इन बाघों से पहाड़ के लोगो को कैसे बचाये ?

: राज्य की सरकार और विपक्ष भले ही देहरादून मे रहकर बढ़ते पलायान पर चिंता जता रहा हो पर कोई भी ये तो बताये की लोग पहाड़ो मे क्यो रहे? ओर क्यो अपने घर गाँव वापस आये? सबसे पहली बात सरकारी स्कूल बदहाल गुडवत्ता खत्म ।
दूसरी बात मात्रशक्ति के इलाज से लेकर आम जनमानस के लिए स्वास्थ्य सेवाओँ का पूरा अभाव जग जाहिर है इसलिए पहाड़ बीमार ही रहता है।
तीसरी बात खेती चौपट हो गई बांदर ओर जंगली सुवरो ने सब कुछ तबाह कर डाला ।
चौथी बात पहाड़ में ही पहाड़ के युवाओ के लिए रोजगार नही।
पांचवी बात कोई भी अच्छा और बड़ा अधिकारी पहाड़ जाने को तैयार नही इसमे डॉक्टर को भी जोड़ दिया जाए।
छठवी बात कही पानी की किलत्त तो कही सड़क और बिजली की ।
ओर सातवी बात है बाघ की जी हा जिसे आप गुलदार कहते है जो आये दिन पहाड़ो के लोगो के जानवरों को तो मार कर खा ही रहा है अब लोगो की भी जान ले रहा है ।


क्योकि अब देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ो से लेकर हरिद्वार तक गुलदार की आहट, हमले और लोगों की मौत अब आम बात होती जा रही है. ।कुछ दिन पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी संसद मे गुलदार ( बाघ) के आतंक का मामला उठाया था और जो लोग गुलदार का निवाला बने उनके परिवार से किसी एक सदस्य को सरकारी नोकरी देने की माग की थी
आपको बता दे कि वन विभाग द्वारा जारी चौकाने वाले आंकड़ों पर गैर फरमाएं तो राज्य गठन के 17 सालों में गुलदार के हमलों में 300 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. वहीं गुलदार के हमले में जान गंवा चुके है और मृतकों के परिजन आज भी उस मंजर को याद कर कॉप उठ जाते है ।


आपको बता दे कि गढ़वाल हो या कुमाऊँ हर जगह ( बाघ) गुलदार ने गाँव गाँव की आबादियों में अपनी दस्तक देकर पहले उनके जंगली जनवरी को। अपना निवाला बनाया फिर अब ये बाघ मनुष्य को निशाना बना रहा है । जिससे पहाड़ के लोग दहशत मे जीते है । गाँव के लोग को एक ही खौफ रहता है कि ना जाने किस झाडियों से घात लगाए गुलदार ( बाघ ) हमला कर दें.। इस बुजुर्ग महिला ने भी अपनो को खोया है इनकी आंखों मे ये दर्द आज भी देखा जा सकता है 

आपको बता दे कि कुमाऊं में पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और बागेश्वर जिला गुलदार के हमले से सर्वाधिक आतंकित रहता है. रिपोर्ट के अनुसार गुलदार के हमले के पिथौरागढ़ में 79, अल्मोड़ा में 70, नैनीताल डिविजन में 22, अल्मोड़ा में 18 मामले दर्ज किए गए हैं. राज्य गठन के 17 सालों में गुलदार के हमलों में 300 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और ये आंकड़े बीते महीनों के है

कुछ लोग कहते है कि इसके पीछे के कारण गुलदारों की संख्या में बढ़ोतरी, गामीण क्षेत्रों के आसपास अधिक झाड़ियों का होना,जंगलों में आग से भोजन की कमी बढ़ना और सिकुड़ते जंगल को माना जाता है. लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो फरवरी से अप्रैल-मई तक जंगलों में आग की घटनाओं से भी गुलदार प्रभावित होता है. इसी महीने गुलदार के हमले बढ़ जाते हैं. इस दौरान ठिकाना छिनने से गुलदार तनाव में रहता है और मानव आबादी की ओर रुख करता है. 

वहीं वन विभाग द्वारा किसी क्षेत्र में गुलदार के देखे जाने और हमले के बाद पिंजरा लगाया जाता है, लेकिन गुलदार इस झांसे में नहीं आता, वह पिंजरे से दूर ही रहता है. संसाधनों से जूझ रहा वन महकमा लोगों के दबाव को देखते हुए वन विभाग की टीम ट्रैंकुलाइज करने के लिए जंगलों की खाक छानती रहती है. ऐसे में देवभूमि के लोगों के जेहन में एक ही सवाल कौंध रहा है कि कब उन्हें गुलदार के आतंक से निजात मिल पाएगी ? और वे बेखौफ होकर सकून की जिंदगी व्यतीत करेंगे.

बोलता है उत्तराखंड की वन मंन्त्री हरक सिंह रावत आप ही बताओ गाँव के लोग जिनको गुलदार या बाघ मार रहा है अब इसे कैसे रोकोगे ओर क्या खुद करोगे ओर क्या गाँव वालों से अपील करोगे । वन मंत्री भी पहाड़ पुत्र है और अपने राजनीतिक शत्रु के लिए ये खुद किसी बाघ से कम नही । पर सवाल इस बात का है कि क्या डबल इज़न की सरकार बाघ के आतंक मे मारे जाने वाले पहाड़ के लोगो के लिए क्या कुछ नई नीतियां बना रही है ? क्या बाघ के हमले मे मारे जाने वाले व्यक्ति के परिवार के किसी सदस्यों को सरकारी नोकरी दोगे ?
तमाम वो सवाल है जिसका जवाब सरकार के पास है उम्मीद करता है बोलता उत्तराखंड़ की हरक सिंह रावत जल्द कुछ रास्ता निकाले अपनी सरकार के साथ मिलकर ।

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