उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत आज अपने आवास पर ही सांकेतिक उपवास पर बैठ गए है
हरीश रावत ने कहा कि
मैं अपने आवास पर सांकेतिक उपवास पर बैठा हूं।


समाज के कुछ ऐसे रचनात्मक हिस्से हैं, जिनके बिना समाज अधूरा रहता है, इनमें हमारे
कलाकार भी हैं, हमारी सरकार ने उनके लिये कोष बनाया था, वैसे ही पत्रकार बंधुओं व अधिवक्ता गणों के लिये भी कोष बनाया था, वो कोष आज काम आ सकता है‌। मगर कलाकारों को ₹1000-1000 देकर के छुट्टी कर दी जा रही है, वह उनका अपमान है। कम से कम यह राशि 3 से 5 हजार के बीच में होनी चाहिये थी।
कलाकारों को राज्य सरकार पर्याप्त आर्थिक सहायता दे, सम्मानजनक, यह मेरा पहला मकसद है। दूसरा मकसद है, हमारे पत्रकार बंधु आज लगभग 40 हजार पत्रकार किसी न किसी रूप में अपनी रोजी खो चुके हैं और यदि हम यह संख्या ग्रामीण स्तर पर लें, तो यह संख्या बहुत अधिक हो सकती है। राज्य सरकार को चाहिये कि, वो पत्रकारों की भी मदद करें‌। सौभाग्य से मेरी सरकार, उत्तराखंड में पत्रकार कल्याण कोष का भी गठन करके गई है, जिसमें हम काफी पैसा देते थे और राज्य सरकार, उस कोस में कुछ और पैसा डाल करके पत्रकारों की भी मदद करे।
हमने अधिवक्ता गणों के लिये एडवोकेट कल्याण कोष भी बनाया। उस समय हम को यह आभास नहीं था कि, ऐसी कोई महामारी आ रही है। लेकिन वह कोष आज बहुत मौजूद है‌। शायद हमारी सरकार उस समय उस कोष में दो करोड़ रुपये देती थी, हर साल और उसका कैसे मदद करनी है, वो बार एसोसिएशन पर छोड़ा गया था। आज वो कल्याण कोष कितना कल्याणकारी हो सकता है, उसको एक एडवोकेट बता सकता है, जिनकी आजीविका बिल्कुल सूख गई है।
जिसके सामने अपने पद की गरिमा के लायक, मेंटेन करने लायक उसकी हालत नहीं रह गई है, उनकी भी मदद होनी चाहिये। एक हमारा नया वर्ग है जिसकी हमने कभी कल्पना नहीं की थी, वो हैं हमारे प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकगण। जो नामचीन प्राइवेट स्कूल हैं, वह तो अपने शिक्षकों को फीड कर ले रहे हैं, क्योंकि उनके पास काफी पैसा है और उनको बाजार से पैसा मिल ही जायेगा, बैंक से भी पैसा मिल जायेगा। लेकिन जो छोटे-छोटे हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार आधारित लोगों ने शिक्षा देने के लिये स्कूल खोले थे, जो बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। फिल इन द गैप, हमारे एजुकेशन को लाने में कर रहे हैं, उन शिक्षकों के लिये भी आज आजीविका का गंभीर संकट है। मैं सरकार से मांग करता हूं कि, उन शिक्षकों भी कम से कम ₹3000 प्रति माह दें,
जब तक कोरोना का रहता है, ताकि वो आजीविका का पालन कर सकें। “शब्द हो गया मासाहब, मासाहब की जेब में नहीं है अब ढेला”,
प्राइवेट स्कूल का मालिक आप दे नहीं पा रहा है और
ड्राइवर भाइयों व कंडक्टर भाइयों के लिये मेरा हमेशा दिल धड़का है। मैंने केदारनाथ आपदा में भी उनका सहारा लेकर के आपदा से पार पाया था। आज मैं, # त्रिवेंद्र_ सिंह जी से कहना चाहूंगा कि, उनका सहारा लें और आपदा से पार पाएं और इसके लिये बहुत आवश्यक है कि, रिक्शा चालक से लेकर के इस राज्य के बड़े से बड़े कार चालक तक उनको आप मदद करिये, जो प्राइवेट सैक्टर में हैं, निजी सैक्टर में हैं, #सरकार को उनकी मदद करनी चाहिये। मैं आज इन चार बिंदुओं को लेकर एक सांकेतिक_उपवास के जरिये, राज्य की प्रबुद्ध वर्ग का और राज्य सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट कर रहा हूं।


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