पहाड़ का लोक उत्सव (सातूं आठू ) जाने ख़ास जानकारी

पहाड़ का लोक उत्सव ‘सातूं-आठूं’

‘शिखर धुरा ठंडो पाणी मैंसर उपज्यो
गंगा टालू बड़ बोट लौलि उपजी’
ऊंचे शिखर की ठंडी जगह पर मैसर (महेश्वर) का जन्म हुआ और गंगा तट पर वट वृक्ष की छाया में लौलि (गौरा पार्वती) पैदा हुईं।
उत्तराखंड के पूर्वी अंचल के पिथौरागढ़ की सोर घाटी, गंगोलीहाट व बेरीनाग इलाके, बागेश्वर के दुग, कमस्यार व नाकुरी अंचल तथा काली कुमाऊं, चम्पावत के इलाकों में सातूं-आठूं के उत्सव पर यह गीत उल्लास मय वातावरण में गाया जाता है। 
भादो की पंचमी को गौरा महेश के निमित्त एक पात्र में पंच धान्य खास तौर पर गेहूं, मास,चना, लोबिया,मटर आदि को दूब सहित भिगोए जाते है जिन्हें बिरूड कहते हैं,और इन्हें घर के मंदिर में रखा जाता है। सप्तमी के दिन इन बिरुडो से गौरा महेश पूजे जाते हैं। महिलाएं सातू के दिन हाथ में डोर तथा आठू के दिन गले में डुबड़ा पहनती हैं।
सातों-आंठु का यह लोकउत्सव भादो माह की सप्तमी और अष्टमी को मनाया जाता है। एकतरह से यह वर्षाकालीन उत्सव है जिसमें महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना के साथ व्रत रखकर शिव पार्वती की उपासना करती हैं। इस उत्सव में गौरा-महेश (स्थानीयता भाषा में गवरा मैसर )की गाथा गाई जाती है। देखा जाय तो सातूं-आठूं की यह परंपरा प्रत्यक्षतः हिमालय के प्रकृति- परिवेश और जनमानस से जुड़ी है, गौरा महेश्वर की गाथा में हिमालय की अनेकानेक वनस्पतियों- बांज, देवदार, हिंसालू,घिंगारु, नीबूं, ककड़ी और चीड़ सहित अनेक वन लताओं का मनोहर वर्णन आया है। 
गौरा महेश्वर की गाथा में शिव पार्वती को आम मनुष्यों के रूप में चित्रित कर पहाड़ी जन-जीवन, मौजूद समाज के विविध पक्ष और यथार्थ को सामने लाने की विलक्षण कोशिश की गई है। एक आम स्त्री के अंदर उपजे संघर्ष, कर्म और कर्तव्य की मनसा व पीड़ा इन गाथाओं में मिलती है। लोक जीवन में रचे-बसे पात्र लौलि यानी गवरा- पार्वती अपने पिता के घर मायके को जाने वाला मार्ग प्रकृति के विभिन्न सहचरों से पूछती रहती है। यहां पर प्रतीक रूप में प्रकृति गौरा के लिए पूरी तरह एक पथ प्रदर्शक और शरण दाता की भूमिका में नज़र आती है। वह अनेकानेक वनस्पतियों से रास्ता पूछते-पूछते नीम्बू के पेड़ के पास भी आती है और कहती है-
‘बाटा में की निमुवा डाली
म्यर मैत जान्या बाटो कां होला
दैनु बाटा जालो देव केदार,
बों बाटा त्यारमैत जालो ‘
(ए रास्ते के नीम्बू की डाली जरा बता तो मेरे मायके को जाने वाला रास्ता किधर से जाता है तब नीम्बू के डाली विनम्र भाव से उत्तर देती है कि दाहिनी ओर का रास्ता शिव के केदार को जाता है और बाएं ओर का रास्ता तुम्हारे मायके जाने का रास्ता है।)
पंचमी के दिन पंचधान्य भिगोए जाते हैं, आठूं के दिन अनाज, धतूरे, फल फूलों से गौरा महेश्वर यानी शिव पार्वती की पूजा की जाती है और उनकी गाथा गाई जाती है. रात में जागरण होता है। प्रतीक रूप में शिव पार्वती की सुदंर प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। शाम को महिलाएं अपनी रंग परंपरागत परिधानों में सजधज कर गोल परिधि में नाच-गीत करती हैं। महिलायें गौरा-महेश की प्रतिमा को अपने सिर पर रखते हुए आंगन या मंदिर में लाती हैं और गीत गाती हैं।
‘उपजी गवरा हिमांचली देशा
ल्याओ चेलियो कुकुड़ी का फूला
ल्याओ चेलियो माकुड़ी का फूला
सप्तमी-अष्टमी को बड छ परब
देराणी-जिठानी को बड छ बरत
ल्याओ चेलियो धतुरी का फूला
पूजा के बाद में गौरा-महेश्वर की प्रतिमाओं का विसर्जन धारों और नौलों में किया जाता है।
इस दौरान गाँव के संजायती खोले में चांचरी, जिसे यहां ठुल खेल कहा जाता है खूब गायी जाती है-
‘सिलगड़ी का पाला चला,गिन खेलुना गड़ो
तू होए हिंसालु तोपा, मैं उड़ाना चडयो।’

वरिष्ठ सहित्यकार चन्द्रशेखर तिवारी जी की कलम से ……..

(फोटो सौजन्य : विजय वर्धन उप्रेती, पिथोरागढ़)।

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