एक साल बाद भी चुनौतियाँ त्रिवेन्द्र के लिए जस की तस !

देहरादून। त्रिवेंद्र सरकार ने 18 मार्च को अपना एक साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है और इस दौरान उन्होंने अपने मंत्रिमंडल और विधायक साथियों के साथ सरकार के एक साल का लेखा –जोखा जनता के बीच रखा.अपने एक साल के कार्यकाल को लेकर सरकार बहुत उत्साहित दिखी । अगर सरकार के एक साल के इस सफ़र को देखे तो राज्य इस दौरान अच्छे और बुरे दोनों अनुभवों से गुजरा है.इस एक साल के दौरान कई ऐसी बात हैं जहां सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है लेकिन इसके अलावा कई ऐसी चीज भी हुई जिसने सरकार की छवि को धुंधला किया है. अगर शुरुवात के बात करें तो  उत्तराखंड में विधानसभा की70 सीटों के लिए चुनाव 15 फरवरी 2017 को हुए थे। कांग्रेस को यकीन था सत्ता वापसी का और बीजेपी को यकीन था मोदी लहर के कमाल का। कमाल हुआ भी जहां कांग्रेस को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा वहीं बीजेपी ने प्रचंड बहुमत यानि की 57 सीट लाकर सत्ता के स्वाद को चखते हुए इस सीट पर काबिज़ हुई .बीजेपी को जीत का यकीन था लेकिन इतने बड़े अंतर से ये वो ख़ुद नहीं जानती थी .कहीं न कहीं ये मोदी लहर और अमित शाह की रणनीति का ही कमाल था कि बीजेपी की बल्ले बल्ले हो गयी . बीजेपी 57 के साथ शीर्ष पर थी तो कांग्रेस 11 पर आकर सिमट गयी ख़ुद तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को अपनी दोनों सीट को गवाना पड़ा.

अब सरकार बनने के बाद से लेकर अभी तक मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार के एक वर्ष पर गौर फरमायें तो इस दौरान सरकार को कई कड़े अनुभवों से गुजरना पड़ा.इसी एक साल में पहली बार किसी किसान ने आत्महत्या की.शायद उत्तराखंड के इतिहास में पहली बार किसी किसान ने बैंक का लोन न चुका पाने की वजह से मौत को गले लगा लिया, जिसके बाद विपक्ष ने सरकार पर जमकर हमला किया और सरकार को आड़े हाथों लेने का काम किया और लेते भी क्यों नहीं उसके लिए तो वह काफी दिनों से इंतजार जो कर रहे थे तो उस मौके को जाने भी कैसे देते। इस कड़ी में सबसे पहले पिथौरागढ़ जिले के किसान से आत्महत्या का रास्ता चुना। वहीं एक ट्रांसपोर्टर की खुदकुशी ने एक बार फिर सरकार की खूब किरकिरी कराई । हैरानी की बात तो ये है कि त्रिवेंद्र सरकार के इस एक साल के दौरान  6 जनवरी को बीजेपी कार्यालय में चल रहे कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के जनता दरबार में ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडे ने आत्महत्या करने का प्रयास किया, जिसके बाद 9 जनवरी को उसकी मौत हो गई,फिर क्या था त्रिवेंद्र सरकार एकबार फिर चारों तरफ से घिर गई और विपक्ष को भी एकबार फिर सरकार को आड़े हाथों लेने का एक मौका मिल गया, जिसका उन्होंने जमकर फायदा उठाया। इसके अलावा सरकार ने इस एक साल में सबसे ज्यादा पैसा अपने लिए हेलीकॉप्टर में घुमने और चाय पानी के खर्च में लगा दिए चाहे बात मुख्यमंत्रीत्रिवेंद्र रावत के हेलीकॉप्टर में घूमने का एक साल का खर्च हो या फिर सीएम आवास पर चाय-पानी में लाखों उड़ा देने की बात हो दोनों ही मामलों में विपक्ष के निशाने पर त्रिवेंद्र सरकार रही। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री बनने के बाद दस महीने की अवधि में मेहमानों की आवभगत पर 68.59 लाख रुपए से ज़्यादा खर्च कर दिए।

