पूरे राज्य मे हरेला ही हरेला !

आपको सपरिवार बोलता उत्तराखंड़ के पूरे परिवार की तरफ से हरेला  पर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएें    
जी रये, जागि रये
धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये
सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो
दूब जस फलिये,
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये।
{अर्थात-हरियाला तुझे मिले, जीते रहो, जागरूक रहो, पृथ्वी के समान धैर्यवान,आकाश के समान प्रशस्त (उदार) बनो, सूर्य के समान त्राण, सियार के समान बुद्धि हो, दूर्वा के तृणों के समान पनपो,इतने दीर्घायु हो कि (दंतहीन) तुम्हें भात भी पीस कर खाना पड़े और शौच जाने के लिए भी लाठी का उपयोग करना पड़े।} बीजेपी नेता जोगेंद्र पुंडीर कहते है कि हरेले का पर्व हमें नई ऋतु के शुरु होने की सूचना देता है। भारत दुनिया का एकमेव ऐसा देश है जहाँ छह ऋतुयें होती हैं- बसन्त,ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु। यह त्यौहार हिन्दी सौर पंचांग की तिथियों के अनुसार मनाये जाते हैं। वर्षा ऋतु की शुरुआत श्रावण मास से होती है। श्रावण कर्क संक्रान्ति अर्थात श्रावण गते एक को हरेला मनाया जाता है। बसन्त ऋतु की शुरुआत चैत्र मास से होती है, सो चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को हरेला मनाया जाता है। इसी प्रकार से शरद ऋतु की शुरुआत आश्विन (अशौज) माह से होती है, इसलिए आश्विन शुक्ल दशमी को हरेला मनाया जाता है। किसी भी ऋतु की सूचना को सुगम बनाने और कृषि प्रधान क्षेत्र होने के कारण ऋतुओं का स्वागत करने की परम्परा बनी होगी।।          हरेला शब्द का स्रोत हरियाली से है, पूर्व में इस क्षेत्र का मुख्य कार्य कृषि होने के कारण इस पर्व का महत्व यहां के लिये विशेष रहा है। हरेले के पर्व से नौ दिन पहले घर के भीतर स्थित मन्दिर में या ग्राम के मन्दिर के भीतर सात प्रकार के अन्न (जौ, गेहूं, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट) को रिंगाल की टोकरी में रोपित कर दिया जाता है। इसके लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है, पहले रिंगाल की टोकरी में एक परत मिट्टी की बिछाई जाती है, फिर इसमें बीज डाले जाते हैं। उसके पश्चात फिर से मिट्टी डाली जाती है, फिर से बीज डाले जाते हैं, यही प्रक्रिया ५-६ बार अपनाई जाती है। इसे सूर्य की सीधी रोशनी से बचाया जाता है और प्रतिदिन सुबह पानी से सींचा जाता है। ९ वें दिन इनकी पाती (एक स्थानीय वृक्ष) की टहनी से गुड़ाई की जाती है और दसवें यानि कि हरेले के दिन इसे काटा जाता है। काटने के बाद गृह स्वामी द्वारा इसे तिलक-चन्दन-अक्षत से अभिमंत्रित (“रोग, शोक निवारणार्थ, प्राण रक्षक वनस्पते, इदा गच्छ नमस्तेस्तु हर देव नमोस्तुते” मन्त्र द्वारा) किया जाता है, जिसे हरेला पतीसना कहा जाता है। उसके बाद इसे देवता को अर्पित किया जाता है, तत्पश्चात घर की बुजुर्ग महिला सभी सदस्यों को हरेला लगाती हैं। लगाने का अर्थ यह है कि हरेला सबसे पहले पैरो, फिर घुटने, फिर कन्धे और अन्त में सिर में रखा जाता है और आशीर्वाद स्वरुप यह पंक्तियां कहीं जाती हैं।जी रये, जागि रये
धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये
सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो
दूब जस फलिये,
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये।।
{अर्थात-हरियाला तुझे मिले, जीते रहो, जागरूक रहो, पृथ्वी के समान धैर्यवान,आकाश के समान प्रशस्त (उदार) बनो, सूर्य के समान त्राण, सियार के समान बुद्धि हो, दूर्वा के तृणों के समान पनपो,इतने दीर्घायु हो कि (दंतहीन) तुम्हें भात भी पीस कर खाना पड़े और शौच जाने के लिए भी लाठी का उपयोग करना पड़े।}हरेले के साथ जुड़ी ये मान्यता भी है कि जिसका हरेला जितना बडा होगा उसे कृषि मे उतना ही फायदा होगा।.        उत्तराखण्ड में हरेले के त्यौहार को “वृक्षारोपण त्यौहार” के रुप में भी मनाया जाता है। श्रावण मास के हरेला त्यौहार के दिन घर में हरेला पूजे जाने के उपरान्त एक-एक पेड़ या पौधा अनिवार्य रुप से लगाये जाने की भी परम्परा है। माना जाता है कि इस हरेले के त्यौहार के दिन किसी भी पेड़ की टहनी को मिट्टी में रोपित कर दिया जाय, पांच दिन बाद उसमें जड़े निकल आती हैं और यह पेड़ हमेशा जीवित रहता है। ये सब जानकारी बोलता उत्तराखण्ड़ को बीजेपी नेता जोगेंद्र पुंडीर ने दी सूबे के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने पूरे प्रदेश को हरेला पर्व की सुभाकामनाए देते हुए कहा कि आओ हम सब मिलकर एक पेड़ जरूर लगाएं           तो वही पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इस मौके पर अपने गांव मे है जहा सो हरेला का त्योहार मना रहे है उत्तराखंड राज्य मे अनेक समाज सेवी भी खूब पेड़ लगा रहे है 
“तुम जीते रहो और जागरूक बने रहो, हरेले का यह दिन-बार आता-जाता रहे, वंश-परिवार दूब की तरह पनपता रहे, धरती जैसा विस्तार मिलेे आकाश की तरह उच्चता प्राप्त हो, सिंह जैसी ताकत और सियार जैसी बुद्धि मिले, हिमालय में हिम रहने और गंगा जमुना में पानी बहने तक इस संसार में तुम बने रहो…” – पहाड़ के लोक पर्व हरेेला पर जब सयानी और अन्य महिलाएँ घर-परिवार के सदस्यों को हरेला शिरोधार्य कराती हैं तो उनके मुख से आशीष की यह पंक्तियाँ बरबस उमड़ पड़ती हैं।

