दरबार बी फर्जी, दरबारी बी फर्जी ,हमरु राज हमरी मर्जी

दरबार बी फर्जी,
दरबारी बी फर्जी
हमरू राज, हमरी मर्जी
ये दरबार मां …..
ना चाणक्य, न बीरबल,
न विवेक, न बुद्धिबल,
न संस्कार, न शुद्धिबल
अपणा अपणा ऊंचणा लेकी जाणा छन
कै पर मजबूरी की घात लगीं,
कखी कानूनी दांव पेंच उबड़णा छन।
कखी पढै लिखै हन्त्या आणी,
बेरोजगारी, विकास कू सतनजू धैरयूं च।
ढोल, दमौ बाजा धरेणा छन।
पलायन बी किलकुणू च।
बचपन बी डौरौ उसकुणू च,
जिम्मेदार खिसकुणू च।
चिट्ठी पत्रियों का अट्योड़ लग्यान,
पर पैली भै, चमचौं की अर्जी
दरबार बी फर्जी
दरबारी बी फर्जी
हमरू राज, हमरी मर्जी
कपडा नाप लेणा छन,
अर पैराणा छन टोफली,
खबरदार हल्ला ना कैरी,
देख ली पुलिस कू पहरा,
हमी सौकार, हमी दर्जी
दरबार बी फर्जी
दरबारी बी फर्जी
हमरू राज, हमरी मर्जी
गीता-रामायण धैंरीं च,
बचणा छन अर्थशास्त्र,
बसगई लगला सी भिटकणा छन
लोगों की भावना सन ठंकरी बणाणा छन
भिटक भिटकी कुड़ी बी चुंगाणा छन
झूटा फिटा रौला बौला बगेकी
पुंगडी बी बंझांणा छन
कैरा विरोध कथगा कैर सकदा
भाजे भाई नी आलू ,
त कांगे भाई आलू
हम बी दरबार लगांदां
वी बी दरबार लगालू।
हम कटकताव मल्ला, ऊ पुयालू।
हे लोला, न पक्ष रालू, न विपक्ष रालू,
त सरकार कू बणालू,
यही त मजबूरी च लाटा,
कबरी मी रालू, कबरी ऊ रालू,
फंड फूक नी हुआलू त खीचड़ी बणालू।
त्याग तपस्या हम कैर नी सकदा,
माधो सिंह भण्डारी कनु मां बण सकदा।
दूध बी फूक्कू मारी मारी प्यदां
वीर चन्द्र सिंह गढवाली कनू मां बण सकदां।
पर ध्यान राखी
हमरू राज, हमरी मर्जी
दरबार बी फर्जी
दरबारी बी फर्जी
हमरू राज, हमरी मर्जी

 

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