पीएम मोदी जी आपकी त्रिवेन्द्र सरकार पर दाग़ लग रहा है पर ये दाग़ लग गए तो अच्छे नही होंगे!

डॉक्टर यानी धरती के भगवान। लेकिन क्या वाकई भगवान ऐसा होता है। ना भावनाएं , न परवाह। भगवान तो जिन्दगी देता है लेकिन धरती पर भगवान माने जाने वाले डॉक्टर,,, ??? वो क्या कर रहे हैं। ये सवाल इसलिए अहम है क्योंकि सरकारी अस्पतालों में तस्वीरें हैरान ,परेशान करने वाली हैं। यहां भगवान बनकर बैठे ये डॉक्टर मनमर्जी पर उतारू हैं चाहे किसी की जिंदगी जाए या बचे।

दो दिन पहले दून महिला अस्पताल में जो कुछ घटा वो बेहद दुखद था। दो जिंदगियां खत्म हो गयी । डॉक्टरों पर लापरवाही को लेकर हो हल्ला भी हुआ। लेकिन अब शायद ये आम बात हो गयी है। संवेदनाओं को दरकिनार कर चुके डॉक्टरों के लिए ये तस्वीरें भी आम हैं, हो हल्ला भी आम है और शायद ये मौतें भी। लेकिन इसके बाद भी कुछ बदला नहीं। अस्पताल में बच्चे को गर्भ में लिए बैठी महिलाएं अपनी बारी के इंतज़ार में हैं कि उनका नम्बर आये और वो नन्हीं सी जान के साथ सही सलामत अपने घर लौट सकें। लेकिन सबके नसीब में ये खुश किस्मती नहीं। ऐसी ही एक गर्भवती से मिलकर तब दिल पसीज उठा जब मालूम चला कि जिस मासूम को अपने गर्भ से बाहर आने का वो इंतज़ार कर रही है उस मासूम की धड़कन तो दस दिन पहले ही थम चुकी है । भगवानपुर की आएशा 4 दिन से अस्पताल में अपने 10 दिन पहले ही मर चुके बच्चे को कोख में सम्भाले बैठी थी। जैसे ही पता चला कि वो हमारे लिए एक खबर है। हाथ जोड़कर कहने लगी कि मेरा नाम मत लीजिये। एक तो वैसे ही यहां कक स्टाफ अच्छा सुलूक नहीं करता अगर खबर का पता चला तो जाने क्या होगा ? अब सरकारी अस्पताल में ही इलाज कराना भी तो एक गरीब परिवार की मजबूरी थी। कहती है कि शायद इलाज में देरी इसीलिए हो रही है कि ऊपर वाले ने मुझे भी मेरे बच्चे के साथ ही अपने पास बुलाया हो। वो बच्चा तो दुनिया देखने से पहले ही इसे छोड़ गया लेकिन अब आएशा की जान बचाने में हो रही देरी समझ से परे थी। पहले ही दोनों पैरों से लाचार और हालातों के सामने बेबस आएशा सोचने को मजबूर करती है कि क्या वाकई ऊपर वाले के बुलावे से ही हादसे होते हैं , क्या कईं बार धरती के भगवान अपनी संवेदनहीनता की बलि नहीं चढा देते एक ज़िन्दगी को, या दो ज़िन्दगियों को ? ये तो एक आयेशा का किस्सा था जिसने अंदर तक झकझोर दिया। लेकिन दून अस्पताल में ना जाने कैसी इतनी आयशा सिस्टम की मार का शिकार हैं। जब डाक्टर के पास मरीज़ का कोई रिश्तेदार अपने मरीज़ से जुड़ा कोई प्रश्न करता है या गुज़ारिश करता है उसे हालातों से निजात दिलाने की। तो भारी भरकम तनख्वाह लेकर भगवान का तमगा हासिल करने वाले डॉक्टर उसे ऐसे हड़काते हैं जैसे फ्री की समाज सेवा कर रहे हों जबकि उस दौरान मरीज़ को आपके अपनेपन की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। सरकार एक बार जरूर इन अस्पतालों का हाल जानिए,, लाव लश्कर के साथ एक मुखिया बनकर नहीं , क्योंकि जब पत्रकारों के सामने मुंह खोलने में मरीज़ डर रहा है तो आपको कैसे बता सकेगा आखिर इलाज तो डॉक्टर ही करेगा। इसलिए कभी आम आदमी से आम आदमी बनकर मिलिए, फिर सामने आएगा सरकारी अस्पतालों का सच।  
एक पहलू ये भी है….
गलती क्या सिर्फ डॉक्टरों की है। स्वास्थ्य तो सबसे बुनियादी जरूरतों में एक है । तो फिर क्यों सरकारें इसे आम आदमी के लिए सुलभ बनाने में अबतक नाकाम ही रही हैं। दून अस्पताल में भी व्यवस्थाओं के नाम पर करोड़ों रुपए फूंके गए हैं लेकिन इंतजामात बेहद नाकाफी हैं। मरीज़ों के बढ़ते दबाव के चलते डॉक्टर भी हाथ खड़े कर लेते हैं। बताते हैं कि 111 बेड की व्यवस्था है और रोज़ाना भर्ती होने वाले मरीजों की तादाद 150 पार कर लेती है। ऐसे में डॉक्टरों के सामने भी मजबूरी है। लेकिन सरकार आप तो सुध लीजिये। ये हमारे हुक्मरानों की ज़िम्मेदारी है कि पहाड़ों में अच्छे स्तर के चिकित्सालय खोले और सिर्फ इमारत बनाकर खड़ी करने से काम नहीं चलेगा।  कहीं डॉक्टर को इमारत की दरकार तो कहीं खंडहर बनते अस्पताल सिर्फ जख्मों पर नमक ही छिड़कते हैं।  कम से कम हर ब्लॉक स्तर पर सब सहूलियतों और डॉक्टरों से लैस ऐसे अस्पताल  हों कि वहां से परेशान मरीज़ों को दून के चक्कर ना काटने पड़ें। । चाहे सरकार किसी की भी हो। अब सरकार  ! अपनी जनता को ये तर्क ना दीजिएगा कि अस्पताल एक दिन में नहीं बन जाते। 18 साल का हो गया है हमारा सूबा। इस छोटे से पहाड़ी प्रदेश में अगर इतने सालों में भी स्वास्थ्य की जद्दोजहद ही कम नहीं होगी तो विकास कहां और किस बात का ? 
राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत भले ही राज्य के विकास के लिए खूब पसीना बहा रहे  हो  पर उनके साथ उनकी पूरी टीम के सभी  साथी और  मन्त्री लोग एक साथ नही दिखाई देते  कहने का मतलब है कि हर कोई किसी ना किसी से नाराज़ ही दिखता है
  ओर यही   कारण   है कि फिर राज्य का सरकारी कर्मचारी इस कमी को भांप जाता है और उसको  डर किस बात का । इसलिए  कही विभागों मे  अधिकारी अपनी मनमर्जी  चलाते है ओर फिर  नज़र आती है  उनकी लापरवाही
ओर  फिर निशाने पर सीएम होते है ।  अब अकेले   सीएम  त्रिवेन्द्र सर  क्या करे जब ना  उनके कुछ  सलाहकार भी ठीक नही  ओर ना मंत्रियो के दिल  ईमानदार मुख्यमंत्री से मिलते हो तो ऐसे मे त्रिवेन्द्र सरकार पर दाग़ लगाने वालों की कमी नही रहने वाली ओर अगर ये दाग़ लग गये तो अच्छे नही होंगे

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