इसके साथ ही एक और मामले में सरकार सालभर घिरी रही गैरसैंण सत्र के खर्चे को लेकर सामने आए आंकड़ों से ये साफ हो गया है कि प्रचंड बहुमत की त्रिवेंद्र सरकार बेहद खर्चीली है। इससे एक बात तो स्पष्ट है कि पहाड़ पर विकास का तो पता नहीं लेकिन नेताओं की तो बल्ले-बल्ले है।गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने को लेकर भी पहाड़ के लोगों में सरकार के प्रति गुस्सा है। पिछले काफी समय से आंदोलनकारी इसको लेकर अनशन करे रहे हैं लेकिन अभी त्रिवेंद्र सरकार की तरफ से कोई फैसला नहीं आया है

वहीं अगर कुछ अच्छा है तो वो इस दौरान सूबे को 481 नए डॉक्टरों की नियुक्ती,35 अस्पतालों में टेलीएडोयोलॉजी की शुरुआत की तैयारी,108 जीवीके एमआरआई के लिए 111 एंबुलेंस की सौगात की बात हो,सरकार के लिए जनता के बीच कहने के लिए कुछ तो अच्छा है.इसके अलावा राज्य में पहले कचरा प्रबंधन संयंत्र की शुरुआत, देहरादून के शिशंबर में हुई, स्मार्ट सिटी की लिस्ट में राज्य की राजधानी का समावेश होना भी सरकार के कामों से जनता को राहत देती है. पिछले कुछ दशकों से कन्डी सड़क परियोजना का सक्रियण किया गया है- जो गढ़वाल और कुमाऊं के बीच यात्रा का समय कम कर देगा ये भी सरकार के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है. इसके अलावा पांच नए ईको-टूरिस्म सर्किट शुरु किए गए, जंगली जानवरों के हमले से मरने वाले लोगों के लिए मुआवज़ा राशि 3 लाख रुपये से 5 लाख तक की गयी, कोटद्वार में कॉरबेट बाघों के लिए दो नए रिजर्व लैंसडाउन और कोल्हाचौर में खोले गए. शिक्षा की बात करें तो  कई कॉलेजो में प्रधानाचार्यों की नियुक्ति,900 प्रोफेसरों के लिए संरक्षण प्रक्रिया शुरु हुई,सुपर 100 और सुपर 30 कोचिंग आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए शुरू किया गया,कॉलेजों में शिक्षकों के लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति और निजी स्कूलों के लिए शुल्क विनियमन अधिनियम प्राप्त करने की प्रक्रिया भी शुरू हुई.इसके अलावा सबसे बड़ी बात जो सरकार के साथ जुडी वो है जीरो टोलरेंस की नीति,सरकार बनने से एक साल के दौरान सी एम खुल कर जीरो टोलरेंस की बात करती रही जो काफी हद तक सूबे में दिखायी भी दी.

सफ़र लंबा है अभी और चार साल सरकार को चलाना है,त्रिवेन्द्र सरकार को इस एक साल को पीछे भूलते  हुए आगे के लिए विज़न और मिशन पर काम करना पड़ेगा ताकि आने वाले और सालों में वो जनता के बीच ज्यादा से ज्यादा उपलब्धियों के साथ अपने इस पद के साथ न्याय कर सके.इसके साथ ही पुरे चार साल तक पर लगाम लगाना युवाओं को रोजगार दिलाना,स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना भू-अभिलेखों को पूरी तरह डिजिटल बनाना ,शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारना और पलायन को रोकना सबसे बड़ी चुनौती होगी इसके अलावा राज्य  के राजस्व में कैसे वृद्धि हो,हडताली प्रदेश का टेग कैसे हठे ,ये तमाम चुनौतियां हैं

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