पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत लिखते है कि
नौजवान_दोस्तों, आपकी परेशानी मैं समझता हूं। इसीलिये मैंने फैसला किया है कि, सरकारी स्तर पर भर्तियों में जानबूझकर बरती जा रही सुस्ती कहूं या देरी कहूं, के विरोध में मैं 1 दिन का उपवास करूंगा, शायद गवर्नर_हाउस के सामने करूं, चाहे किसी मंदिर के सामने करूं‌। मगर आप सबसे भी मेरी प्रार्थना है, जीवन के फैसले भावुकता में नहीं लिये जाते हैं, 2017 में जिस समय कांग्रेस उत्तराखंड में चुनाव हारी, मेरी सरकार बेरोजगारी की वार्षिक वृद्धि दर को 2013 के 11 प्रतिशत के मुकाबले घटाकर के 2.5 प्रतिशत पर ले आयी और राजस्व वृद्धि दर को बढ़ाकर के हमने 19.5 % कर दिया था, जो देश के अंदर कर्नाटक के बाद सर्वाधिक थी, एक लय थी जो आपके भविष्य का रास्ता बना रही थी और हम शिक्षित बेरोजगारी की वृद्धि दर को शून्य प्रतिशत में लाना चाहते थे और जो श्रमिकों के बीच में बेरोजगारी है, वो तो पहले से ही हमने वाइप्ड आउट कर दी थी, आज चुनौतियां कठिन हो गई हैं और अगले दो-तीन साल तक की चुनौतियां कठिन बन गई हैं।

इसके साथ ही हर दा ने लिखा कि एक अच्छी खबर है, हमारे टिहरी के विस्थापित भाईयों के लिये जो देहरादून और हरिद्वार के जिन गांव में वो रह रहे हैं, उनको अब ग्राम पंचायत का दर्जा मिल गया है, उनको मैं बधाई देना चाहता हूं और मुझे विश्वास है कि, ऐसे सभी लोगों को यहां तक कि, वन गुर्जरों के मामले में भी उनको भूमिधर अधिकार भी सरकार देगी। मगर मुख्यमंत्री जी से कहना चाहता हूं कि, जरा बिंदुखत्ता, पापड़ी और उधमसिंहनगर में ऐसे दर्जनों गांव हैं, उनकी तरफ देखियेगा। कुछ लोग जो इंद्रा ग्राम व हरीनगर के तौर पर बसे थे, उनके लिये हमारी मंत्रिमंडल ने एक फैसला किया था कि, उन जमीनों को उनका मालिकाना हक देने का, जिसको आपकी सरकार ने रोक दिया है, उस काम को भी जरा आगे बढ़ाईये।


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