ना सरकारी स्कूल रहेगे ना सरकारी टीचर! पढ़े पूरी रिपोर्ट

उत्तराखंड राज्य में शिक्षा के हालात लगातार बदहाल होते जा रहे है मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के साथ साथ शिक्षा मंन्त्री के माथे पर चिंता की लकीरें देखने वाला देख सकता है कि सरकार भी परेशान है ।
आपको बता दे कि उत्तराखंड के स्कूलों में कम छात्र संख्या लगातार चिंता बढ़ा रही है।प्राथमिक विद्यालयों में तो तेजी से घटती छात्रसंख्या ने शिक्षकों की नई नियुक्तियों में अड़ंगा तक डाल दिया है।
तो दूसरी आये दिन बीपीएड-एमपीएड प्रशिक्षित बेरोजगार सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर अपनी मांगों को मनवाने में लगे हुए हैं।  
राज्य मे प्राथमिक विद्यालयों में तेजी से घटती छात्रसंख्या ने शिक्षकों की नई नियुक्तियों में अड़ंगा लगा दिया है। शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय ने कहा कि छात्र और शिक्षकों के संख्या का आनुपातिक आकलन होगा। इस संख्या को लेकर सरकार श्वेत पत्र जारी करेगी। जिन विद्यालयों में छात्रसंख्या घटने से शिक्षक अधिक संख्या में हैं, उन्हें अन्यत्र विद्यालयों में समायोजित किया जाएगा। शिक्षा मित्रों को औपबंधिक नियुक्ति देने पर फैसला भी रिक्त पदों की सही संख्या आने के बाद किया जाएगा। 

आपको बता दे किरा राज्य बनने के बाद से अब तक प्राथमिक से लेकर माध्यमिक स्तर तक सरकारी विद्यालयों में लगातार छात्रसंख्या घट चुकी है। खासतौर पर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में छात्रसंख्या मे भारी गिरावट आई है। प्राथमिक विद्यालयों में छात्रसंख्या 50 फीसद तक घटी ओर 20 हजार से ज्यादा छात्रसंख्या उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कम हो चुकी है । इस बीच शिक्षकों के पद बढ़े भी हैं और बड़ी संख्या में भरे भी गए हैं। अब हालत ये है कि शिक्षा के अधिकार एक्ट के तहत प्राथमिक विद्यालयों में छात्र व शिक्षक अनुपात 30:1 होना चाहिए, लेकिन राज्य में यह अनुपात 19:1 हो चुका है। 

कुल मिलाकर बात ये है कि आंकड़ों के हिसांब से 19 छात्रों पर एक शिक्षक कार्यरत है। शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय पहले ही कह चुके है कि शिक्षक व छात्रसंख्या अनुपात पर सरकार श्वेत पत्र जारी करेगी। उन्होंने कहा कि प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों के नए पदों पर नियुक्तियां संभव नहीं हैं। रिक्त पदों की स्थिति सामने आने के बाद ही इस पर फैसला लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार दस से कम छात्रसंख्या वाले करीब 600 प्राथमिक विद्यालयों को नजदीकी विद्यालयों में विलीन करने का निर्णय ले चुकी है। इन विद्यालयों के शिक्षकों को अन्यत्र शिक्षकों की कमी वाले विद्यालयों में समायोजित किया जाएगा। 
यही नही शिक्षा मंत्री ने कहा कि छात्रसंख्या की वस्तुस्थिति सामने आने पर शिक्षकों के पदों में कटौती के बारे में फैसला लिया जाएगा। शिक्षा मित्रों को औपबंधिक नियुक्ति देने की मांग पर उन्होंने कहा कि प्रदेश के साढ़े सोलह हजार से अधिक शिक्षकों पर अप्रशिक्षित होने की वजह से खतरा मंडरा रहा है।
आपको बता दू कि राज्य मे लगभग 2500 स्कूल 10 से कम छात्र सख्या वाले है । प्रांइमरी स्कूल की सख्या 12 378 है। जूनियर स्कूलो की सख्या 2746 है टीचरो की सख्य लगभग 42 हजार है । और छात्रों की सँख्या लगभग 8 लांख के बीच मे है । कुछ जानकार तो ये भी कह रहे है कि यहा 17 छात्रों पर एक टीचर है बहराल बोलता उत्तराखंड दो टूक कहता है कि राज्य मे सरकारी स्कूलों की बदहाली के लिए 17 सालो की सभी सरकारे जवाबदेही है। ना शिक्षा की गुणवत्ता सुधरी ना स्कूलो के हालत ना मूलभूत सुविधाएं आज तक । दुसरी बात राज्य के राजनेताओ ने अपने अपने वोट बैंक के चलते ओर उनकी बेवजह की घोषणाओं ने पूरे राज्य मे बेवजह हद से ज्यादा सरकारी स्कूल खुलवा दिये पे ये भी ना देखा कि जहां वो स्कूल खोले जा रहे है वहा की आस पास की जनता कितनी है ओर लगभग उस दौरान वहा बच्चों की सख्या कितनी। तीसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि आज कल मैदान की जनता कहा अपने बच्चों को सरकारी स्कूल मे पड़ा रही है हर 10 मिनट की दूरी पर दुनिया भर के निजी स्कूल खोले जो है । और बात पहाड़ की करे तो वहाँ बढ़ते पलायान ने जब माता पिता को ही गाँव   से भाग दिया तो वहां अब छात्रों की सख्या कहा से    बढे  ।इन सवालों का जवाब सरकार के पास है और हल भी बस इच्छाशक्ति हो तो सब कुछ ठीक वरना एक दिन जल्द वो दिन भी आ सकता है जब राज्य मे ना सरकारी स्कूल रहेगे ना सरकारी टीचर क्योकि जब छात्र ही नही जायगे सरकारी स्कूल तो ये समय आना तय है भले ही समय अभी और लगे। और यदि अब सरकार नही जागी तो ओर कुछ टीचर अपने कर्तव्य को ना समझे तो आने वाले समय को खुद महसूस करना अभी से शुरू कर दीजिए 

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