देवप्रयाग के शराब बॉटलिंग प्लांट पर जमकर  शोर है ,

सुनो उत्तराखंड अब हमारे देवभूमि में अलकनंदा व भागीरथी के संगम स्थल देवप्रयाग क्षेत्र मैं शराब की बॉटलिंग प्लांट के मामले को लेकर सियासत परवान चढ़ चुकी है ओर लगातार सोशल मीडिया , फेसबुक में इस बॉटलिंग प्लांट के देवप्रयाग क्षेत्र मैं दिए गए पते और ब्रांड के नाम लेकर कई पोस्ट धड़ा धड़ खूब वायरल हो रही हैं। वही लगातार सोशल मीडिया में आने के बाद ही देवप्रयाग क्षेत्र मे शराब बॉटलिंग प्लांट की जानकारी सबके सामने खुल कर आ चुकी है अब इस मामले ने इस कदर तूल पकड़ लिया है कि नेता जल्दी से अपने बयान देना नही चाहते है। और राजनीतिक पार्टियां बिना रणनीति के कुछ बोलने को तैयार नही।


आज कल सोशल मीडिया में शराब के एक नए ब्रांड का नाम व इसके बॉटलिंग प्लांट का पता तेजी से वायरल हुआ। इस प्लांट का पता देवप्रयाग के ददुवा गांव का दिया गया है। ओर इसे सीधे देवभूमि व इसकी मान्यताओं से जोड़कर उत्तराखंड सरकार पर निशाना साधा जा रहा है ये भी कहा जा रहा है कि अब अलकनंदा व भागीरथी के संगम स्थल पर, जहां पवित्र गंगाजल मिलता है, वहीं अब शराब की बॉटलिंग की जा रही है। ओर इससे देवभूमि की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इससे अब उत्तराखंड का आबकारी महकमा भी परेशान है और हलचल तेज़ है।


को जानकारी निकल कर आई है उसके अनुसार ख़बर ये है कि देवभूमि में शराब की बॉटलिंग करने के लिए 24 दिसंबर 2012 को तत्कालीन विजय बहुगुणा सरकार में नीति बनाई गई। ओर इसमें यह प्रावधान किया गया था कि जो भी शराब कंपनी यह प्लांट स्थापित करना चाहेगी, वह बाजार में पांच वर्ष पूर्व आ चुकी होनी चाहिए। उस कंपनी के ब्रांड की कम से कम तीन राज्यों में बिक्री हो रही हो और पिछले तीन वर्षो में उसका उत्पादन कम से कम दो लाख पेटी प्रतिवर्ष हो। बताया गया है कि ये सब इसलिए कि इससे बाजार में पहले से ही प्रचलित ब्रांड ही बॉटलिंग प्लांट लगा सकेंगे। साथ ही इनकी गुणवत्ता की पहले ही परख हो चुकी होगी। मगर फिर ख़बर आई के साल 2016 में तत्कालीन हरीश रावत सरकार ने इन नियमों में ओर संशोधन कर दिया । ओर पहला संशोधन 17 अक्टूबर 2016 को लाया गया। इसमें पांच वर्ष पुरानी कंपनी, तीन राज्यों में ब्रांड की बिक्री और दो लाख पेटी प्रतिवर्ष के उत्पादन की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया । वही इसके बाद 23 नवंबर 2016 को एक और संशोधन लाया गया। इसमें सीधे शराब बनाने वाली कंपनी को भी आवेदन करने की छूट दे दी गई। अब इसके अलावा इन बॉटलिंग प्लांट में कंपनी को अपने ब्रांड के साथ ही अन्य कंपनियों के ब्रांड भरने की भी छूट दी गई।

उस दौरान ख़बर है कि कैबिनेट में लिए गए इन दोनो निर्णयों पर हंगामा भी हुआ तो उस समय यह तर्क दिया कि यहां गंगाजल की बॉटलिंग व पैकेजिंग की जाएगी और इससे स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिलेगा। हालांकि, मौजूदा समय में परिस्थितियां अब काफी अलग नजर आ रही हैं। ओर यहां शराब के एक नए ब्रांड की बॉटलिंग की जा रही है। अब इस पूरे प्रकरण पर सियासत गरमा गई है। बता दे कि ‘यह पूरा प्रोजेक्ट पिछली कांग्रेस सरकार के समय ही तय हो गया था।
बहराल पिछली सरकार के कहीं कामो को योजनाओं को त्रिवेंद्र सरकार बंद कर चुकी हैं इस बात का हरीश रावत अक्सर कहते रहते है। लेकिन सवाल ये है कि अगर सरकार ये कहती है कि देवप्रयाग मैं दारू की फेक्ट्री ठीक है इसमें गलत कुछ नही ओर अपने तर्क जो भी रखेगी तो कही सवाल खड़े होंगे। उन सबके लिए जो पिछली हरीश सरकार डेनिस पर कोसती थी वो सभी भाजपा वाले।
साधु संतों ने भी विरोध जताना आरम्भ कर दिया है।
विपक्ष सरकार को लपेटने के लिए रणनीति बना चुका है।
ओर सोशल मीडिया मैं जगह जगह शोर है हिलटॉप का।
बाकी आगे क्या होगा। ये भी आपको बतायेगे।
बस अभी तो हम ये जानते है कि जो पहाड़ धीरे धीरे नशे की चपेट मैं जकड़ता जा रहा है वहा ओर देवप्रयाग जैसी महत्वपूर्ण स्थान मैं दारू बनेगी ओर ये जवाब दिया जाएगा।कि आपके बच्चों को रोजगार मिलेगा।
आपके फल फूल का भी प्रयोग होगा तो फिर हरीश सरकार और डबल इंजन सरकार मैं इस मुद्दे पर फर्क क्या ??
अगर आज कि सरकार देवप्रयाग मैं इस प्लांट सन्तुष्ट है तो फिर तो रोजगार के नाम पर हमारे फल फूल के नाम पर इस प्रकार के प्लांट क्यो नही देवप्रयाग से आगे
रुद्रप्रयाग , कर्णप्रयाग, टिहरी झील के पास , उत्तरकाशी के पास, गढ़वाल के द्वारा कोटद्वार , सुंदर रानीखेत या फिर अल्मोड़ा तक इस प्रकार की दारू बनाने की फैक्ट्री ओर लगनी चाइए भाई रोजगार की बात है और आपके फल और फूल की।
कड़वा सच
है भगवान पता नही कोंन सी सरकारे नशे के खिलाफ रहती है और कौन नशे के साथ!
बस हमने तो जब भी नेताओ को मच पर कहते सुना तो यही की नशा खराब है छोड़ दो , इस संगत की तरफ मत जाना,
देव भूमि को उड़ता पंजाब नही बनने दिया जाएगा।



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