सुनो त्रिवेंद्र, पहाड़ में मातृशक्ति आज भी परेशान! आपने बोला किया कुछ नहीं !

ये कैसा महिला दिवस ! हां सम्मान है उन नारियों का जो सैना में भर्ती हैं। जो राज्य चला रही हैं, जो बॉर्डर पर तैनात हैं, जो जहाज़ चला रही हैं, कोई डॉक्टर हैं तो कोई इंजीनियर। क्या इन महिलाओं ने महिला होने के बाद पहाड़ की महिलाओं के दुख दर्द को दूर करने की कोशिश की ? क्या सरकारों ने कोशिश की ? जवाब मिलेगा, हां में।

और हकीकत होगी सिर्फ ना ही ना। पहाड़ का जीवन यूं तो पहाड़ सा ही मुश्किल है लेकिन यहीं मुश्किलें पहाड़ के हर शख्स की अलग पहचान हैं। यूं तो पहाड़ जल जंगल ज़मीन और शांति के प्रतीक है लेकिन ये उत्तराखंड के आंदोलनों के गवाह भी रहे है।जब जब उत्तराखंड की चोटियों से आंदोलन की चिंगारी सुलगी उसने मैदानों से होते पूरे देश में एक रौद्र रूप ले लिया। आज महिला दिवस है मौका देश प्रदेश और पूरे विश्व की महिलाओं का सम्मान करने का दिन है। महिला दिवस के दिन यूं तो हम आज के युग की हर कामयाब महिला और उसकी उपलब्लधियों की बात कर रहे हैं लेकिन आज बात उन महिलाओं की भी होनी चाहिए जिन्होंने अकेले दम पर जन-जन के लिए क्रांति का संचार किया है। आज बात करेंगे उत्तराखंड के चिपको आंदोलन को खड़ा करने वाली गौरा देवी की। पर्यावरण और उससे जुड़े हर आयाम पर आज हर कोई चिंतित है क्योंकि विकास के नाम पर अंधाधुंध बढ़ते कंक्रीट के जंगलों का हमारे पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है इससे हम भली भांति वाकिफ है।गौरा देवी उत्तराखंड  के पर्वतीय क्षेत्र में 70 के दशक में चले एक अनूठे आन्दोलन ‘चिपको आंदोलन  की मुखिया थी। वन संरक्षण के इस अनूठे आंदोलन ने न सिर्फ देश भर में पर्यावरण के प्रति एक नई जागरूकता पैदा की बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘इको फेमिनिज़्म ’ या ‘नारीवादी पर्यावरणवाद’ का एक नया मुहावरा भी विकसित किया।  चिपको आन्दोलन का अर्थ है कि पेड़ों को बचाने के लिये पेड़ों से चिपक कर जान दे देना, लेकिन पेड़ों को काटने नहीं देना। चिपको आंदोलन की पृष्ठभूमि की बात करें तो  भारत में पहली बार 1927 में ‘वन अधिनियम (वन अधिनियम 1927)’ को लागू किया गया था। इस अधिनियम के कई प्रावधान आदिवासी और जंगलों में रहने वाले लोगों के हितों के खिलाफ थे। ऐसी ही नीतियों के खिलाफ 1930 में टिहरी में एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया था। अधिनियम के कई प्रावधानों के खिलाफ जो विरोध 1930 में शुरू हुआ था, वह 1970 में एक बड़े आंदोलन के रूप में सबके सामने आया जिसका नाम ‘चिपको आंदोलन’ रखा गया। लेकिन इसका असल रूप सामने तब आया जब गौरा देवी ने इस आंदोलन को निहत्थे साकार कर दिया। 1974 में वन विभाग ने जोशीमठ के रैणी गाँव के क़रीब 680 हेक्टेयर जंगल ऋषिकेश के एक ठेकेदार को नीलाम कर दिया। इसके अंतर्गत जनवरी 1974 में रैंणी गांव के 2459 पेड़ों को चिन्हीत किया गया । 23 मार्च को रैंणी गांव में पेड़ों का कटान किये जाने के विरोध में गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन हुआ, जिसमें गौरा देवी ने महिलाओं का नेतृत्व किया। प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तिथि 26 मार्च तय की गई, जिसे लेने के लिये सभी को चमोली बुलाया गया। इसी बीच वन विभाग ने सुनियोजित चाल के तहत जंगल काटने के लिये ठेकेदारों को निर्देशित कर दिया कि 26 मार्च को चूंकि गांव के सभी पुरूष चमोली में रहेंगे और समाजिक कायकर्ताओं को वार्ता के बहाने गोपेश्वर बुला लिया जायेगा और आप मजदूरों को लेकर चुपचाप रैंणी चले जाओ और पेड़ों को काट डालो। इसी योजना पर अमल करते हुये श्रमिक रैंणी की ओर चल पड़े।  इस हलचल को एक लड़की द्वारा देख लिया गया और उसने तुरंत इससे गौरा देवी को अवगत कराया। पारिवारिक संकट झेलने वाली गौरा देवी पर आज एक सामूहिक उत्तरदायित्व आ पड़ा। गांव में उपस्थित 21 महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर पहाड़ की मर्दानी गौरा देवी जंगल की ओर चल पड़ी। ठेकेदार और जंगलात के लोगों ने उन्हें डराने-धमकाने लगे। लेकिन उनकी धमकियों का गौरा देवी पर कोई असर नही हुआ और उन्होंने अपनी महिला साथियों के साथ मिलकर उनका डटकर सामना किया। जब ठेकेदार पेड़ों की तरफ बढ़े तो गौरा देवी और अन्य महिलाएं पेड़ों से चिपक गई और इसी तरह से चिपको आंदोलन की शुरूआत हुई। ठेकेदार व मजदूरो को इस विरोध का अंदाज़ न था। जब सैकड़ों की तादाद में उन्होंने महिलाओं को पेड़ों से चिपके देखा तो उनके होश उड़ गये। उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा और इस तरह यह विरोध चलता रहा।
उस समय अलकनंदा घाटी से उभरा चिपको का संदेश जल्दी ही दूसरे इलाकों में भी फैल गया। नैनीताल और अल्मोड़ा में आंदोलनकारियों ने जगह-जगह हो रहे जंगल की नीलामी को रोका। अंतत: सरकार ने एक समिति बनाई जिसकी सिफारिश पर इस क्षेत्र में जंगल काटने पर 20 सालों के लिये पाबंदी लगा दी गई। गौरा देवी पहाड़ की हर महिला के लिए एक शक्ति का रूप है और हर बार महिला दिवस पर उनके इस अदम्य साहस और जिजीविषा के लिए उन्हें याद किया जाता है।

