देहरादून(पं.चंद्रबल्लभ फोंदणी )- देहरादून के दून अस्पताल में इलाज की
उम्मीद से आए धामपुर के एक गरीब परिवार के मृतक को जब  स्ट्रेचर  एंबुलेंस और शव वाहन नहीं मिला तो दर-दर की ठोकर खाने और कई जगह गिड़गिड़ाने के बाद मृतक के भाई ने अपने दम तोड़ चुके भाई का शव अपने कांधे पर ही उठा लिया।
अस्पताल के भीतर किसी का दिल नहीं पसीजा लेकिन अस्पताल से बाहर उन किन्नरों का दिल पसीज गया जिन्हें हमारा समाज हिकारत से देखता है। उन्होंने मदद की और चंदा कर शव को धामपुर पहुंचाया।
लेकिन दून अस्पताल में कांधे पर उठाने की मजबूरी जब अस्पताल की चाहरदीवारी से बाहर आई और मीडिया में पहुंची तो सरकार की जमकर छीछालेदर हुई। सोशल मीडिया में  तो सरकार बहादुर को खूब लानत भेजी जा रही हैं।
लेकिन न तो सरकार को पता था न मृतक के परिजनों और न ही सरकार की मज्जमत करने वालों को कि कांधे में भाई की लाश ढ़ोने वाला अभागा पंकज ही मजबूर नहीं था बल्कि दून अस्पताल भी लाचार था। कहीं नियमो की बेडियां थी तो कहीं सरकारी सिस्टम की जटिलता। दरअसल सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में वो शव वाहन नहीं था जो चैरटी के अस्पतालों में आसानी से मिल जाता है।
अब तक ऐसी हृदयविदारक घटनाएं उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार,झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्यों से सामने आती थी। लेकिन गुरूवार की घटना ने उत्तराखंड जैसे राज्य की इमेज को भी धूमिल कर दिया।
हालांकि अब सरकार  ने मामले को संज्ञान में ले लिया है और महकमे के पेंच भी कसे हैं। अब आनन-फानन में सूबे के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने मीडिया में आ रही अपने अधीन चल रहे स्वास्थ्य महकमे की लाचार हालत देखी तो खबर को संज्ञान में लेते हुए महकमें के अधिकारियों पर नजरें तिरछी की।
इसका असर ये हुआ कि सूबे के सचिव स्वास्थ्य ने चिकित्सा अधीक्षक का जवाब तलब किया। अधीक्षक साहब ने गले में बंध रही घंटी को देखते हुए तमाम तरह की सफाई भी दी और दून अस्पताल की लाचारी का भी जिक्र किया।
लेकिन इस बीच उन्होंने दून अस्पताल की उस हकीकत को भी बेनकाब किया जिसे सुनकर मुखिया के पैरों तले जमीन खिसक गई होगी। जी हां यकीन मानिए दून अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक ने स्वास्थ्य सचिव को बताया कि दून अस्पताल में शव वाहन ही नहीं हैं।
जी हां, यकीन मानिए स्वास्थ्य सचिव को चिकित्सा अधीक्षक ने बताया कि दून अस्पताल में शव वाहन नहीं है। कितनी गजब की बात है राज्य में पांच लोकसभा सांसद हैं। तीन राज्य सभा सांसद हैं। जबकि अकेले देहरादून के शहरी क्षेत्र की बात की जाए तो धर्मपुर, कैंट और राजपुर जैसे विधानसभा क्षेत्रों को विधायक भी हैं।
इतना ही नहीं दर्जनो धर्मार्थ के नाम पर गाहे-बगाहे लाखों का भंडारा खिलाने वाली धार्मिक संस्थाएं भी हैं। खैरात बांटने वाले कई अमीर भी हैं। जबकि कई ऐसी सरकारी और निजी संस्थान भी हैं जिनका करोड़ों का सीआरएस फंड भी है।
यहां तक कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन लेने वाला दून अस्पताल का बड़ा स्टॉफ भी है  बावजूद इसके देहरादून के सबसे बड़े चिकित्सालय में शव वाहन नहीं है।
शव वाहन जैसे अहम वाहन की कमी डबल इंजन की सरकार के दौर में उस महकमें के लिए शर्मिंदगी की बात नहीं है जिसकी कमान खुद राज्य के मुखिया के हाथों में हो। जिसकी देखरेख के लिए बाकायदा एक सलाहकार भी तैनात किया गया हो। कई बार दून अस्पताल का मौका मुआयना भी किया गया हो। तब भी पता नहीं चला की अस्पताल में शव वाहन नहीं  है।
सोचिए कितनी लापरवाह है सरकारी व्यवस्था और कैसे ‘यस सर’ कहकर अधिकारी सरकार को गुमराह कर देते हैं।
एक नजर उस जवाब पर भी जो स्वास्थ्य सचिव को चिकित्सा अधिक्षक ने दिया और राज्य के सूचना विभाग ने उसके जरिए अपने फेसबुक पेज को अपडेट किया ताकि सरकार बहादुर उसकी पीठ थपथपा दे।

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