ट्रिपल इंजन से मातृशक्ति नाराज… सुनो त्रिवेंद्र करो इंसाफ

सूबे की अस्थाई राजधानी देहरादून में ही डॉक्टरों की कमी देखने को मिलती है तो सोचिए जो बीमार पहाड़ है जिन महिलाओं ने पहाड़ को बचाकर रखा है आज उनकी ही जिंदगी खतरे में है क्योंकि स्वास्थ सेवाएं सिर्फ खानापूर्ती है …. सुनो त्रिवेंद्र रावत हे खैरासैंण के लाल आप कैसे रावत हो कैसे पहाड़ के लाल हो … क्या आपको एक मां की … बहन की… दीदी की… भुलि की… ताई की …. आवाज कान में नहीं आती अरे पिछली सरकार ने जो किया सो किया आपने भी एक साल के अंदर कौन से झंडे गाड़ दिए यहां तो पहाड़ बीमार ही है न… सुनो त्रिवेंद्र चंपावत की प्रसव पीड़िता करहाती रही और उसे चिकित्सकों ने भर्ती करने की बजाय दूसरे अस्पताल जाने की सलाह दे डाली उन चिकित्सकों का तर्क था कि अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर नहीं वाह … त्रिवेंद्र रावत जी आपके आवास में आपकी अस्थाई राजधानी में सबकुछ मौजूद है और पहाड़ की जनता के लिए कुछ नहीं जागो साहब जागो…. अगर आप भी पहाड़ का भला न कर पाए तो फिर महादेव को ही राज्य की कमान सौंपनी पड़ेगी क्योंकि त्रिदेव यानी त्रिवेंद्र तो बस देख रहे हैं कर कुछ नहीं रहे हैं शुक्र मनाओ महादेव का कि पांच घंटे तक महिला तड़पने के बाद मदद की गुहार लगाने के बाद पिथौरागढ़ अस्पताल के लिए रवाना हुई और आधे रास्ते में ही डिलीवरी हुई।

 

देवभूमि के देवी देवताओं के आर्शीवाद से जच्चा और बच्चा दोनों स्वास्थ हैं लेकिन मां रेखा देवी और पती कैलाश राम चंपावत के लोग चंपावत के सरकारी अस्पताल से खास नाराज आज भी हैं। क्योंकि उन डॉक्टर्स और नर्सों ने बिना चेकअप और बिना देखे ही ये कह दिया कि डिलीवरी ऑपरेशन  से होगी यहां ऑपरेशन थिएटर नहीं है … यहां तक की सीएमएस आरके खंडी ने महिला की स्थिति को गंभीर बताया। वो भी बिना चेकअप किए अब सवाल ये उठता है … कि जब आधे रास्ते में ही डिलीवरी हो गई और जच्चा बच्चा दोनों स्वास्थ हैं तो बोलो त्रिवेंद्र दोष किसका ? राज्य की अस्थाई राजधानी में बैठकर 16 करोड़ के आशियाने में रहकर लग्जरी गाड़ी में घूमकर बिस्लेरी का पानी पीकर एसी की हवा खाने वाले हे त्रिवेंद्र क्या तुम भूल गए .. कि तुम पहाड़ पुत्र हो और याद रखना अगर तुम भी प्रदेश का भला न कर पाए पहाड़ी जिलों का भला न कर पाए तो शुक्राचार्य के श्राप से तुम न बच पाओगे लिहाजा पहाड़ के दर्द को समझते हो दर्द दूर करो भाषण कम दो और सिर्फ काम करो ये आवाज और ये अल्फाज पहाड़ की वो जनता बोल रही है जो त्रिवेंद्र रावत पर भरोसा करती है। और वो कहती है कि हमरा भरोसा टूटे नहीं।

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