हरदा शब्दों नश्तर यूं न चलाइए कि हर कोई अपनी दाढ़ी का तिनका छिपाने लगे!

देहरादून- यकीनन अगर हरदा राजनीति में नहीं होते तो शायद पत्रकारिता या साहित्य जगत में नामचीन हस्ती होते। अपनी बात की कड़वी गोली को सियासी माएनो की चाशनी में लपेट कर कैसे जनता की तश्तरी में पेश किया जाता है और उसे सत्ता के शिखर पुरुषों को कैसे खिलाया जाता है,इसका अंदाजा उनकी फेसबुक वॉल को निहार कर आसानी से लगाया जा सकता है।

अब जरा हरदा की इस पोस्ट को पढ़िए, खुद को उम्रदराज भाभी, विपक्ष को देवर, अपने चुभते तल्ख तेवरों को हल्के में लेने की गुजारिश करना हरदा ही कर सकते हैं। पूर्व सीएम हरीश रावत की ये पोस्ट उनकी केदारधाम पैदल यात्रा से लौटने के बाद की है।

ये पोस्ट इशारों ही इशारों में उनके अनुभव की हकीकत बयां कर रही है। अपनी फेसबुक वाल को अपडेट करते हुए हरदा जब अपनी पोस्ट में दो नेताओं के भाषण के शब्द श्रंगार पर निशाना साधते हुए जनता से उन्हें पहचनाने की अपील करते हैं और पोस्ट के अंत में लिख देते है कि अब पीर पिघल गई और हिमालय से गंगा भी निकल गई।

तो जाहिर सी बात है कि अगर सत्ता की आंखों में पानी होगा तो सत्ता जहां शर्मिंदा होगी वहीं जनता उनकी गूढ़ बात में छिपे गुड़ को अपनी-अपनी मिठास के हिसाब से निकाल लेगी। बहरहाल हरदा ने निशाना साध कर तीर चलाया है। आप भी पढ़िए हरदा की पोस्ट को—–

 

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