राज्य का बजट,माली हालत और हरदा

भले ही त्रिवेंद्र सरकार ने अपना बजट पेश कर दिया हो लेकिन 45585 करोड़ के इस बजट में राज्य का विकास कम कर्ज का बोझ बढ़ता ज्यादा दिखाई दे रहा है। हालांकि ये पहली बार नही है जब साल दर साल राज्य पर कर्ज का शिकंजा कसता जा रहा हो लेकिन इस बढते कर्ज का निपटारा कैसे होगा इस पर कोई भी सरकार कुछ कारगर रणनीति बनाने में आज तक सफल नही दिखी है। आपको बता दें कि वित्तीय वर्ष 2018-19 में कर्ज का बोझ बढ़कर 47580 करोड़ से ज्यादा होने जा रहा है। और राज्य सरकार को अपने खर्चों की पूर्ति के लिए ऋण लेने को मजबूर होना पड़ रहा है। राज्य गठन के वक्त राज्य के हिस्से में 4430.04 करोड़ कर्ज आया था।

राज्य के जन्म के साथ मिला यह कर्ज वित्तीय वर्ष 2016-17 में 40793.70 करोड़ होने का अनुमान बजट आंकड़ों में लगाया गया था। इससे पहले वित्तीय वर्ष 2015-16 में 34762.32 करोड़ और वित्तीय वर्ष 2014-15 में यह कर्ज 30579.38 करोड़ था। 31 मार्च, 2017 तक कर्ज की धनराशि बढ़कर 41644 करोड़ हो गया था। यह कर्ज 31 मार्च, 2018 तक बढ़कर 47759 करोड़ हो रहा है। चालू वित्तीय वर्ष में अब 6000 करोड़ से ज्यादा कर्ज लिया जा चुका है।  ऋणग्रस्तता की स्थिति में सरकार को अल्पबचत राशि के भुगतान से कुछ राहत मिलने जा रही है। अनुमान लगाया जा रहा है कि 31 मार्च, 2018 तक राज्य पर ऋणग्रस्तता की कुल धनराशि 41251.11 करोड़ रह जाएगी।वित्तीय वर्ष 2018-19 में कर्ज की यह राशि 47580.42 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। दरअसल, राज्य की माली हालत खराब है। गैर विकास मदों में खर्च जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसकी पूर्ति करने में मुश्किलें पेश आ रही हैं। हालत ये है कि खर्च चलाने के लिए सरकार को गाहे-बगाहे कर्ज लेने को मजबूर होना पड़ रहा है। राज्य सरकार के कार्मिकों को सातवें वेतनमान का बकाया एरियर का भुगतान करने के लिए राज्य सरकार को फिर कर्ज लेने को मजबूर होना पड़ सकता है। आर्थिक संसाधन बढ़ाना सरकार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है क्योंकि 33.51 फीसदी वेतन भत्ते मज़दूरी पर खर्चा है और 1488 करोड़ रूपये केंद्रीय मदद में कमी आई है महज़ 12.73 पैसा ही बजट में विकास कार्यों के लिये खर्च किय़ा जा सकता है लिहाज़ा त्रिवेंद्र रावत की सरकार ने भले ही इस बजट में पहाड़, मैदान, स्वास्थय सेवा, किसान ,गरीब ,गांव-शहर,शिक्षा, परिवहन सब क्षेत्रों के बारे में सोचा है और करमुक्त बजट लेकर आए हैं लेकिन अब असली परीक्षा डबल इंजन की सरकार की है कि वो अब केंद्र से अपना हक मांगते रहें। अब देखना ये होगा कि केंद्र अब सही मायने में राज्य की कितनी मदद करता है।

अब है डबल इंजन की असली परीक्षा क्योंकि राज्य के पास धन नही है और बजट करमुक्त है वेतन देने के लिए भी राज्य के पास पैसा नही है फिर चाहे एरियर की बात क्यों ना हो यही नही सातवें वेतनमान की चुनौती भी राज्य सरकार के सर पर खड़ी है। ऐसे में अब राज्य सरकार को केंद्र पोषित योजनाओं से ज्यादा केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी परियोजनाओं की सैद्धांतिक सहमति वाली योजनाओं से बड़ी उम्मीदें हैं। लिहाज़ा अब तो यही कहेंगे कि यहां का सिंगल इंजन डबल इंजन के बगैर कुछ नहीं।

वहीं सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बजट को देखकर कहा है कि त्रिवेंद्र सरकार ने  इतिहास बना डाला है क्योंकि इस बजट में कुछ भी नहीं हैं उनके पहले बजट की तरह ये बजट भी खाली-खाली है। त्रिवेंद्र सरकार के इस बजट में पलायन रोकन के लिए कोई नीति ही नही दिखाई दे रही है और नाहि रोज़गार कैसे युवाओं को दिलाएंगे उसका भी कोई तरीका नही बताया गया है। हरीश रावत ने कहा है कि वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने राज्य की आय को कैसे बढ़ाया जाए इस पर भी कोई बात नही की है साथ ही हरदा का दर्द झलका और वो बोल पड़े कि जो योजनाएं उन्होंने उत्तराखंड की भलाई के लिए शुरू की थी उन योजनाओं पर ये त्रिवेंद्र सरकार काम ही नही कर रही है वित्त मंत्री प्रकाश पंत पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा है कि पूरी कौशल विकास योजना में 10 फ़ीसदी से भी अधिक लोगों को रोजगार नहीं मिला तो वित्त मंत्री कैसे कैसे एक लाख से अधिक रोज़गार दे सकते हैं। प्रदेश की आय के स्रोत को लेकर वित्त मंत्री ने कुछ नहीं कहा है अगर वह कोई केंद्रीय योजना के ज़रिये पैसा लाते हैं तो उसका भी ज़िक्र करना चाहिए, वह नहीं किया। हरीश रावत ने कहा कि पूरा बजट बिल्कुल खोखला है, उत्तराखंड के लिए कुछ नहीं है। सरकार ने तो यह भी नहीं बताया है कि गैरसैंण को किस तरीके से विकसित किया जाएगा।

 

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