घर परिवार के सदस्य से लेकर गाँव समाज के खुशहाली के निमित्त की गई इस मंगल कामना में हमें जहाँ एक ओर ‘जीवेद् शरद शतंम्’ की अवधारणा प्राप्त होती है वहीं दूसरी ओर इस कामना में प्रकृति व मानव के सह अस्तित्व और प्रकृति संरक्षण की दिशा में उन्मुख एक समृद्ध विचारधारा भी साफ तौर पर परिलक्षित होती दिखाई देती है। आखिर प्रकृति के इसी ऋतु परिवर्तन एवं पेड़-पौधों, जीव-जन्तु, धरती, आकाश से मिलकर बने पर्यावरण से ही तो सम्पूर्ण जगत में व्याप्त मानव व अन्य प्राणियों का जीवनचक्र निर्भर है।

उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों विशेषकर कुमाऊँ अंचल में हरेला मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। उमंग और उत्साह के साथ मनाए जाने वाले इस पर्व को ऋतु उत्सवों में सर्वाेच्च स्थान प्राप्त है। हरेला पर्व सौरमास श्रावण के प्रथम दिन यानि कर्क संक्रान्ति को मनाया जाता है।

परम्परानुसार पर्व से नौ अथवा दस दिन पूर्व पत्तों से बने दोने या रिंगाल की टोकरियों में हरेला बोया जाता है। जिसमें उपलब्धतानुसार पाँच, सात अथवा नौ प्रकार के धान्य यथा- धान, मक्का, तिल, उड़द, गहत, भट्ट, जौं व सरसों के बीजों को बोया जाता है। देवस्थान में इन टोकरियों को रखने के उपरान्त रोजाना इन्हें जल के छींटों से सींचा जाता है। दो-तीन दिनों में ये बीज अंकुरित होकर हरेले तक सात-आठ इंच लम्बे तृण का आकार पा लेते हैं।

हरेला पर्व की पूर्व सन्ध्या पर इन तृणों की लकड़ी की पतली टहनी से गुड़ाई करने के बाद इनका विधिवत पूजन किया जाता है। कुछ स्थानों में इस दिन चिकनी मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश-कार्तिकेय के डिकारे (मूर्त्तियाँ) बनाने का भी रिवाज है। इन अलंकृत डिकारों को भी हरेले की टोकरियों के साथ रखकर पूजा जाता है।

हरेला पर्व के दिन देवस्थान में विधि-विधान के साथ टोकरियों में उगे हरेले के तृणों को काटा जाता है। इसके बाद घर-परिवार की महिलाएँ अपने दोनों हाथों से हरेले के तृणों को दोनों पाँव, घुटनों व कन्धों से स्पर्श कराते हुए और आशीर्वाद युक्त शब्दों के साथ बारी-बारी से घर के सदस्यों के सिर पर रखती हैं।

