अब पानी सर से ऊपर निकल गया है सरकार नही बस आप ही बचा सकते हो अपना उत्तराखंड!

Ratan Negi:                                                         आपका उत्तराखंड मेरा उत्तराखंड तेरा पहाड़ मेरा पहाड़ आज पर्यावरण की दुर्दशा का दर्द झेल रहा है
बोलता है उत्तराखंड की। दिल्ली ओर अन्य राज्यो की तरफ अब मेरा उत्तराखंड के जिले भी धूल और धुएं से घिरे बुरी तरह घिर हुए हैं. एक तो पर्यावरण में आ रहे बदलावों से उत्तरखण्ड का मैदानी भाग साथ मैं पहाड़ी जिले भी अब अछूते नहीं है.ओर अब तो उत्तराखंड जैसा राज्य इसका उदारण बनता जा रहा है अपना
उत्तराखंड राज्य भी जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलावों से हो रहे नुकसान का खामियाजा आये दिन भुगत रहा है. अस्थाई राजधानी देहरादून समेत कई मैदानी इलाके वायु प्रदूषण के संवेदनशील स्तरों से घिरे हुए हैं. ओर दिल्ली जैसा हाल यहा का हो गया है पहाड़ों जिलो में ये दुर्दशा एक अलग रूप में नजर आ रही है यहां बांध परियोजनाओं और बड़े पैमाने पर चल रहे निर्माण कार्यों ने हालात को और चिंताजनक बना दिया है. ओर अब ऊपर से ये आल्वेदर रोड जिसके चलते पेड़ो का कटान जारी है आपको बता दूं कि साल 2013 के जलप्रलय से तबाह केदारनाथ धाम और समूची केदार घाटी पुनर्निर्माण के कार्य जिन चरणों से गुजर रहे हैं, वे भी किसी आपदा के कम नहीं बताए जाते. है समय समय पर आवाज उठती रहती है       
अगर आपको थोड़ा लगभग 60 साल पीछे ले चलू तो आपको याद होगा
अंग्रेजों ने अपने दौर में मसूरी, नैनीताल जैसे पहाड़ी स्थलों और देहरादून जैसी शिवालिक और मध्य हिमालय से घिरी घाटी में एक स्वप्निल पर्यावरण को देखते हुए बसेरे बनाए थे, वे जगहें अब अलग अलग किस्म के प्रदूषणों की शिकार हो चुकी हैं. कभी अपने मौसम के लिए प्रसिद्ध दून घाटी अब धूल और धुएं और शोर शराबे की घाटी बनकर खड़ी है. उम्मीद जताई जा रह है कि अगर सड़को पर गाड़ियों का यही हाल रहा तो 2035 तक सडक पर पाव रखने की जगह तक ना मिलेगी इसके उल्टा आपके राजनेता देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाने मे जुट गए हैं भगवान जाने आगे क्या होगा मेरे ओर आपके दूंन का समय समय पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, एनजीटी, उत्तराखंड सरकार और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को औद्योगिक इकाइयों से उठने वाले प्रदूषण के खतरनाक स्तरों को लेकर कही बार फटकार भी लगाता रहा है पर यहां फर्क कहा किसी को पड़ता है हा आज राज्य के मुख्यमंत्री भले ही ये दावा कर रहे है कि 2020  तक  गंगा  प्रदूषण से मुक्त हो जाएगा पर भगवान ही जाने कैसे होगा ??                                                                         तो विशेषज्ञ और निगरानी समितियां बनाने की वाकलत करते है पर अब एक तरफ निवेश और दूसरी तरफ मुनाफा और जीडीपी का खेल भी अब प्रकति में घुले प्रदूषण के समांतर एक मानव निर्मित प्रदूषण की तरह हो गया है. लगातार जंगलों की कटान जारी है पहाड़ी इलाकों में अधाधुंध ओर अंसतुलित निर्माण हो रहा है जिस ने हवा, पानी और मिट्टी के रास्ते उलटपुलट तो किये है ही साथ मैं पूरा रायता फैला दिया है जिसे अब समेटना मुस्किल ही रहा है ओर नतीजा सामने है अप्रत्याशित रूप से भूस्खलन और अतिवृष्टि की दरें लगातार बढ़ी हैं, बाढ़ से तबाही का दायरा खूब फैलता जा रहा है ओर इशी कारण इनसे जुड़े आर्थिक सामाजिक नुकसान तो जो हो रहे है वो अलग पर अब पहाड़ों के जंगल मे लगने वाली आग एक नया पर्यावरणीय संकट बन कर खड़ी हो गयी है                      

