काफल ,हिसालू को नुकसान जाने क्यों ??

 

वरिष्ठ   पत्रकार     शंकर सिंह भाटिया  जी को कलम से

आजकल  इस बेमौसम  ने क्या  मैदान। क्या पहाड़    हर तरफ  जहां लोगो को  उलझन मैं। डाल रखा है उनके  स्वास्थ्य   जहा  में  गिवारट आ रही है   वही जानवर भी  ही परेशान है   तो जंगली  फलों को नुकसान पहुचना स्वाभविक है    इस    बेमौसम की बारिश ने पहाड़ों में न केवल मई के महीने में ठंड बढ़ा दी है, बल्कि इस सीजन में पकने वाले औषधीय गुणों से भरपूर जंगली फलों काफल, हिसालू, किल्मोड़ की फसल को भी अत्यधिक हानि पहुंचाई है।J

कुमाउंनी भाषा का एक गीत-‘बेड़ू पाको बारमासा, काफल पाको चैत’ की देश दुनियां में ऐसे ही बड़ी धूम नहीं है। काफल इस मध्य हिमालीयी क्षेत्र में मध्य ऊंचाई करीब डेढ़ हजार मीटर से लेकर करीब ढाई हजार मीटर की ऊंचाई पर पाया जाने वाला औषधीय तत्वों से भरपूर रसीला मौसमी फल है। इस फल की विशेषता यह है कि यह अधिक बारिश में धुल जाता है और इसकी मीठास खत्म हो जाती है।                                                   इस बार तो न केवल लगातार बारिश हो रही है, बल्कि ओलों ने भी काफल को अत्यधिक नुकसान पहुंचाया है। काफल की एक विशेषता यह भी है कि यह विशेष ऊंचाई के साथ विशेष ढलानों में स्वतः उगता है। हालांकि उत्तराखंड सरकार की पौधरोपण की नीति के तहत अन्य पौधों के साथ काफल का रोपणा भी करने की नीति पर बनाई गई है। एक दिन पहले मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस पर निर्णय लिया गया है, लेकिन शायद सरकार को पता है कि नहीं, काफल के पौध का रोपण अन्य प्रजातियों की तरह संभव नहीं है। जानकार बताते हैं कि एक विशेष प्रकार के पक्षी द्वारा काफल का बीज निगलने बाद पक्षी के पेट में बीज को एक विशेष तापमान मिलता है, उसी के बाद पक्षी के मल के साथ गिरने वाले बीज से पौधा पैदा होता है। अन्यथा जहां काफल पहले से पनपा हुआ है, उसकी जड़ों से ही कोपलें निकली है, तब उसके पौधे बनते हैं। इन पौधों को उखाड़कर दूसरे स्थान पर नहीं लगाया जा सकता है। उत्तराखंड में कुछ ऐसे प्रकृति प्रेमी हुए हैं, जिन्होंने काफल के बीज को पक्षी के पेट में मिलने वाला तापमान देकर काफल के पौधे पनपाए हैं.                      पिथौरागढ़ जिले के डीडीहाट तहसील के अंतर्गत वृक्ष मित्र पुरस्कार विजेता सानदेव निवासी कुंवर दामोदर राठौर ऐसे ही प्रकृति प्रेमी थे, जिन्होंने काफल की नर्सरी बना ली थी। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद यह काम आगे नहीं बढ़ पाया।

काफल का फल तो औषधीय गुणों वाला है ही, काफल के पेड़ की छाल भी औषधीय गुणों से भरपूर है। काफल की खाल विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों में प्रयुक्त होती है साथ ही चमड़ा शोधन में काफल की खाल का उपयोग बहुतायत से किया जाता है। इन्हीं कारणों से काफल के पौधे को बहुत नुकसान पहुंचा है। काफल के बहुत सारे पौधे फल नहीं देते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में अखती कहते हैं। ऐसे पौधों में फलों की जगह लाल बालियां आती हैं। यदि ऐसे अखती पौधों का उपयोग खाल के लिए किया जाए और फल देने वाले पौधों को नुकसान न पहुंचाया जाए तो काफल को बचाया जा सकता है। लेकिन इस बार तो काफल में अच्छा खासा फल आया था, बारिश और ओलों से उसे गिरा दिया। पेड़ों में बचे हुए फलों में रस ही नहीं रह गया है। और काफल चैत तो छोड़ों बैसाग के महीने में भी नहीं पक पाया है।

यही स्थिति हिसालू और किल्मोड़ की भी है। हिसालू को कई क्षेत्रों में हिस्सर और किल्मोड़ को किनगोड़ भी कहा जाता है। हिसालू और किल्मोड़ का भी रोपण नहीं किया जाता। यह जंगलों में झाड़ियों के रूप में स्वतः उग आता है। हिसालू तथा किल्मोड़ के फलों के अतिरिक्त जड़ों को भी औषधि के रूप में उपयोग किया जाता है। किल्मोड़ा की जड़ों को डायबिटीज की बेहतर और अचूक दवा के रूप में उपयोग किया जाता है। गांवों में जहां कभी बड़े-बड़े हिसालू और किल्मोड़ के झाड़ दिखाई देते थे, अब छोटे-छोटे पौधे कहीं-कहीं दिखाई देते हैं। गुच्छों में इनके फल आते हैं। लेकिन इस बार अत्यधिक बारिश की वजह से इनमें भी बिरले फल ही दिखाई दे रहे हैं।

कुल मिलाकर अतिवृष्टि और ओलों ने मध्य ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में इस सीजन में पकने वाले औषधीय गुणों वाले जंगली फलों को काफी नुकसान पहुंचाया है। इसे मौसम के बदलाव की मार के रूप में भी देखा जा रहा है।

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