सरकार पहाड़ के किसानो की आय है ही नही! तो दुगनी कहा से करोगे????

देवानंद पंत कि रिपोर्ट

राज्य  सरकार   का सपना हैं कि किसानों की आय 2022 तक दुगनी कर दी जाए  पर कैसे जी हाँ   खेती करने वाले यंत्रों के सहारे बाकी बाद तो  दूंन के परेड मैदान में ।4  मई को  साफ हो जायेगी     पर बोलता हैं उत्तराखण्ड कि हैं सरकार अनगिनत बादर सुवरो से पहाड़ के लोग अपनी खेती कैसे बचाये  ये इस वक़्त का सबसे बड़ा सवाल हैं क्योंकि हालत यही बता रहे हैं शाहब                                                                   एक तरफ उत्तराखंड सरकार का पलायन आयोग है तो दूसरी तरफ भाजपा की केंद्र सरकार की किसानों की आय दो गुनी करने की योजना। योजनाएं तो बहुत हैं लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ों में रह रहे किसानों के लिए ये सभी योजनाएं निरर्थक साबित हो रही हैं। क्योंकि ये योजनाएं उनके हालातों को देखकर नहीं बनाई गई हैं। वक्त के मारे उत्तराखंड के सीमांत किसानों के काम इनमें से कोई योजना नहीं आ रही है। जिन खेतों से अब तक वर्ष भर का खाद्यान्न उत्पादित हो जाता था, जंगली जानवरों सुआर, लंगूर और बंदरों के हाथ से बचकर चंद दिनों का अनाज भी खेतों से किसानों के घर नहीं पहुंच पा रहा है। इन हालात में पहाड़ के गांव का किसान मजदूरी के लिए भी गांव से पलायन करने को मजबूर है, ऐसे लोगों को गांव में ही बसाये रखने के लिए सरकार के पास न कोई योजना है, न इस जमीनी हकीकत से सरकार वाकिफ है। 

उदाहरण के तौर पर रुद्रप्रयाग जिले के जखोली ब्लाक के अंतर्गत सुदूरवर्ती खलियान बांगर गांव को ही लें। इस गांव में कभी खेतीबाड़ी एक संपन्न व्यवसाय हुआ करता था। किसान अपने परिवार के वर्ष भर खाने के लिए अनाज अपने खेतों से पैदा कर लेते थे। अब जो तस्वीर सामने है, भयानक है। जंगली सुअर रात में गेहूं के खेती को इस कदर बरबाद कर देते हैं कि उसमें सिर्फ चिल अर्थात गेहूं के डंठल ही बचे रह गए हैं। उसमें जो बालियां टूट गई, उन्हें बंदर, लंगूर आकर खा जाते हैं। इतना ही नहीं अब एक अजीब तरह के छोटी-छोटी चिड़ियों का झुंड खेतों में घुसता है, जो अंदर ही अंदर सारे दाने चट कर जाता है, हांकने पर भी उड़ता नहीं, खेतों के अंदर ही अंदर निकल कर चला जाता है। हालात यह हो गए हैं कि साल भर का अनाज देने वाले खेतों से हफ्ते भर का अनाज नहीं मिल रहा है, वह भी अत्यधिक मेहनत कर जमीन में बिखरी बालियों को उठाकर मिलता है।

यही स्थिति आसपास के गांवों थापला, जखवाड़ी, कोट, धारकुड़ी, बधाणी, उछना, पालाकुराली, उरौली आदि की है। बरबाद हो गई खेती को समेट रहे किसानों का कहना है कि वे इस कदर परेशान हो गए हैं कि आग लगा देने को मन करता है। बंदर, लंगूर और सुअर न केवल खेती को बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि ग्रामीणों पर हमला कर उन्हें घायल भी कर रहे हैं, मौत के घाट उतार रहे हैं।

भाजपा सरकार किसानों की आय दो गुनी करने का रोना रो रही है। सवाल उठता है कि इन किसानों की आय खेती से क्या है? असल में इनकी खेती से आय शून्य है। अब तक ये सिर्फ अपने परिवार के लिए साल भर के अनाज का उत्पादन करते रहे हैं। इसे बेचकर कोई आय नहीं होती है। इस तरह खेती से उनकी आय शून्य है, शून्य का दो गुना शून्य ही होता है। फिर किसानों को क्या मिला? दरअसल भाजपा की किसानों की आय दो गुना करने की योजना राष्ट्रीय स्तर पर बनाई गई है। जो कम से कम उत्तराखंड जैसे हालातों वाले पहाड़ों में लागू नहीं होती। हरिद्वार, देहरादून, उधमसिंह नगर में यह योजना लागू हो सकती है। सवाल पहाड़ों में उजड़ रहे किसानों का है। सवाल जंगली जानवरों के प्रभाव से खेती के पूरी तरह चैपट हो जाने का है। ऐसे किसानों के लिए राज्य सरकार की क्या वैकल्पिक योजना है? धरातल पर देखें तो सरकार के पास ऐसे किसानों के लिए कोई वैकल्पिक योजना नहीं है, राज्य सरकार वही आय दो गुनी करने की योजना का राग अलाप रही है, जो इन किसानों के लिए निरर्थक है।

इन हालात में उनकी आय दो गुना कैसे होगी? इस सवाल का सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। न ही पलायन आयोग की नजरों में ऐसे किसानों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था है। इन हालात में किसान मजदूरी करने के लिए भी गांव से पलायन करने को मजबूर है। पहले ही पहाड़ की खेती मौसम की मेहरबानी पर निर्भर रही है। अब जंगली जानवरों ने इसे पूरी तरह चैपट कर दिया है। इस वजह से पहाड़ों में बचे खुचे लोग भी पहाड़ों से निकल रहे हैं। उन्हें न तो किसानों की दोगुनी आय वाली योजना रोक पा रही है और न पलायन आयोग।  बोलता उत्तराखण्ड ने ये मत्वपूर्ण ख़बर उत्तराखण्ड समाचार से एकत्र की हैं

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