पीएम सर! पहाड़ की जवानी ओर पहाड़ का पानी पहाड़ के काम लादो ,नही तो पहाड़ में सिर्फ पहाड़ ही रह जायेगा!!

देहरादून (पं. चंद्रबल्लभ फोंदणी)- ल्यावा जी सुणा बात, पलायन आयोग न अफरी पैली रिपोर्ट सरकार सणी दियाली।
पर रिपोर्ट में ऐसा सच है जिसे सुनकर पैरों तले जमीन खिसर रही है। जबकि चुनावी घड़ी में पीएम मोदी ने उत्तराखंड से वादा किया था कि पहाड़ की जवानी और पानी पहाड़ के काम आएगी।
हां जी ठीक सुना आपने,  ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के उपाध्यक्ष एस.एस.नेगी ने अपनी पहली रिपोर्ट बीते रोज उस सरकार को सौंप दी है जिसने उसकी नियुक्ति की थी।
लेकिन जिस राज्य में सुगम दुर्गम के नाम पर कर्मचारी नेता अपनी राजनीति चमकाते हों और जिस राज्य के तकरीबन सभी 70-71 विधायक देहरादून या मैदानी जिलों में अपना एक और पक्का आवास बना चुके हों या बनाने की जुगत भिड़ा रहे हों उस राज्य में पलायन आयोग की  रिपोर्ट पर मैदान की सहूलियतों के मोह माया में जकड़ी सरकार कुछ कवायद कर पाएगी कहना मुश्किल है।

वहीं अब

इस रिपोर्ट में साख्यंकी के छात्रों के लिए बहुत कुछ है लेकिन आयोग ने पलायन के जो कारण अपनी रिपोर्ट में दिए हैं वो कोई अदभुत नहीं हैं और न ही ऐसे हैं कि जिसके बारे में सरकार बहादुर जानती न हो। या अब तक कि सरकारों को पता न रहा हो। ऐसे में पलायन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट के बारे में जानकार निराशा ही हाथ लगती है।
आयोग की प्रथम रिपोर्ट(उत्तराखण्ड के ग्राम पंचायतों में पलायन की स्थिति पर अंतरिम रिपोर्ट) के विषय में बताया कि उत्तराखण्ड के 7950 ग्राम पंचायतों का सर्वेक्षण जनवरी एवं फरवरी, 2018 में ग्राम्य विकास विभाग के माध्यम से कराया गया। आयोग की टीम ने सभी जिलों का दौरा करके लोगों से ग्राम्य विकास एवं पलायन के विभिन्न पहलुओं पर परामर्श लिया। तब जाकर आयोग को पता चला कि 10 साल में पौने चार लाख लोग पहाड़ी जिलों से पलायन कर गए हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार ग्राम पंचायत स्तर पर मुख्य व्यवसाय कृषि 43 प्रतिशत एवं मजदूरी 33 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 वर्षों में 6338 ग्राम पंचायतों से 3,83,726 व्यक्ति अस्थाई रूप से पलायन कर चुके हैं। यह लोग घर में आते-जाते रहते हैं, लेकिन अस्थायी रूप से रोजगार के लिये बाहर रहते हैं।
इसी अवधि में 3946 ग्राम पंचायतों से 1,18,981 लोग स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार ग्राम पंचायतों से 50 प्रतिशत लोगों ने आजीविका एवं रोजगार की समस्या के कारण, 15 प्रतिशत ने शिक्षा की सुविधा एवं 8 प्रतिशत ने चिकित्सा सुविधा के अभाव के कारण पलायन किया है।
नेगी ने बताया कि ग्राम पंचायतों से पलायन करने वालों की आयु 26 से 35 वर्ष वर्ग में 42 प्रतिशत, 35 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में 29 प्रतिशत तथा 25 वर्ष से कम आयु वर्ग में 28 प्रतिशत है।
ग्राम पंचायतों से 70 प्रतिशत लोग प्रवासित होकर राज्य के अन्य स्थानों पर गए तथा 29 प्रतिशत राज्य से बाहर एवं लगभग 1 प्रतिशत देश से बाहर गए।
उन्होंने कहा कि राज्य में लगभग 734 राजस्व ग्राम तोक मजरा 2011 की जनगणना के बाद गैर आबाद हो गए हैं। इनमें से 14 अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से हवाई दूरी के 05 कि.मी. के भीतर हैं।
राज्य में 850 ऐसे गांव हैं, जहां पिछले 10 वर्षों में अन्य गांव शहर,  कस्बों से पलायन कर उस गांव में आकर लोग बसे हैं। राज्य में 565 ऐसे राजस्व ग्राम,तोक,मजरा हैं, जिनकी आबादी 2011 के बाद 50 प्रतिशत घटी है। इनमें से 6 गांव अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से हवाई दूरी के 5 कि.मी. के भीतर है।
रिपोर्ट के आधार पर 9 पर्वतीय जिलों के 35 विकास खण्ड चिन्हित किए गए हैं, जिनमें आयोग की टीम जाकर लघु-मध्यम एवं दीर्घ अवधि की कार्ययोजना बनाएगी, जिससे बहुक्षेत्रीय विकास तेजी से बढ़ सके।
हां एक बात जरूर है कि रिपोर्ट को जानने के बाद ये जरूर महसूस होता है कि जहां राज्य निर्माण के बाद पहली अंतरिम सरकार उत्तराखंड को सजाने-संवारने का ब्लू प्रिंट तैयार नहीं कर सकी।
वहीं पहली चुनी तिवारी सरकार ने पहाड़ी जिलों से जो सौतेला बर्ताव किया और उसके बाद की सरकारों ने इसे जारी रखा उससे पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की अंदरूनी हालत खराब हुई। जबकि रही सही कसर  राजधानी चयन आयोग ने पूरी कर दी। हालांकि ये भी दुर्भाग्य है कि अब तक इस पहाडी़ राज्य को स्थाई राजधानी नहीं मिल पाई है ।
वहीं अब तक की सरकारों के काम-काज और मैदानी जिलों में खुले अफसरों के कैंप कार्यालय, आयोगों और सभी महकमों के मुख्यालय साबित करते हैं कि सरकार पहाड़ी जिलों के प्रति कितनी उदासीन है उसकी सरकारी मशीनरी की नजर में पहाड़ी जिले कितने अछूत हैं।
हुजूर-ए-आला! अगर ये पहाड़ी जिले आपकी सोच के चलते अछूत हो गए तो इनको भी आराक्षण दो ताकि ये सहूलियतों से चकाचक हो सकें। इन पहाड़ी जिलों में भी वैसे ही योजनाओं दफ्तरों का भोजन बनवाओ और  अपने सुविधाभोगी अफसरों समेत खुद भी वहां रहने का साहस दिखाओ! वरना पलायन आयोग की रिपोर्ट भी कुछ नहीं कर सकती।

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