किसने किसको बचाया, सीएम सर आप खुद मामले की जांच कराए यहा बात जीरो टालरेश की है ओर मामला सचिवालय का है

जहा से उत्तराखंड का शासन चलता है उसे सचिवालय कहा जाता है यही से बहती है विकास की गंगा क्योकि नीतियां भी यही बनती है और उन नीतियों को अमलीजामा पहना कर धरारतल पर भी यही से उतार जाता है और यही बेठते है जीरो टालरेश वाली सरकार के लाट साहब सुरक्षा के भी यह रहते है पुख्ता इंतजाम राज्य के मुख्यमंत्री भी यही से बेठ कर कार्य करते है पर ये क्या सुन रहे है हम क्योकि दिन से लेकर स्याम तक सचिवालय के अंदर ओर बहार खूब हल चल ओर भगदड़ आज देखने को मिली जानते है क्यो सर ख़बर आयी कि सचिवालय मै नौकरी लगाने का बड़ा फर्जीवाड़ा होने के मामला जब सामने आया तो सचिवालय के हर कर्मचारी जिंसने भी सुना उसके होश उड़ गए

आपको बता दे कि उत्तराखंड सचिवालय में पैसे लेकर फर्जी सिग्नेचर और कागजातों के आधार पर नियुक्ति दिलाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। ओर सबसे बड़ी हैरानी की बात ये रही कि पकड़े गए आरोपी को महज 30 मिनट की पूछताछ के बाद सचिवालय सुरक्षा प्रशासन ने जाने दिया सुना है उच्च अधिकारी के कहने पर छोड़ा गया खबर ये भी है कि वो कर कह रहा था कि हां उसने यह आरोप किया है। फिर उसको छोड़ा क्यो गया आपको बता दे कि पूरे सचिवालय के अंदर से लेकर चतुर्थ तल तक जहा सीएम कार्य करते है वहा तक हलचल जोर से रही आपस मे वहां काम करने वाले कर्मचारी बात कर रहे थे कि 35 लोगो को सचिवालय मैं नोकारी लगाने का झांसा दिया गया और एक व्यक्ति को नोकरी लगाने के लिए 3 लाख रुपए लिए गए जो तकरबिन एक करोड़ से ज्यादा होते है टोटल में 35 लोगो को देखकर तो कुछ ये भी बोलते नज़र आये की सिर्फ 5 से 7 लोगो के साथ जालसाजी की है 30  30 हज़ार रुपए लेकर          

जानकारी मिली है कि  ये संदीप बिष्ट है जो कोटद्वार का निवासी है और इससे पहले वो उपनल के माध्य्म से सचिवालय में कार्य कर चुका है लेकिन अभी अपनी नोकरी छोड़ चुका है बात फ़र्ज़ी सिंगनेचर की भी आई क्योकि , उसे मालूम है कि किसके सिग्नेचर कैसे होते हैं पत्र मैं ओर हो  भी रखे थे सूत्र ये बात कह रहे है ये पूरा मामला तब सामने आकर उजागर हुआ जब संदीप नाम के व्यक्ति ने डोईवाला में रहने वाले पांच युवकों को सचिवालय में संविदा पर नौकरी लगवाने का वादा किया। उसके बाद वो खुद आज सभी को सचिवालय ले आया खबर है कि उसने खुद फर्जी सिग्नेचर करके नियुक्ति पत्र भी जारी कर दिया और गेट के बाहर खुद खड़ा होकर अंदर जाने के लिए उन्हें कहा जिनको नोकरी लगाने के नाम पर पैसे खाये लेकिन, जब सचिवालय सुरक्षा कर्मचारियों को यह लगा कि यह नियुक्ति पत्र फर्जी हैं। तो मामला गड़बड़ा गया। उसके बाद सभी पांच पीड़ितों से पूछताछ की गई, जिसमें यह बात सामने आई कि आरोपी संदीप गेट के बाहर ही खड़ा है।
बस फिर क्या था आनन फानन मैं संदीप को सचिवालय के सुरक्षा प्रशासन ने
जब पूरा मामला सचिवालय के सुरक्षाकर्मियों के सामने स्पष्ट हो गया, तो उन्होंने आरोपी संदीप को पकड़ लिया। जिसके बाद उससे आधे घंटे तक पूछताछ की गई। बताया जा रहा है कि किसी उच्च अधिकारी के कहने पर उसे छोड़ दिया गया। उधर, संदीप का कहना है कि उससे गलती हुई है। लिहाजा उसने सचिवालय के अधिकारियों से गलती मान ली है और सभी आरोपियों के पैसे वापस करने के लिए कह दिया

वही इस पूरे मामले मे सचिवालय के अधिकारी
सचिवालय सुरक्षा अधिकारी जीवन सिंह बिष्ट का कहना है कि पूछताछ और कुछ आईडी पेपर लेकर फिलहाल संदीप को छोड़ा दिया गया है। लिहाजा, जरूरत पड़ने पर उसे फिर बुलाया जाएगा। जबकि ये मामला सीधे-सीधे राज्य की सर्वोच्च कार्यदायी संस्था सचिवालय से जुड़ा है और कैसे सचिवालय प्रशासन ने आरोपी को जाने दिया? ये बड़ा सवाल खड़ा होता है वही
इस पूरे मामले पर मुख्यसचिव उत्पल कुमार का कहना है कि ये मामला बेहद गंभीर है और इसकी जांच करवाई जा रही है कि कैसे ये सब हुआ है और अगर कोई अंदर का व्यक्ति इसमें शामिल हुआ तो उस पर भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ये तो थी सचिवालय के अंदर की बात                                                                     अब बोलता उत्तराखंड सवाल खड़े करता है कि उस युवक को छोड़ा क्यो गया पुलिस के हवाले क्यो नही किया गया ?? किस अधिकारी के कहने पर उसको छोड़ा गया या जाने दिया गया , क्या सचिवालय के सुरक्षा प्रशासन को अधिकार है कि फर्जीवाड़ा सामने आने पर वो सिर्फ किसी के माफी  मागने पर उसको छोड़ दे कुछ I.d पुर्फ़ लेकर या सचिवालय सुरक्षा प्रशासन किसी अधिकारी के दबाव मैं था ,क्या सचिवालय सुरक्षा प्रसाशन ने उन लोगो  के नाम पाते फोन नम्बर भी लिए जिन्हें उस युवक ने फर्जी ज्वॉइनइंग पत्र दिया था, सवाल ये भी है कि जिन सचिवालय के अधिकारी के सामने ये मामला जब खुला तो क्या उन्होंने सबसे पहले मुख्यसचिव को अवगत कराया या नही क्योकि  ये  मामला बेहद गम्भीर था इस बात को मुख्य सचिव खुद अब स्वीकार चुके है क्या इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच नही होनी चाइए ,क्या इस पूरे मामले मे सचिवालय मैं काम करने वाले किसी भी अधिकारी की मिलीभगत नही हो सकती ,सवाल ये भी खड़ा होता है कि क्या इससे पहले ये सब नही हुवा होगा जो पकड़ मैं नही आये ,सवाल बहुत क्योकि मामला वहां से जुड़ा है जहाँ से चलता है राज्य का शासन लिहाज़ा राज्य के मुख्यमंत्री जी को स्वयं इस पूरे घटना कर्म को खुद देखना होगा क्योंकि सवाल जीरो टालरेश का है

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