके निकटम प्रतिद्वंदी राजपाल को 36 हजार के करीब मत मिले।

अब इस साल 2018 के थराली उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार मुन्नी देवी ने सिर्फ 1900 मतों के अंतर से कांग्रेस उम्मीदवार प्रो जीतराम को हराया। जबकि आम चुनाव में उनके पति स्व. मगनलाल शाह ने 4800 मतो से प्रो.जीतराम को पराजित किया था।

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