आखिर उत्तराखंड के लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी को पद्मश्री क्यों नहीं?

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आखिर उत्तराखंड के लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी को पद्मश्री क्यों नहीं?

सोशल मीडिया पर शुरू हुई जोरदार बहस, प्रशंसकों में आक्रोश

देहरादून। उत्तराखंड के लोकगायक नरेंद्र सिंह नेेगी को लेकर आमजन, समाजसेवियों और लोकसंस्कृति के संरक्षण में जुटे तमाम लोगों का लम्बे समय से मानना है कि उन्हें भी देश का यह प्रतिष्ठित सम्मान दिया जाना चाहिए। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के संरक्षण व संबर्धन में उनका अमूल्य योगदान है। कल जब पद्म पुरस्कारों की घोषणा हुई उसके बाद आज जब समाचार पत्रों और मीडिया के माध्यम से लोगों को इस बात की जानकारी मिली तो सोशल मीडिया में लोग इसको लेकर अपनी राय जाहिर कर रहे हैं। उत्तराखंड से जहां तीन लोगों को पद्म सम्मान दिये जाने से लोग खुश हैं तो वहीं इस बार भी नरेन्द्र सिंह नेगी का नाम न आने से सोशल मीडिया पर लोगों ने खुलकर अपनी पीड़ा जाहिर की।
अपनी फेसबुक पर कुलदीप राणा आजाद नरेन्द्र सिंह नेगी की लोकसंस्कृति के संरक्षण में अमूल्य भागीदारी की बात करते हुए उन्हें पद्म पुरस्कार न दिये जाने पर सवाल खड़े करते हैं। वहीं कैलाश बिष्ट लिखते हैं कि 26 जनवरी पर उत्तराखंड की झांकी के साथ नरेन्द्र सिंह नेगी के गीत तो खूब गाये जाते हैं लेकिन जब किसी सम्मान की बात आती है तो नेगी जी का नाम दूर दूर तक नजर नहीं आता ऐसा क्यों? अशोक चैधरी लिखते हैं कि नेगी जी ने हमेशा ईमानदारी से लोकसंगीत के लिये काम किया है। कभी सत्ता की चापलूसी और गुलामी नहीं की है। सत्ताधीशों ने जहां गलत किया वहां जमकर अपने गीतों द्वारा उन्हें बेनकाब किया। नेगी जी को जनता सम्मान देती है। ऐसे ही कई और कमेंट हैं जिसमें लोग नरेन्द्र सिंह नेगी को पद्म सम्मान न दिये जाने पर सवाल खड़ा करते हैं। नेगी जी के प्रशंसक उन्हें सम्मान न दिये जाने पर खुलकर अपनी पीड़ा जाहिर कर रहे हैं।
नरेंद्र सिंह नेगी पौड़ी के रहने वाले हैं। लोक गायन में उनकी अपनी विशिष्ट पहचान है। उनके लोकगीत में उत्तराखंड का समाज पिछले चार दशक से मंत्रमुग्ध रहा है। नेगीजी के टिहरी डूबने पर लिखा गीत टिहरी डुबण लग्यू च, पर्यावरण पर लिखा ना काटा तौं डाल्यूं, जिदेरी घसेरी बोल्यूं मान, प्रकृति का डांडी काठ्यों का मुलक जैली, स्मृति यादों को आधार बनाकर लिखा, तुम्हरी खुद मा, सौण का मैना ब्वे कनुकै रैण, अपनी थाती को लेकर लिखा गीत वीरों गढ़ो कू देश, मेले कौथिक को लेकर मेला खौलो मां जैसे गीत लोगों की जुबान पर है। उन्होंने उत्तराखंड की लोक परंपरा जीवन ऋतु, त्यौहार, सुख-दुख, उल्लास, सैन्य परंपरा हर भाव के गीत रचे और गाए। उत्तराखंड आंदोलन में जनमानस ने उनके गीत प्रभात फेरियों में गाए। रेखा धस्माना के साथ गाए युगल नयु नयु ब्यो च की अलग लहक है तो अनुराधा निराला के साथ गाए खुद कैसेट के गीत सदाबहार हैं मन को छूते हैं। एक समय रेडियो में सुने जाते थे। फिर लोक सांस्कृतकि मंचों में उनके आयोजन की धूम रही।
अमेरिका, न्यूजीलैंड, दुबई कई देशों में उन्होंने अपने गीतों से लोगों को मत्रमुग्ध किया। नरेंद्र सिंह नेगी ने पहाड़ी गीतों पर और लोककाव्य पर किताब भी लिखी है। पिछले वर्ष वह गंभीर बीमारी से उभरे हैं, लेकिन स्वस्थ होते ही उन्होंने लोक काव्य मंचों पर गढ़वाली कविता पाठ शुरू किया है।

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