पहाड़ की ये सड़क ठीक होती तो बच जाती नवजात की जान दुनिया मे आते ही दम तोड़ा !

राज्य के पहाड़ी जिलो मे हो रही लगातार बरसात से जन जीवन तो खतरे मे है ही साथ ही पहाड़ की लाइफ लाइन मानी जाने वाली सड़क भी अगर टूटी हो या भुस्खलन की वजह से रास्ते या सड़क बंद हो तो बीमार गाँव के लोगो का फिर भगवान ही मालिक है ।और इस समय गर्भ वती महिला का भी जो इस समय बहुत पीड़ा मे रहती है और कोई भी हादसा इन वक़्त मे घट सकता है और एक दुःखद हादसा हो भी गया आपको बता दे कि एक नवजात ने दुनिया मे आते ही अपनी ज़िंदगी को ना कह दिया । ख़बर रुद्रप्रयाग से है जहाँ इस क्षेत्र के  पर्वतीय इलाकों में जगह जगह बंद सड़कें जिंदगी पर भी भारी पड़ने लगी हैं। रविवार को रुद्रप्रयाग जिले में प्रसव पीड़ा से गुजर ही एक महिला इसी वजह से समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाई। ओर उसके नवजात बच्चे ने दुनिया में आते ही दम तोड़ दिया। आपको बता दे कि विवाहिता का अभी फाटा स्थित अस्पताल में उपचार चल रहा है।
बोलता उत्तराखंड़ बता रहा है कि गुप्तकाशी के समीपवर्ती ल्वारा गांव निवासी रविंद्र सिंह की पत्नी मोहिता को सुबह प्रसव पीड़ा शुरू हुई। रविंद्र और उसके परिजन मोहिता को अपने निजी चौपहिया वाहन से फाटा स्थित सरकारी अस्पताल के लिए चले। पर अस्पताल से करीब एक किलोमीटर पहले खाट गांव के पास भूस्खलन की वजह से हाईवे बाधित होने से वाहन आगे ले जाना संभव नहीं हो पाया उधर गाड़ी आगे नही जा पा रही थी ओर मोहिता दर्द मे तड़प रही थी
जैसे तैसे उनके परिजन हाईवे के दूसरी तरफ जाने के लिए स्लाइडिंग जोन में पगडंडी वाले रास्ते से आगे बढ़े ही थे कि कुछ दूर चलने के बाद मोहिता की पीड़ा ओर बढ़ गई और उसे रास्ते में ही प्रसव हो गया। दूसरी तरफ से विवाहिता और परिजनों के पैदल रास्ते से अस्पताल आने का पता चलने पर फाटा अस्पताल से एएनएम और दो पुलिस कर्मी भी मदद के लिए चल दिए थे, कुछ ही देर में वह भी मौके पर पहुंच गए। ओर तब तक आसपास के ग्रामीण भी मदद के लिए वहां पहुंच गए थे।

जानकारी अनुसार प्रसव तो सकुशल हो गया था लेकिन नवजात को बचाया नहीं जा सका। ओर इस दुनिया में आने के कुछ ही क्षण बाद उसने दम तोड़ दिया। विवाहिता को परिजन जैसे तैसे फाटा स्थित अस्पताल ले गए, जहां उसकी हालत अब स्थिर बताई जा रही है। जानकारी अनुसार मुख्य चिकित्साधिकारी एसपी झा ने घटनाक्रम की पुष्टि की। उनका कहना है कि खुले में प्रसव की वजह से कई बार नवजात की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है।  ओर यही सब कुछ उस नवजात के साथ हुवा होगा। कास ये सड़क ठीक होती। कास इस समय बरसात ना होती कास गाँव के आस पास ही गर्भ वती महिलाओं के लिए कोई व्यवस्था होती तो इस मासूम को नवजात की जान बच जाती ।बस अब तो यही सोच रहै होंगे उनके परिजन । ओर एक माँ की आंखों में होगा वो दर्द जो पानी बनकर आंखों से निकल रहा होगा ।आखिर नो महीने की तपस्या के बाद वो दिन आया था जिसका इंतज़ार हर एक माँ को होता है। इस माँ के दर्द के आगे कोई कुछ भी नही। बस हम तो यही कहते है कि है भगवान तेरे सहारे है पाहड़ कि नारी हमारी मात्रशक्ति सबका तुम रखना ख्याल ।अब बस भी करो दुख दर्द के इस पहाड़ को राहत दो भगवान । और दूसरी बात सरकार से है कि जब ये आल्वेदर रोड़ बन जाएगी तब क्या इन सड़को का बंद होना या भुस्खलन होना बंद हो जायेगा ,अगर  बंद होगा तो सुखद होगा पहाड़ के लिए ,ओर यही हाल तब भी रहे तो ओर विनाश के संकेत  ओर मिलने लगेंगे फिर।

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