गूगल के डूडल को धन्यवाद, चिपको आंदोलन की याद हुई ताज़ा

 

उत्तराखंड के विश्वविख्यात चिपको आन्दोलन को आज गूगल ने डूडल बनाकर याद किया है. गौरतलब है कि वर्तमान उत्तराखंड के  चमोली जिले में चिपको आंदोलन की शुरुआत 1970 के दशक में एक अहिंसक आंदोलन के तौर पर हुई थी. उस समय चमोली जिला अविभजित उत्तर प्रदेश का एक भाग था.यह आन्दोलन आने वाले समय में पेड़ बचाने का प्रतीक बन गया. विडम्बना ही है कि आज इसी उत्तराखंड में 25000 पेड़ आल वेदर रोड के नाम पर काटे जा चुके हैं. यानि अपनी विरासत हमें गूगल ने याद दिलाई है.

 

1974 के जनवरी माह में चमोली के  रैंणी गांव के वासियों को पता चला कि 2451 अंगू के  पेड़ों का छपान (काटने के लिए चुने गए पेड़) हुआ है. ये  पेड़ साइमंड कंपनी को ठेके पर दिये थे.इनको काटकर खेल सामग्री बनाई जानी थी.पेड़ों को अपना भाई-बहन समझने वाले गांववासियों में इस खबर से हड़कंप मच गया. उसके बाद पेड़ों की रक्षा  के लिए प्रयास शुरू हुए. इनमें चंडी प्रसाद भट्ट, गोबिंद सिंह रावत, वासवानंद नौटियाल और हयात सिंह जैसे जागरूक लोग थे.

 

23 मार्च 1974 के दिन रैंणी गांव में कटान के आदेश के खिलाफ, गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन किया गया. इसी बीच सेना के लिए ली गई गांव की जमीन का मुआवजा देने की तारीख 26 मार्च 1974 तय की थी, जिसे लेने के लिए गांववालों को चमोली जाना था.दरअसल ये वन विभाग की चाल थी. वन विभाग ने सोचा कि 26 मार्च को चूंकि गांव के सभी मर्द गोपेश्वर  में रहेंगे और समाजिक कायकर्ताओं को वार्ता के बहाने बुला लिया जाएगा. इसी दौरान ठेकेदारों से कहा जाएगा कि ‘वो मजदूरों को लेकर चुपचाप रैंणी पहुंचें और कटाई शुरू कर दें.’प्रशासनिक अधिकारियों की शह पाकर  वन काटने वाले ठेकेदार, मजदूरों के साथ, जंगलों को काटने निकल पड़े लेकिन उनकी इस हरकत की भनक गौरा देवी को लग गई.

 

उस समय, गांव में मौजूद 21 महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर, वो भी जंगल की ओर चल पड़ी. देखते ही देखते महिलाएं, मजदूरों के झुंड के पास पहुंच गईं, उस समय मजदूर अपने लिए खाना बना रहे थे. गौरा देवी ने उनसे कहा, ‘भाइयों, यो जंगल हमारा मायका है, इससे हमें जड़ी-बूटी, सब्जी-फल और लकड़ी मिलती है. जंगल को काटोगे तो बाढ़ आएगी, हमारे बगड़ बह जाएंगे, आप लोग खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो, जब हमारे मर्द लौटकर आ जाएंगे तो फैसला होगा. इस अप्रत्याशित घटना से वन विभाग के कर्मचारी और ठेकेदार हिंसा पर उतारू हो गए. गौर देवी के नेतृत्व में आई महिलाओं को धमकाया, यहां तक कि ठेकेदार ने बंदूक निकालकर गोली मारने की धमकी दी. गौरा देवी ने अपनी छाती तानकर गरजते हुए कहा, ‘लो मारो गोली और काट लो हमारा मायका’, इस पर सारे मजदूर सहम गए. गौरा देवी के इस अदम्य साहस और आह्वान पर सभी महिलाएं पेड़ों से चिपक कर खड़ी हो गईं और उन्होंने कहा, ‘इन पेड़ों के साथ हमें भी काट डालो.’देखते ही देखते, जंगल के सभी मार्ग पर महिलाएं तैनात हो गईं. आखिरकार थक-हारकर मजदूरों को लौटना पड़ा और इन महिलाओं का मायका बच गया.अगले दिन खबर जिलाधिकारी  चमोली तक पहुंची साथ ही सभी अख़बारों ने इसे प्रमुखता से छापा और सारे देश का ध्यान इस अनोखे आन्दोलन की ओर आकर्षित हो गया. चिपको आन्दोलन  की खबर पाकर अगले दिन से आसपास के एक दर्जन से अधिक गांवों के सभी पुरुष बड़ी संख्या में वहां पहुंचने लगे. अब यह एक जन-आंदोलन बन गया. बारी-बारी से एक-एक गांव पेड़ों की चौकसी करने लगा. दूर-दराज के गांवो में चिपको का संदेश पहुँचाने के लिए विभिन्न पद्घतियों का सहारा लिया गया जिनमे प्रमुख थे पदयात्राएँ, लोकगीत तथा कहानियाँ आदि.लोकगायकों ने उत्तेजित करने वाले गीत गाये.मामले की गंभीरता को समझते हुए सरकार ने डॉ. वीरेंद्र कुमार की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की. जांच में पाया गया कि रैंणी के जंगलों के साथ ही अलकनंदा में बाईं ओर मिलने वाली समस्त नदियों, ऋषि गंगा, पाताल गंगा, गरुड़ गंगा, विरही और नंदाकिनी के जल ग्रहण क्षेत्रों और कुंवारी पर्वत के जंगलों की सुरक्षा पर्यावरणीय दृष्टि से बहुत आवश्यक है.इस आन्दोलन से गौरा देवी विश्व प्रसिद्ध हो गईं उन्हें आज भी चिपको वुमन नाम से जाना जाता है.चिपको आंदोलन कई मामलों में सफल रहा.यह उहिमालय में 1000 मीटर से अधिक की ऊँचाई पर पेड़-पौधों की कटाई, पश्चिमी घाट और विंध्य में जंगलों की सफाई (क्लियर फेंलिंग) पर प्रतिबंध लगवाने में सफल रहा.

 

आज फिर विकास के नाम पर पेड़ धड़ाधड़ कट रहे हैं। शहरों की बात की जाए तो दिल्ली में जो ज़हरीली हवा चल रही है। उसका असर आज अस्थाई राजधानी देहरादून में भी देखने को मिलता है। लिहाज़ा सरकारों को सचेत हो जाना चाहिए। आपको और हमको जागरुक हो जाना चाहिए।

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