सीएम त्रिवेंद्र को बड़ी राहत , हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक , कहा चौकाने वाला फैसला

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ हाईकोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश पर फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर हैरानी जताई है। जानकारी के अनुसार सुप्रीकोर्ट इस फैसले की समीक्षा करेगा। उसके बाद ही मामले में आगे की कार्रवाई की जाएगी। तब तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जाएगी। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ हाईकोर्ट के CBI जांच के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताई है।

बता दे कि इससे पहले 
हाईकोर्ट द्वारा सोशल मीडिया में मुख्यमंत्री की छवि खराब करने के मामले में दर्ज रिपोर्ट निरस्त करने और प्रकरण की जांच सीबीआइ से कराने के निर्णय से
उत्तराखंड सरकार हैरत में  थी 
कल दोपहर बाद भाजपा के मुख्य प्रवक्ता व विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने प्रकरण में सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि इस निर्णय के खिलाफ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है। इसके बाद भाजपा के मुख्य प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान ने मीडिया के सामने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि हम न्यायालय का सम्मान करते हैं, लेकिन इस निर्णय से सहमत नहीं हैं। मुख्यमंत्री को पूरे मामले में नही सुना गया। उन्हें पार्टी नहीं बनाया गया। बावजूद इसके मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने का फैसला दिया गया। हाईकोर्ट में शिकायतकर्ता ने भी यह स्वीकार किया है कि हरेंद्र सिंह रावत और उनकी पत्नी की मुख्यमंत्री से रिश्तेदारी के संबंध में दी गई जानकारी गलत है। यहां तक कि जिन बैंक खातों का जिक्र है, उनमें पैसे का लेन-देन नहीं हुआ। शिकायतकर्ता का झूठ जब कोर्ट में पकड़ा गया, तो उसने इस बात को स्वीकार किया कि उसने गलत जानकारी दी थी। जब इन शिकायतों का ही कोई औचित्य नहीं, तो इसमें फिर जांच का प्रश्न कहां उठता है। 
वही
भाजपा मुख्य प्रवक्ता ने सवाल उठाया कि मुख्यमंत्री पद जैसी संस्था को बदनाम करने की नीयत से मनगढ़ंत बातें करना क्या कानून की दृष्टि से अनुचित नहीं है।
यहां तक कि शिकायतकर्ता पर पांच राज्यों में मुकदमें चल रहे हैं। इसी कारण हाईकोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की गई है।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री प्रदेश में जीरो टॉलरेंस नीति से काम कर रहे हैं। जो बोलते हैं, उसका अनुसरण वह खुद भी करते हैं।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कांग्रेस द्वारा नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की मांग को सिरे से नकार दिया। उन्होंने कहा आधारहीन तथ्यों पर कांग्रेस यह मांग कर रही है।उधर, सरकार के प्रवक्ता व कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि मसले का अध्ययन किया गया, इसके बाद ही एसएलपी दायर की गई। यह स्वीकार भी हो गई है। जल्द ही इस पर सुनवाई शुरू हो जाएगी।
तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत ने कहा कि में डंके की चोट पर कहता हूँ
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत
पर कोई एक पैसा का भी भ्रष्टाचार का मामला सिद्ध नहीं कर सकता,त्रिवेंद्र पहले दिन से ही भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ धर्म युद्ध लड़ रहे है
बाकी कानूनी लड़ाई आगे लड़ी जाएगी
तो वही इससे हटकर बात की जाए तो सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ये भी कहा जा रहा है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत को राजनीतिक चक्रव्यूह में फँसाने के भरसक प्रयास तो तभी से हो रहे हैं। जब से उन्होंने प्रदेश की कमान सभाली
त्रिवेन्द्र को कुर्सी से हटाने के लिए वे सभी लोग तब से ही लगे है जब से त्रिवेंद्र ने जीरो टॉलरेश के साथ कुर्सी सभाली
जिनमे भूमाफिया,
शराब माफिया, अवेध खनन का कारोबार करने वालो से लेकर कुछ राजनीतिक लोग भी शामिल है
जो उत्तराखंड में भ्रष्टाचार पर लगे अंकुश से तिलमिलाए बैठे हैं वो भी पूरे साढ़े तीन सालों से

सड़क पर सब्जी बेचने वाला भी ये कहता है कि साहब
हमने पहली बार ऐसा मुख्यमंत्री देखा जिस पर कोई आरोप नही लगा ओर ना उनके किसी मन्त्री पर सुना है , उनके खिलाफ अवैध कारोबार, धन का दुरुपयोग और पैसे की वसूली का कोई मामला ,ना अखबारों में पढ़ा , ना टीवी में सुना
बस ये त्रिवेंद्र को बदनाम करने का काम हो रिया ओर कुछ नी

तो भाजपा के नेता और कार्यकर्ताओं का कहना है कि
एनएच घोटाला, उर्जा निगम में हुईं अनियमितता, जल निगम के एमडी पर कार्रवाई, पीडब्लूडी और सिंचाई विभाग के दर्जनों इंजीनियरों का निलंबन, न जाने ऐसे कितने उदाहरण हैं जिनसे त्रिवेन्द्र की ईमानदार साफ़ झलकती है आज सचिवालय में दलालों की एंट्री बंद है
तो पारदर्शी शासन, चहुँमुखी विकास और सामाजिक उत्थान के इस दौर में स्वार्थी तत्व हैरान भी हैं और परेशान भी इसलिए वे लोग बेवजह इस मामले को तूल दे रहे है..
, जिसका उत्तराखंड से कोई सरोकार नहीं ।
आरोप लगाया जाता है कि 2015-16 में झारखंड के बीजेपी प्रभारी रहते हुए उन्होंने वहां के एक व्यक्ति से 25 लाख रुपये की रिश्वत अपने नाते रिश्तेदारों के बैंकखातों के जरिये ली। इस मामले की एसआईटी जाँच में इन आरोपों को निराधार पाया गया है। उल्टा, इस मामले में हरेंद्र रावत नाम के जिस व्यक्ति की पत्नी के खाते में पैसा डाले जाने के आरोप लगाए गए थे, उसने ही नेहरू कॉलोनी थाने में आरोप लगाने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया था। इस मुकदमे में हाईकोर्ट का फैसला आया।
ओर आगे कानूनी लड़ाई में जो भी फैसला आएगा वो जनता के सामने होगा
कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि 5 साल पुराना ऐसा मामला जो उत्तराखंड में घटित नहीं उसके बूते कैसे उत्तराखंड में सियासी अस्थिरता फैलाने की नाकाम कोशिशें हो रही हैं।
उस समय त्रिवेंद्र भाजपा के झारखण्ड प्रभारी थे।
सवाल यह है कि जब तक त्रिवेन्द्र मुख्यमंत्री नहीं थे तो तब तक ये मुद्दा क्यों नहीं उठाया गया। तब उनके खिलाफ झारखंड या उत्तराखंड में मुकदमा दर्ज क्यों नहीं किया गया।
उस समय तो वे सीएम नहीं थे,
ओर आसानी से उन पर कार्रवाई हो सकती थी।
कुल मिलाकर ये सब इसलिए क्योकि त्रिवेंद्र के अब तक कार्यकाल में एक पैसे का घपला भी नही मिला
इसलिए बेवजह इस मामले को तूल देकर हवा दी जा रही है और कुछ नही …


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