तो उधर ग्लेशियरों भी तेजी से पिघलने लगे है हालाकि
. सालो साल होने वाले बदलावों में ग्लेशियरों का पिघलना ओर बिगड़ना स्वाभाविक है. जो आने वाले समय मैं घातक सिद्ध ही सकते है क्योंकि पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों की बात करे तो ग्लेशियरों का पिघलना एक सामान्य घटना नहीं है और ये जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े सूचकों में से एक है. मेरे पहाड़ का आपके पहाड़ों का मौसम अब पहले जैशा नहीं रह गया है पहाड़ी फसलों की पैदावर की बात हो या पैटर्न की सब बदल चुका है जिसकी वजह से गुणात्मक और मात्रात्मक गिरावट दोनों मे लगातार आ चुकी है बढ़ते पलायन के चलते बड़े पैमाने पर पहाड़ के घर खाली हो चुके है पहाड़ी की जमीन बंजर हो चुकी है ओरजो लोग पहाड़ मैं है वो तो बस अब पहाड़ में रहकर अपने दिन काट रहे है उनकी तकलीफ को देख कर बहुत दर्द होता है उनकी खाली बंजर जमीन पर अब भूमाफ़िया ने कब्जा कर असंतुलित विकास को जगह दी है जो पहाड़ के लिए घातक है                
भले ही अभी भी पहाड़ों में लोग स्वच्छ हवा पा लेते हैं लेकिन ऐसे इलाके धीरे धीरे सिकुड़ रहे हैं. तो पर्यटन स्थलों पर भी असंतुलित निर्माण हो चुका है तब भी लोग अपने वाहनों के साथ मैं प्लास्टिक और बसाहटों का बोझ बढ़ कर निकल पड़ते है सकून की तलाश में बढ़ती गर्मियों के मौसम में जब लोग पहाड़ों की रानी कही जाने वाली मसूरी के लिए निकलते हैं तो देहरादून पहुंचते ही उनके रोमान को झटके लगने लगते हैं. वाहनों की भीड़, चिल्लपौं और वायु प्रदूषण अब उनके लिये आम बात बन गयी है ये हाल सिर्फ पर्यटनीय अतिवाद का मसूरी का ही नही बल्कि हर जगह पर्यटक को हर पर्यटन स्थल मैं देखने को मिलता है जहां हर कोई अपनी कामाई के चकर मैं पर्यावरण के साथ खूब 20 20 खेल रहा है और रहनुमाओ की बात हो या सरकारों की उनका भी ध्यान इस तरफ नही जाता अगर चला भी गया तो सुनकर अनसुना कर देना देखकर अनजान बन जाना अब उनकी फितरत बन गया है लगातार सड़कों पर वाहनों की इतनी आमद और बेशुमार प्लास्टिक इस्तेमाल, पहाड़ की सेहत के लिए अच्छी नहीं है. भले ही राज्य सरकार पालीथिन मुक्त उत्तराखण्ड बनाने का प्रयास मैं लगी है पर ठीक ओर ठोस पहल होना अभी बाकी है हमारे उत्तरसखण्ड मैं अब पहाड़ ओर जंगल भी कट रहे है और कटे भी क्यो ना आज आल्वेदर रोड की जरूरत जो आ पड़ी है पर नुकसान कितना हो रहा है पर्यावरण को वो किसे से छुपा नही है सड़कें भी. डायनमाइट के विस्फोट से पहाड़ी नोकों को उड़ाकर तैयार की जा रही है पाहड़ कि सड़कों पर बारिश के दिनों में भूस्खलन की दरें लगातार बढ़ गई हैं. अब तो अपनी मिट्टी खुद अपनी जगह छोड़ रही है,
भाई लोगो विकास जो हमहे चाइए तो ये होना तो लाजमी है पर ध्यान रहे संतुलित काम जो होता नही है
सरकारे यातायात और अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए मनमाने तरीके से निर्माण के रास्ते निकालते है पर होना ये चईये की भौगौलिक और भूर्गभीय आकलन और एक कुशल प्रबंधन के साथ साथ विशेष तकनीकी कौशल भी जरूरी है. जिसमें नाजुक पहाड़ियों और चट्टानों को न्यूनतम नुकसान पहुंचे. और अगर नुकसान होता है तो फौरन उसकी भरपाई भी की जाए. जो होता नही है हाआ हर साल हरेला मनाया जाता है लाखो की तादात पर वृक्षारोपण भी किया जाता है पर्यवरण दिवस पर भी यही काम होता है खूब फ़ोटो भी खिंचाई जाती है ब्रेकिंग न्यूज़ भी भी बनती है परअगर 15 से 30 दिन के बाद अगर उसी जगह जाय जाए जहा पौधा रोपा गया है तो वहां वो पौधा या तो मिलता नही या वो तब तक अपने लागाने वाले मालिक् के इंतज़ार मे दम तोड़ चुका होता है फिर क्या फायदा इनके दिखावे के अभियान का। दूसरी तरफ पहाड़ो मैं चीड़ के जंगलों से पहाड़ों को पाट देने की नीति को तो विशेषज्ञ भी गलत और नुकसानदेह ठहरा चुके हैं. आज जो जंगल जल रहे है उनमें चीड़ के पत्तो का बड़ा योगदान है जो सूखने के बाद पेरोल बन जाते है।    सरकार इनसे  बिजली बनायेगी पर देखते है कब तक ।।           F

