देवीधुरा बग्वाल कि आज खबर नही पढ़ी तो आपने कुछ नही पढ़ा

आज हम आपको देवीधुरा में बग्वाल के मेले की ख़बर बता रहे है जहाँ रविवार को फलों के साथ बरसे पत्थर ओर क्यो बरसाए जाते है पत्थर आपको ये सब बोलता उत्तराखंड़ मे आपको बताउगा
आपको बता दू की रक्षाबंधन के पर्व पर देवीधुरा में इस साल भी फलों से बग्वाल खेली गर्इ ओर उत्साह देखिए बारिश होने के बावजूद खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान रणबांकुरों से खचाखच भरा हुआ नजर आया। इस युद्ध का लुत्फ उठाने के लिए देश-विदेश से भी लोग यहां पहुंचे। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था के लिए भारी संख्या में पुलिस व पीएसी के जवानों की तैनात थी।
रविवार को रक्षा बंधन पर्व पर देवीधुरा स्थित मांं बाराही देवी के आंगन खोलीखाड़ दुबाचौड़ में असाड़ी कौतिक पर झमाझम बारिश के बीच चारों खामों के रणबांकुरों ने बग्वाल पूरे जोश के साथ खेला। इस दौरान उन्होंने एक दूसरे पर जमकर फल और फूल बरसाए। हालांकि, कुछ लोगों ने पत्थरों का भी इस्तेमाल किया जिससे चार दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए। बग्वाल देखने के लिए केंद्रीय कपड़ा मंत्री अजय टम्टा व राज्य मंत्री धन सिंह रावत भी पहुंचे थे।  
बग्वाल देखने के लिए चंंपावत ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों के तमाम लोग पहुंचे। दोपहर करीब सवा डेढ़ बजे से रणबांकुरे खोलीखांड़ दुबाचौड़ मैदान में जुटना शुरू हो गए। सबसे पहले चम्याल खाम गंगा सिंह चम्याल के नेतृत्व में मैदान में पहुंचे। इसके बाद बालिग खाम, लमगड़िया खम व गहरवाल खाम के वीर मैदान में पहुंचे। सभी ने मां बाराही के जयकारों के साथ मंदिर व मैदान की परिक्रमा की। बग्वाल खेलने वालों के साथ ही मेला देख रहे लोग भी रोमांच से सराबोर दिखे। 

आपको बता दे कि बगवाल 2:38 पर शुरू हुई और 2:46 पर समाप्त हुई। इस दौरान आसमान में फल व पत्थर ही दिखाई दे रहे थे। इस दौरान हुए रणबांकुरों को मंदिर परिसर में बने चिकित्सा कक्ष में सीएमओ डा. आरपी खंडूरी के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग की टीम ने उपचार किया। मेले के दौरान देवीधुरा की सड़कों में पांव रखने को जगह नहीं थी। हालांकि इस बार बारिश के कारण भीड़ कर रही। यातायात व्यवस्था बनाने के लिए पुलिस ने करीब आधा किमी पहले ही वाहन रोक दिए थे। कानून व्यवस्था के लिए जिले भर की पुलिस लगाई गई थी। 
बोलता उत्तराखंड आपको बता रहा है कि क्या है देवीधुरा बग्वाल मेला
आपको बता दू कि बग्वाल युद्ध चार राजपूत खामों यानी वर्गों से जुड़ा हुआ है। जिसे अपने-अपने खामों के रणबांकुरों के साथ खेला जाता है। इन राजपूत खामों के नाम हैं गहरवाल, लमगड़िया, वलकिया और चम्याल। यह युद्ध पूर्णमासी के दिन खेला जाता है। यह मेला अपने पत्थरमार युद्ध के लिए प्रसिद्ध है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बग्वाल’ कहा जाता है। पहले यह युद्ध सिर्फ पत्थरों से खेला जाता था, लेकिन बदलते वक्त के साथ इसे खेलने की प्रक्रिया में भी थोड़ा सा बदलाव हुआ है। अब पत्थरों की जगह फलों का इस्तेमाल किया जाने लगा है।

बग्वाल खेलने के लिए पहले से ही नाशपाती फल का भंडारण कर लिया गया। जिन्हें रविवार को बग्वाल के समय रणबांकुरों को बांटा गया। इसी नाशपाती से रणबांकुरों ने एक दूसरे के साथ युद्ध कर इस परंपरा को कायम रखा। 

आपको बता दे कि सदियों से चला आ रहा देवीधुरा का पत्थर युद्ध अब इतिहास बन गया है। 2013 से यहां बग्वाल पत्थरों के बजाय फलों से खेली जा रही है। इस बार भी इसी परंपरा को कायम रखा गया। फलों की बग्वाल को लेकर भी पहले वर्ष काफी आकर्षण देखा गया था। पत्थरों से खेली जाने वाली बग्वाल को देखने के लिए लाखों की संख्या में लोग कौतूहलवश देवीधुरा पहुंचते थे।

आपको बता दे कि पौराणिक कथाओं में ऐसी मान्यता है कि पहले मां काली के गणों को खुश करने के लिए यहां नरबलि की प्रथा थी। लेकिन जब एक बुजुर्ग के पोते की बारी आर्इ तो उसे बचाने के लिए बुजुर्ग महिला ने मां की प्रार्थना की। उसकी आराधना से खुश होकर उन्होंने उनके पोते को जीवन दान दिया। साथ में ये भी कहा कि उन्हें एक व्यक्ति के बराबर खून चढ़ाया जाए। तभी से पत्थरमार युद्ध कर मां को खून चढ़ाकर प्रसन्न किया जाता रहा।
देवीधुरा में चल रहे आषाढ़ी कौतिक के चौथे दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मां ब्रज बाराही मंदिर में पूजा अर्चना कर मन्नतें मांगी। आदि गुफा में स्थित मां के गर्भगृह के दर्शनों के लिए दिन भर आते रहे। कई लोगों ने विशेष पूजा अर्चना संपन्न करवाई। मां बाराही संस्कृत महाविद्यालय देवीधुरा के छात्रों ने वेद पाठ व दुर्गा पाठ का वाचन किया। गहड़वाल खाम के प्रमुख त्रिलोक सिंह बिष्ट, चम्याल खाम के गंगा सिंह चम्याल, बालिक खाम के बद्री सिंह बिष्ट, लमगड़िया खाम के प्रमुख वीरेंद्र लमगड़िया के अलावा मंदिर के पीठाचार्य भुवन चंद्र जोशी, कीर्ति बल्लभ शास्त्री ने भी पूजा अर्चना संपन्न करवाई
इस दौरान शनिवार की सुबह से ही मौसम बदलते मिजाज से क्षेत्र में भारी बारिश के चलते व्यापारियों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। यहां नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, टनकपुर, खटीमा, बनबसा, पीलीभीत आदि स्थानों से व्यापारी दुकान लेकर आए हुए हैं। बहराल धन्य हो हमारे पहाड़ के लोग जिन्होंने अपनी पौराणिक विरासत सस्कृति को संजोय रखा है। और समय अनुसार जो बदलाव होने होते है उनमें भी सबकी सहमति होती है

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