इस दिन लोग विविध पहाड़ी पकवान बनाकर एक दूसरे के यहाँ बाँटा जाता है। गाँव में इस दिन अनिवार्य रूप से लोग फलदार या अन्य कृषिपयोगी पेड़ों का रोपण करने की परम्परा है। लोक-मान्यता है कि इस दिन पेड़ की टहनी मात्र के रोपण से ही उसमें जीवन पनप जाता है।

यदि हम गहराई से देखें तो हरेला पर्व सीधे तौर पर प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाने की भूमिका में नजर आता है। मानव के तन-मन में हरियाली हमेशा से ही प्रफुल्लता का भाव संचारित करती आई है। यह पर्व लोक विज्ञान और जैव विविधता से भी जुड़ा हुआ है। हरेला बोने और नौ-दस दिनों में उसके उगने की प्रक्रिया को एक तरह से बीजांकुरण परीक्षण के तौर पर देखा जा सकता है। इससे यह सहज पूर्वानुमान लग जाता है आगामी फसल कैसी होगी। हरेले में मिश्रित बीजों के बोने की जो परम्परा है वह बारहनाजा अथवा मिश्रित खेती की पद्धति के महत्त्व को भी दर्शाता है।

परिवार व समाज में सामूहिक और एक दूसरे की भागीदारी से मनाया जाने वाला यह लोक पर्व सामाजिक समरसता और एकता का भी प्रतीक है क्योंकि संयुक्त परिवार चाहे कितना भी बड़ा हो पर हरेला एक ही जगह पर बोया जाता है और-तो-और कहीं-कहीं पूरे गाँव का हरेला सामूहिक रूप से एक ही जगह विशेषकर गाँव के मन्दिर में भी बोया जाता है। पहले हरेले पर कई स्थानों में मेले भी लगते थे परन्तु आज वर्तमान में छखाता पट्टी के भीमताल व काली कुमाऊँ के बालेश्वर व सुई-बिसुंग में ही मेले आयोजित होते हैं।
कुल मिलाकर देखा जाय तो हरेला पर्व में लोक कल्याण की एक अवधारणा निहित है। समूचे वैश्विक स्तर पर आज पूँजीवादी और बाजारवादी संस्कृति जिस तरह प्रकृति और समाज से दूर होती जा रही है यह बहुत चिन्ताजनक बात है। ऐसे में निश्चित तौर पर लोक के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व हमें प्रकृति के करीब आने का सार्थक सन्देश देता है।

समाज और प्रकृति में हरेले की महत्ता को देखते हुए उत्तराखण्ड सरकार भी पिछले साल से सरकारी स्तर पर हरेला मनाने की कवायद कर रही है जिसके तहत राज्य में पर्यावरण और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए जन चेतना और जागरुकता पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं।

Special Courtesy :चंद्रशेखर तिवारी ……………..
पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहा उत्तराखंड.  – नेगी

देहरादून।

पर्यावरण असंतुलन बेशक आज के दौर की समस्या हो, लेकिन उत्तराखंड का जनमानस सदियो से पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहा है। उत्तराखंड में ऐसे अनेक पर्व हैं, जो पर्यावरण के लिए समर्पित हैं। हरेला का पर्व इन्हीं में से एक है। यह त्यौहार संपन्नता, हरियाली, पशुपालन और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। यह बात उत्तराखंड के प्रख्यात गायक और कवि नरेंद्र सिंह नेगी ने कही। वे गांधी पार्क में धाद संस्था द्वारा एक महीने तक चलाये जाने वाले हरेला महोत्सव का उद्घाटन करने के बाद लोगों को संबोधित कर रहे थे।

श्री नेगी ने धाद द्वारा लगातार आठवें साल हरेला महोत्सव आयोजित किए जाने की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि धाद के प्रयास से ही हरेला पर्व एक पारंपरिक लोक पर्व से आज उत्तराखंड का प्रमुख पर्यावरण पर्व बन गया है। उन्होंने लोगों से अधिक से अधिक संख्या में पौधे लगाने की अपील की उन्होंने  उपस्थित लोगों के साथ  बी मोहन नेगी की स्मृति में गांधी पार्क में पौधा भी रोपा।

इस वर्ष धाद संस्था का हरेला पर्व उत्तराखंड के प्रसिद्ध चित्रकार स्व. बी मोहन नेगी के लिए समर्पित है। गांधी पार्क में बी मोहन नेगी के कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी का भी श्री नेगी ने अनावरण किया। इस मौके पर लोक कला केंद्र के कलाकारों  ने थड़िया, चौफला और झुमेला नृत्य किया।

