श्रीमन, ऐसे में पलायन नहीं होगा तो क्या होगा, जरा देखो तो सही द्वींग-तपौण जैसे अटल आदर्श ग्राम की व्यथा !

जोशीमठ। आठ साल पहले की बात है। उत्तराखंड के चार धाम यात्रा के अहम पड़ाव जोशीमठ क्षेत्र के डुमक-कलगोठ, पल्ला-जखोला, पिलखी, भर्की , भेंटा, द्वींग-तपौण, किमाणा, लॉजी-पोखनी ,मल्ली टंगणी, व सुभाई जैसे गांवों को सड़क से जोड़ने की बात चली। लेकिन बात बस रात गई बात गई वाले अंदाज अंदाज में खत्म हो गई।

हालांकि चुनाव उसके बाद भी हुए और सड़क की सहूलियत के आभाव में जीते गांवों को सड़क के सब्जबाग फिर दिखाए गए लेकिन सड़क आज तक नहीं पहुंची। वहीं इस बात का भी खबर भी नहीं है कि डबल इंजन की सरकार के दौर में हुजूर को गांवों की सहूलियत और अपनी पार्टी की पिछली सरकार के दौर के वादों के बारे में पता है कि नहीं!

बहरहाल इलाके की हकीकत ये है कि जिस गांव के सीने में तत्कालीन सरकार ने आठ साल पहले अटल अटल आदर्श ग्राम का तमगा टांगा उस गांव में भी आज तक सड़क नहीं पहुंची है।

कहते हैं किसी भूभाग के लिए सड़क उसकी तकदीर होती है अगर वाकई में ये कहावत सच है तो चमोली जिले का द्वींग-तपौण ग्राम पंचायत भी उन्हीं अभागी ग्रामसभाओं की फेहरिश्त में शुमार है जिनकी याद नए दौर के शहशाहों को सिर्फ और सिर्फ चुनाव के दौरान आती है।

गौरतलब है कि साल 2009 मे अटल आदर्श ग्राम घोषित करते हुए यहां बुनियादी सहूलियतों से सुसज्जित करने का घोषणा की गई थी। तब तत्कालीन सीएम डा0 रमेश पोखरियाल निंशंक ने जोशीमठ के गांधी मैदान मे अन्य योजनाओं के साथ ही द्वींग-तपौण सडक-7किमी0 का शिलान्यास  मय धन राशि स्वीकृति के साथ  किया था।

लेकिन गजब देखिए अब आठ साल बीत चुके हैं लेकिन द्वींग-तपौंण के लिए सात किलोमीटर सड़क नहीं बनी।

इतना ही नहीं मोटी पगार वाले काबिल अफसरों के महकमों ने इसको नौ दिन चले अढ़ाई कोस जैसा बना दिया है। यहां सड़क की राह से रोड़े हटाने वाले विभागों का सुस्त मिज़ाज सड़क की राह में खुद रोड़ा बन गया है।

गजब देखिए घोषणा और शिलान्यास के बाद लोक निर्माण विभाग ने सडक का सर्वे तो जरूर करवाया लेकिन आठ साल में इस पर कोई कार्य तक शुरू नही किया। जिसके चलते द्वींग-तपौण के ग्रामीण पलायन को विवश हो रहे हैं।

सड़क की सहूलियत के लिए स्थानीय ग्रामीण कई बार गुहार लगा चुके है। बावजूद इसके महकमों के कान में जूं तक नहीं रेंगती।

ऐसे में अब ग्रामीणों के सब्र का पैमाना छलकने को तैयार है । आठ वर्ष से सडक का इंतजार कर रहे ग्रामीणो के पास अब आंदोलन व आमरण अनशन ही विकल्प रह गया है।

उनका कहना था कि यदि दो माह के भीतर सडक निर्माण की दिशा मे कार्यवाही नही हुई तो द्वींग-तपौण के ग्रामीण सडक के लिए सडको पर उतरेगे।

संपर्क करने पर लोनिवि के ईई डीएस रावत ने बताया कि लंगसी -द्वींग-तपेाण मोटर मार्ग के लिए सात मीटर चौडाई में पेड़ों की गणना की जानी है। इसके लिए विभाग ने दो बार वन विभाग को पत्र लिखा गया है।

लेकिन वन विभाग ने वनो मे अग्नि लगने के कारण गणना के लिए समय नही दिया। शीध्र ही वन विभाग के साथ लोनिवि पेडो की गणना करेगा। इसी के बाद सडक निर्माण की आगे की कार्यवाही हो सकेगी।

वास्तव मे आजादी के सत्तर वर्ष बीतने के बाद जोशीमठ प्रंखड के कई गांव आज भी सडक से अछूते है। जिनमे डुमक-कलगोठ, पल्ला-जखोला, पिलखी, भर्की , भेंटा, द्वींग-तपौण, किमाणा, लॉजी-पोखनी ,मल्ली टंगणी, व सुभाई आदि प्रमुख हैं।

इन ग्रामीणों को आस थी कि छोटा राज्य बनने के बाद इनकी सुध ली जाऐगी। लेकिन राज्य बने 17वर्ष पूरे हो गए है। बावजूद इसके इन क्षेत्रो के ग्रामीण आज भी 5 से 25किमी तक पैदल सफर को मजबूर हैं।

लेकिन अंधेर नगरी का आलम देखिए आठ साल बीतने के बाद जंगलात महकमें के काबिल मुलाजिम सड़की जद में आने वाले दरख्तों  की गिनती तक न कर सके। ऐसे में पलायन नहीं होगा तो क्या होगा, हजूर अब आप ही सोचिए!

 

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