पांडेय जी अब क्या होगा बल? कैसे सुधारोगे आप इस निपट शिक्षा विभाग को !

वाह रे मेरे उतराखंड के शिक्षा विभाग कही तो राज्य के लगभग 40 से जायदा सरकारी स्कूलों मे छात्रों की सख्या 10 से कम है ओर इन स्कूलों मे टीचर की सख्या 2 है । इन स्कूलों को बंद करने के लिए भी कहा गया है पर ये तब भी चल रहे है ।और इस कारण विभाग को लाखों का नुकसान भी खूब हो रहा है।                  तो दूसरी तरफ बड़कोट तहसील, गौना गांव के अंदर संचालित प्राइमरी स्कूल एक ही शिक्षा मित्र के भरोसे चल रहा है। ताजुब है हमारे उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था के लिए हमारे शिक्षा मंत्री पांडेय जी भले ही पूरा जोर इस विभाग पर लगा कर काम कर रहे है पर ये बीमारी 16 साल से चली आ रही है इसको दूर करने के लिए प्रयाप्त समय चाइए । खेर आपको बता दे कि  उतरकाशी बड़कोट तहसील गोना गाँव का विद्यालय मुख्य राजगढ़ी मोटर मार्ग पर स्थित है , जिसमे कक्षा 1 से 5 तक के 25 बच्चे पठन -पाठन कर रहे है। जहाँ मात्र एक शिक्षा मित्र है। विद्यालय में एक ही अध्यापिका किसी प्रकार पांचों कक्षाओं के पांच विषयों कों पढ़ाती है, ये उनसे बेहतर कौन जान सकता है। एकमात्र शिक्षिका सुनीता चौहान का कहना है कि एक शिक्षक के द्वारा स्कूल संचालित करना अत्यंत कठिन है। ओर यहा अध्यापक कि नितांत आवश्यकता है। इसके अलाव विद्यालय की बिल्डिंग जर्जर अवस्था में है, कई बार मरम्मत कराने पर भी बरसात में इसके गिर जाने का खतरा बना रहता है तो गाँव के ग्रामीणों को अपने बच्चों का भविष्य यहां अंधकार में दिख रहा है।।              इसलिए ग्रामीण अपने नोनिहालो के भविष्य से चिंतित होकर अब ग्रामीण पलायन करने पर मजबूर है। रोशन लाल साई का कहना है कि बिना शिक्षक के बिना उनके बच्चों का भविष्य नही बन सकता । जिसके कारण वह अपने दोनों बच्चो को शहर के अच्छे स्कूल में ले जाने को मजबूर हो चुके है।उन्होंने बताया कि तकरीबन एक साल पहले स्कूल में शिक्षक की तैनाती हुई थी उनका किसी कारण स्तान्तरण हो गया उसके बाद शिक्षा मित्र ने स्कूल की कमान संभाली हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार इस संदर्भ में खंड शिक्षा अधिकारी को ज्ञापन दे चुके है, लेकिन इस विषय पर अभी तक कोई कार्यवाही नही हुई। ओर ये आप बीती किसी एक सरकारी स्कूल की नही बल्कि राज्य के दर्जनों स्कूलों की दास्तां हैं। आपको बता दे कि राज्य की सरकारी स्कूलों के हालात लगातार खराब हो रहे है । पर शिक्षा की गुणवत्ता ना के बराबर है। और पूरा दोष टीचर पर सरकार डाल देती है।जबकि हकीकत ये है कि सही समय पर सही जगह बजट गुणवत्ता से खत्म नही होता ।तो कही बजट का टोटा पड़ जाता है। अब इन हालातों मे क्या करे शिक्षा मंन्त्री पांडेय जी भी ? क्योकि शिक्षा विभाग मनमौजी आला अधिकारियों को बिना काम करे बिना दिमाग लगाये पगार खाने की ये लत जो लगी है।जिसको एक दम से दूर भी नही किया जा सकता । तो दूसरी तरफ कुछ टीचर भी लगाताए तबादला एक्ट पर सवाल खड़े करते रहते है तो कुछ टीचर भी टीचर कम नेता ज्यादा बन गए है उसकी वजह भी 16 साल से चली आ राही लाचार व्यवस्था है। अगर व्यवस्था ठीक होती तो इन टीचर को नेता बनने की जरूरत क्यो पढ़ती । कुल मिलाकर अगर बात करे तो इस बिगडेल शिक्षा विभाग को अगर ईमानदारी से भी सुधारा जाए तो दुर्गामी नीतियां बनाकर उसे धरातल पर उतरना होगा ।और किसी काम मैं समय जायदा लगेगा तो कही कम भी पर समय लगना जायज़ है। क्योकि यहा बात राज्य के भविष्य की है, शिक्षा की गुणवत्ता की है, सरकारी टीचरो के जायज़ मागों की है, ओर फिर शिक्षा मंन्त्री को रिजल्ट देने की है।जिसके लिए सिस्टम को दुरस्त करना होगा वो भी मजबूत नीतियां बनाकर ओर ये नीतियां आगमी 20 को सोच पर रख कर बनाई जाए तो ही कुछ होगा वरना एक दिन राज्य के सभी सरकारी स्कूलों मे आपको मिलेगा ताला।

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