बोलता उत्तराखंड कहता है कि जल प्रदूषण ने भी उत्तराखंड के पर्यावरण में असंतुलन पैदा कर दिया हैं. गंगा का प्रदूषण मिटाने के लिए केंद्र सरकार की करोड़ों रुपए की परियोजनाएं ओर रुपए पानी की तरह बह गए पर हुवा कुछ नही वादे ओर दावे के सिवा गंगा के पानी की गंदगी जस की तस है. ओर ये तस्वीर आगे और आगे और निराशाजनक दिखने लगेगी है अब तो मेरा पहाड़ तेरा पहाड़ का भूगोल भी उस दुष्चक्र का शिकार बन चुके हैं जो विकास का एक बेडौल और विवादग्रस्त मॉडल निर्मित करता है. बस अब तो इन खतरों से निपटने के लिए जरूरत है सामूहिकता की लेकिन लगता है कि इसके लिए किस को भगीरथ बनकर भगीरथ प्रयत्न करना होगा तब जाकर कुछ हालात ठीक हो पाएंगे और ये सब आपको हमको ओर सबको मिलकर करना होगा
दूसरी तरफ अगर हम आपको ये बताये की तीन लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है अपना उत्तराखंड तो आप चौकना मत जी हा खुद तड़प रहा है अपने पहाड़ ओर मैदान के हालात ठीक नही पर सीने मैं बड़ा दर्द झेलकर
देश की नागरिकों के लिए पर्यावरण संरक्षण के लिए देश की आबोहवा को शुद्ध और सांस लेने लायक बनाने में उत्तराखंड सालो साल से अहम योगदान देता आ रहा है आपको बता दे कि नियोजन विभाग की ओर से इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर कराए जा रहे अध्ययन के प्रारंभिक आकलन को अगर हम देखें तो विषम भूगोल वाला यह राज्य करीब तीन लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। पर बदले मैं इसको क्या मिल रहा है ये सवाल केंद्र सरकार से डबल इज़न से जरूरी है आपको बता दू की इस योगदान मे यहां के वनों का योगदान 98 हजार करोड़ के लगभग है।

उत्तराखंड राज्य जो कि 71.05 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड राज्य है जिस में जंगलों को सहेज पर्यावरण संरक्षण यहां की परंपरा का हिस्सा है। यही वजह है कि यहां के जंगल अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित हैं। कुल भूभाग का लगभग 46 फीसद फॉरेस्ट कवर इसकी तस्दीक भी करता है। इससे न सिर्फ पहाड़ महफूज हैं, बल्कि पर्यावरण के मुख्य कारक हवा, मिट्टी व पानी भी। यही नहीं, गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों का उद्गम भी उत्तराखंड ही है। हर साल ही वर्षाकाल में बड़े पैमाने पर यहां की नदियां अपने साथ बहाकर ले जाने वाली करोड़ों टन मिट्टी से निचले इलाकों को उपजाऊ माटी देती आ रही है।
पर फिर कहुगा की राज्य को क्या मिल रहा है
ऐसे में सवाल अक्सर उठता है कि आखिर यह राज्य सालाना कितने की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। पूर्व में इसे लेकर 107 बिलियन रुपये का अनुमान लगाया गया था, लेकिन बाद में राज्य सरकार ने खुद इसका आकलन कराने का निश्चय किया। नियोजन विभाग के जरिये इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर सालभर से यह अध्ययन चल रहा है। अब इसके प्रारंभिक आंकड़े सामने आने लगे हैं।

इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर चल रहे अध्ययन के नोडल अधिकारी मनोज पंत के मुताबिक राज्य के वनों से ही अकेले 98 हजार करोड़ रुपये की सालाना पर्यावरणीय सेवाएं मिलने का अनुमान है। जंगलों के साथ ही नदी, सॉयल समेत अन्य बिंदुओं को भी शामिल कर लिया जाए तो इन सेवाओं का मोल लगभग तीन लाख करोड़ से अधिक बैठेगा। उन्होंने कहा कि अभी अध्ययन चल रहा है और फाइनल रिपोर्ट आने पर ही पर्यावरणीय सेवाओं के मोल की असल तस्वीर सामने आएगी तो देखा आपने ये है आपका अपना उत्तराखंड जो देश के लिए हर जगह से हर तरफ से कुर्बान होने को तैयार है पर कोई यहा के लिए नही सोचता किसी ने ठीक ही कहा है कि जब तक बच्चा रोता नही मा भी दूध नही पिलाती इसलिए जागो उत्तरखण्ड बोलो उत्तराखंड अपने हक ओर हकूक के लिए आगे आओ उत्तराखंड और याद रहे पर्यावरण को ठीक रखने का काम आप सबका है मेरा है तेरा है सबका हैं हमारे अपनो का है अपना उत्तराखंड  लिहाज़ा सब  सकल्प  लो कि  पर्यावरण  के बेहतरी के लिए हम सब एक हो जाये  ओर मिलकर  काम करे।   जय   उत्तराखण्ड

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