मंत्री हरक सिंह रावत बताओ क्या मेरे पहाड़ की नारी यू ही मरती रहेगी? जंगल में मिला उसका शव।

दुःखद ख़बर उत्तराखंड के कीर्तिनगर तहसील के अंतर्गत धारी गांव से है जहा गुलदार ने एक महिला को मार डाला। ओर महिला का अधखाया शव रात में जंगल में  बरामद हो गया दुःखद
बता दे कि टिहरी जिले के धारी गांव की 45 साल महिला कल्पेश्वरी देवी पत्नी स्व. रमेश पांडे कल दिन में घास लेने  गई थी। ओर जब देर शाम तक वह वापस नहीं लौटी, तो उसकी ढूंढ खोज की गई। वहा के
लोगों ने इसकी सूचना वन विभाग, पुलिस और तहसील प्रशासन को दी। वन विभाग और ग्रामीणों के सर्च अभियान के दौरान लोगों को महिला की चप्पल मिली, जिससे ये पक्का हो गया कि महिला जंगली जानवर का शिकार बन गई होगी। रेंजर देवेंद्र पुंडीर ने बताया कि कल रात लगभग नौ बजे जंगल में महिला का शव मिल गया।
बता दे कि बीते साल 6 दिसंबर को रुद्रप्रयाग में गुलदार ने पपडासू गांव में महिला को अपना निवाला बनाया था। अगले दिन, 7 दिसंबर को शिकारी जॉय हुकिल ने गुलदार को गोली मारी थी। तब से, घायल गुलदार का कहीं कोई सुराग नहीं लग पाया था।
अब तक
6 नवंबर 2019 को जखोली ब्लॉक का सतनी गांव में 54 वर्षीय व्यक्ति को बाघ ने मारा।
8 नवंबर 2019 को जखोली ब्लॉक के बांसी गांव में 35 साल महिला को मारा।
6 दिसंबर 2019 को जखोली ब्लॉक के पपडासू गांव में 50 साल की महिला को मारा दुःखद।
उत्तराखंड के नेताओ, मंत्रियो, दाईत्व धारियों बताओ कैसे बाघ के आतंक से आप अपने पहाड़ के लोगो की रक्षा करोगे ???
आये दिन गुलदार किसी घर का चिराग बुझा रहा है तो किसी घर से मासुम के माता पिता को अपना निवाला बना रहा है


आखिर ये मानव ओर जानवर के बीच होते सघर्ष को कम से कम कैसे किया जाए। ये कोन सोचेगा सरकार ।
नाचने वाले तो नाच रहे है किसी गाने मै कि गढ़वाल मैं बाघ लगा हुवा पर ये बाघ कैसे मासूमो को ,उनके अपनो को अपना निवाला बना रहा है इस पर अब मंथन नही निर्णय लेने की जरूरत है वन महकमे को , मंत्री जी को


क्योंकि
दुःख दर्द के सिवा पहाड़ वालो किस्मत मे कुछ लिखा भी है ऊपर वाले ने या नही?? ये ऊपर वाला ही जाने। पर जिन्होंने इस पहाड़ को बचाये रखा है, वही मातृ शक्ति आये दिन अपनी जान गांव रही है, कभी भालू, कभी बाघ इनको निवाला अपना बनाता, तो कभी पहाड़ से या फिर किसी पेड़ से गिरकर इनकी दर्दनाक मौत हो जाती , उत्तराखंड की समय समय की राज्य की सरकार और विपक्ष भले ही देहरादून मे रहकर बढ़ते पलायान पर चिंता जाहिर करते हो। पर कोई भी ये तो बताये की ये लोग अब पहाड़ो मे क्यो रहे? ओर क्यो अपने घर गाँव वापस आये?
सबसे पहली बात- सरकारी स्कूल बदहाल गुडवत्ता खत्म ।
दूसरी बात- मातृशक्ति के इलाज से लेकर आम जनमानस के लिए स्वास्थ्य सेवाओ का पूरा अभाव जग जाहिर है इसलिए पहाड़ आज भी बीमार ही रहता है।
तीसरी बात- खेती चौपट हो गई है बांदर ओर जंगली सुवरो ने सब कुछ तबाह कर डाला है ओर तबाह करते रहते है।
चौथी बात- पहाड़ में ही पहाड़ के युवाओ के लिए रोजगार नही है साहब ।
पांचवी बात – कोई भी अच्छा और बड़ा अधिकारी पहाड़ जाने को तैयार नही इसमे डॉक्टर को भी जोड़ दिया जाए तो गलत ना होगा
छठवी बात- कही पानी की किलत्त तो कही सड़क और बिजली की ।
सातवी बात- बाघ की जी हा जिसे आप गुलदार कहते है जो आये दिन पहाड़ो के लोगो के जानवरों को तो मार कर खा ही रहा है अब आये दिन लोगो की भी जान ले रहा है ।
आठवी बात- पल पल डराता बरसातों के दौरान वो मौसम जो ना जाने कब तबाही ले आये, कब किस की जान ले ले, ना जाने कब कौन सोते हुए तो कोई जागते हुए मौत के काल मे इस आपदा के दौरान समा जाए।
नोवी बात- इन सब से अगर कोई बच भी जाये तो फिर ना जाने कब पहाड़ से कोंन सी गाड़ी कब खाई मैं गिर जाए, कोई नही जानता, किसका अपना किस कारण ओर किस वजह से आकाल मौत के काल मैं चला जाये ये डर भी इन पहाड़ो की बदहाल सड़को मैं चलते समय सताए तो कही सरकारी बसों के अभाव के कारण तो कही गाड़ियों की फिटनेस ओर कही सड़क पर गड्ढे वजह बनते है हादसे के।
दसवीं बात – आये दिन रोजाना की दिन चर्या के दौरान जंगल जाकर या फिर पहाड़ियों मैं चढ़कर घास काटना । ताकि अपने औलाद की तरह प्यारे अपने जानवरो का पेट भरा जाए और इस के चकते एक चूक ,या फिर जरा सी गलती, जरा सा ध्यान हटना, या फिर कुछ भी आदि आदि
पहाड़ी से या पेड़ से गिरकर उनकी दुःखद दर्दनाक मौत हो जाना।

यहा कोई एक दिन की बात नही है
अक्सर
मेरे पहाड़ मैं तेरे पहाड़ मैं पूर्व मुख्यमंत्री के पहाड़ मैं , वर्तमान मुख्यमंत्री के पहाड़ मैं, सभी मंत्री , नेता, दाईत्व धारियों के पहाड़ मैं , सभी सासंदो के पहाड़ों मैं, उत्तराखंड के नामी गिरामी अफसरों, फेमस, लोगो के पहाड़ मैं ये अक्सर इस प्रकार दुःखद जानकारी मिलती रहती है। किसी को बाघ मार देता, किसी पर भालू हमला कर देता, कोई गर्भावस्था के दौरान अच्छे इलाज़ के अभाव मैं दम तोड़देती , कोई कही दिन रात खेत मैं मेहनत करते करते थक जाते है पर बंदर सुवर उनकी मेहनत पर पानी फेर देते।
बहुत कुछ है क्या क्या बोलू ओर क्या क्या लिखूं।
सिर्फ अब इतना कहता है बोलता उत्तराखंड कि अब आंख मैं आंसू है और दिल मैं गुस्सा उन के खिलाफ जो अक्सर पहाड़ के विकास के लिए वादे तो करते है पर चुनाव बाद भूल जाते है।
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