थराली उपचुनाव- सिर्फ चुनाव नहीं अग्निपरीक्षा है दिग्गजों की

देहरादून- थराली उपचुनाव सियासत का लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। 26 मई को चुनाव प्रचार खत्म हो जाएगा। 28 मई को वोट डाले जाएंगे। लिहाजा इस वक्त चुनाव प्रचार का आखिरी दौर उफान पर है।
कांग्रेस और भाजपा ने थराली का चुनाव जीतने के लिए जान की बाजी लगा  रखी है। स्थानीय मुद्दों से लेकर राष्ट्रीय सवालों की घुट्टी पिलाई जा रही है, फिर भी बेहतरी अस्पताल, स्तरीय तालीम की बात नदारद है।
पलायन पर घड़ियाली आसूं बहाए जा रहे हैं। स्थानीय भाषा में भाषण से लेकर सहानुभूति और भावुकता का तड़का दिया जा रहा है।
दोनो पार्टियों के दिग्गजों थराली से लेकर घाट, खेत्रा, देवाल जैसे दूरस्थ इलाकों में एडियां रगड़ रहे हैं। घाट-घाट का पानी पिया जा रहा है। जीतने के बाद जिन इलाकों में फिर चुनावी घड़ी में जाना है उन इलाकों में आजकल रात गुजर रही है।
कोई उड़नखंटोलों में दाखिल हो कर भीड़ जुटा रहा है तो कोई महंगे पेट्रोल,डीजल के जमाने में कार या पैदल ही जुलूस की शक्ल में मतदाताओं की दहलीज पर हाथ जोड़े याचक बना खड़ा है।
माहौल वही चुनावी है लेकिन उपचुनाव होने के नाते माएने बदल गए हैं।   थराली उपचुनाव का ताजा अर्थ  त्रिवेंद्र सरकार बनाम हरीश रावत जैसा निकल रहा है।
दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने करीबी और कांग्रेस उम्मीदवार प्रो.जीतराम के पक्ष में जनता से समर्थन, मतदान और जीत की अपील कर रहे हैं। तो भाजपा के दिग्गज भी अपने कंडीडेट मुन्नी देवी शाह के लिए जी जान से जुटे हैं।
दोनो पार्टियों की मजबूरी है। जीत-हार सिर्फ उत्तराखंड तक ही सिमटी रहती तो कोई बात नहीं थी लेकिन इस उपचुनाव का संदेश दूर देश तक जाना है।
कर्नाटक का नाटक खत्म होने के बाद अब जनता की नजर थराली उपचुनाव पर जमी हैं। प्रो. जीतराम के हाथ बाजी लगती है तो संदेश जाएगा कि  उत्तराखंड के सियासी फलक में हरीश रावत का सितारा अभी बुलंद है। 2014 की हार महज लहर थी, मोदी मैजिक खत्म हो गया है।
जबकि मुन्नीदेवी को जीत मिलती है तो मैसेज होगा कि मोदी का जलवा जिंदा है। डबल इंजन सरकार बेहतरीन काम कर रही है और त्रिवेंद्र रावत सरकार पर जनता का भंरोसा कायम है।
यानि थराली चुनाव दोनो पार्टियों के दिग्गजों के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं। जीत मिली तो उत्सव होगा और हार मिली तो होलिका सा नेस्तनाबूद हो जाना पड़ेगा।कार्यकर्ताओं का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन यश-अपयश का सामना हरदा और तिरदा को करना ही होगा।
वैसे भी 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए वक्त कम है। थराली उपचुनाव जनता के सियासी स्वाद को भी जाहिर कर देगा । उसी के हिसाब से सियासी दलों को 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए अपने तरकस में तेज तीर खोंसने होंगे।

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