उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों को कोर्ट के आदेश का भी कोई भय नहीं है। दरअसल मामला सरकारी आवास का किराया जमा करने को लेकर है। लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी इसे नज़रअंदाज़ क्यों किया जा रहा है ? आपको बता दें की पूर्व मुख्यमन्त्री रमेश पोखरियाल निशंक और विजय बहुगुणा ने तो कोर्ट के आदेश के बाद किराया जमा कर दिया था लेकिन एनडी तिवारी, भगत सिंह कोश्यारी और बीसी खंडूड़ी ने किराए के रूप में बकाया रक़म जमा नहीं की है.

हैरानी यह है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भी इनके आगे सरेंडर कर दिया था यह हलफनामा कांग्रेस शासनकाल में ही कोर्ट में दाखिल कर दिया गया था. अब सवाल ये है की आख़िर इस रक़म को देने में दिक्कत क्या है ?

आपको बता दें की आज की तारीख में सभी पूर्व सीएम ने सरकारी आवासों को ख़ाली किया हुआ है और ये सरकारी आवास भी तब ख़ाली हुए जब समाजसेवियों ने न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था तब जाकर आदेश के बाद पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास ख़ाली करने पड़े थे। डबल इंजन की सरकार के मुखिया स्वयं कहते हैं की राज्य 45 हज़ार करोड़ के क़र्ज में डूबा है, पर अफ़सोस जो क़र्ज राज्य सरकारों को वसूलना है उसे वसूलने में न जाने किस बात की शर्म। यहां पर बात हम तमाम सरकारी विभागों की कर रहे हैं। खासकर यूपीसीएल की जिसने सरकारी विभागों से बिजली का करोड़ों बकाया लेना है। पर लेने को तैयार नहीं। फिलहाल सरकार को स्वयं से शुरूआत करनी होगी। पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास का कर्ज तो मात्र तिल भर है मगर कर्ज चुका कर ये पूर्व मुख्यमंत्री मिशाल पेश कर आगे का रास्ता सबको दिखा सकते हैं।

 

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