आज महिला दिवस है और हर कोई इसे अपने अपने ढंग से मना रहा है यूं तो पहाड़ की महिलाओं का जीवन पहाड़ की तरह ही मुश्किलों भरा रहा है लेकिन फिर भी पहाड़ की महिलाएं एक पहाड़ की तरह अपने परिवार के लिए शान से खड़ी रहती है। पर सवाल ये उठता है कि इन पहाड़ की महिलाओं को क्या मिला ? ना तो स्वास्थ्य़ सेवाए इनको पर्याप्त रुप से मिल पाई और ना ही इनके बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा, ना ही इनके बच्चों के लिए रोजगार। जिन्होंने पहाड़ को ज़िदा रखा है, अपना दम घुटते-घुटते वो आज कहती हैं की हमने तो पहाड़ बचा लिया पर अपनी औलादों का भविष्य ना बना पाये। ऐसे में महिला दिवस के मौके पर डंके की चोट पर कहता हूं की ना तो पहाड़ की महिलाओं के सर का बोझ कम हुआ, ना उनकी तकलीफों का अंत हुआ और आर्थिक स्थिति शून्य। और ये वही महिलाएं हैं जिन्होने देवभूमि में कमल खिलाया। लेकिन आज भी पहाड़ की पानी और जवानी काम नहीं आ रही है ! सुनो मोदी जी और सुन लें सीएम तुमने अभी तक छल ही किया है ! कुछ दिखाई नहीं दे रहा है! पहाड़ की नारी कह रही है हम कब तक ठगे से महसूस करते रहेंगे। गर्भवास्था के दौरान कोई राहत नहीं, दून के अस्पताल में कोई पूछता नहीं, सचिवालय में कोई घुसने देता नहीं, सीएम से कोई मिलने देता नहीं। हर तरफ आपकी नोकरशाही हावी, इस से अच्छा तो हम यूपी में ही ठीक थे। ये दर्द पहाड़ की महिलाओं का है जिसे बोलता उत्तराखंड डंके की चोट पर आप तक पहुंचा रहा है। अब कोई जागे या ना जागे हमने तो जागर लगा दिया है।

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