स्वर्गीय बी मोहन नेगी को याद करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता गीता गैरोला ने कहा कि बी मोहन नेगी ने वास्तव में पहाड़ को आवाज दी है। उनके अंदर एक समूचा पहाड़ बसता था। उन्होंने स्व. नेगी के साथ अपनी यादों को भी साझा किया। लेखक और साहित्यकार नंद किशोर हटवाल ने कहा कि बी मोहन नेगी ने गढ़वाली कविताओं को एक नया संदर्भ दिया। यदि वह गढ़वाली कविताओं के पोस्टर नहीं बनाते तो गढ़वाली रचनाएं केवल गीतों तक ही सीमित रह जाती। गति फाउंडेशन के अनूप नौटियाल ने कहा कि हर साल पेड़ लगाने के साथ ही उनकी प्रगति रिपोर्ट भी तैयार की जानी चाहिए। उन्होंने इसके साथ ही पर्यावरण के सबसे बड़े दुश्मन प्लास्टिक का भी कम से कम उपयोग करने की अपील की। साहित्यकार भारती पांडे ने हरेला पर्व की परंपराओं के बारे में विस्तार से जानकारी विस्तार से जानकारी दी। धाद के उपाध्यक्ष डीसी नौटियाल ने सरकार से लोक वाद्य कलाकारों को स्वास्थ्य संबंधी सहायता का विधिवत प्रावधान करने की मांग की। क्योंकि हाल ही में लोककलाकार शिवचरणजी को इस सहायता मिलने में बहुत विलंब हुआ। उन्होंने कहा कि लोक कलाकारों के संरक्षण के लिए सभी सरकारी  कार्यक्रमों और सरकार द्वारा सहायता प्राप्त  आयोजन में लोकवाद्य कलाकारों को कार्यक्रम के बजट की 15 परसेंट राशि दी जाए। इसके अलावा उन्होंने ऐसे कलाकारों का बीमा कराने की भी मांग की, ताकि अस्वस्थ होने की स्थिति में वे आसानी से किसी भी अस्पताल में इलाज करवा सकें। धाद के अध्यक्ष हर्ष मणि व्यास ने इस समारोह में बड़ी संख्या में आने पर लोगों का आभार जताया और हरेला महोत्सव में आने वाले दिनों में भी इसी तरह का सहयोग बनाए रखने की अपील की।

इस मौके पर अखिलेश दास, प्रमोद और हरीश दास के ढोल, दमाऊं और मशकबीन की धुन ने फिजा में रंग घोल दिया। लोक कला केंद्र की रीता भंडारी बिमला नेगी मधु कैंतुरा गरिमा ठाकुरी बीना चमोली मीनू चमोली दीपांजलि कोठारी सोनम धस्माना ने ‘रामो रामो डाली  ना काटा’ गीत गाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया और  पूनम  नैथानी नीलिमा धूलिया सोनिया कुसुम कन्नोजीया ने ई बांज बुरांश इं कुलें की डाली के साथ वृक्षारोपण का लोकगीत प्रस्तुत किया ।

इस मौके पर राजीव पांथरी, नीलम बिष्ट, मनीषा मंमगाई, लीना रावत, अंजलि रावत, मीनाक्षी जुयाल  प्रभाकर देवरानी, शिवकुमार तोमर तोमर शशि  दिवाकर विजय सिंह बिष्ट बिना कंडारी प्रेमलता सजवान ईश मोहन भट् अपूर्व आनंद, प्रशांत पसबोला, ईना बहुगुणा, गीता भट्ट, नीलम बिष्ट, त्रिलोचन भट्ट, सुरेश भट्ट, विजय जुयाल,  कल्पना बहुगुणा नीलम प्रभा वर्मा कांता घिल्डियाल सुजाता पटनी जीबी भंडारी,सोनया  गैरोला बीना डंगवाल  सत्य प्रकाश, डॉ. प्रकाश चंद्र,जितेंद्र सिंह, सुधीर जुगरान, कुलदीप सिंह भंडारी, लक्ष्मण रावत, राजेश चमोली, प्रगति, सुमित द्विवेदी, जगमोहन, मनोज बिजल्वाण, बीएस रावत, अभिषेक, शैलेश, अरुण थपलियाल,, एचवी वर्मा, फतेह सिंह रावत, पुष्प लता मंमगाई, अरुण गोयल, कुलदीप सिंह, साकेत रावत, बीएम उनियाल, मधुसूदन थपलियाल, उदयवीर सिंह पंवार, हिमांशु आहूजा, अनुज कुमार, तोताराम ढोंडियाल तन्मय ममगाईं   सहित सैकड़ों लोग मौजूद थे।

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