है बाबा केदारनाथ जी क्या आपको भी लेज़र शो पसंद आया ?? सतपाल महाराज जी आपने देखा था ये लेज़र शो ?? जिन्होंने देखा अब उनकी सुनो सरकार

हमारे आराध्य , “बाबा केदारनाथ” का मंदिर क्यों बना दिया , गलतियों की भरमार ,”गुजरात मॉडल” की एनिमेशन फ़िल्म का परदा ?

28 अप्रैल की शाम। पैदल मार्ग से केदारनाथ पंहुचे , तो तीर्थ पुरोहितों से लेकर केदारपुरी के निवासियों को 3-4 दिनों से ट्रायल पर चल रहे, लेज़र शो को लेकर बहुत आपत्तियां थी । उन्हें लग रहा था कि उनके अराध्य उनके जीवन के आधार बाबा केदार की उनके मन में अंकित छवि से अलग रूप में प्रदर्षित कर रहे है, धाम की मर्यादा को कलुषित किया जा रहा है , मंदिर और उसकी परंपराओं के साथ छेड़-छाड़ की जा रही है । साथ ही उनको कष्ठ था कि केदारनाथ आपदा के बाद केदारनाथ धाम र् उसके आस- पास हुए पुनर्निर्माण का पूरा श्रेय माननीय प्रधानमंत्री मोदी साहब और 1 साल से मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र रावत को देते हुए लगभग 5 मिनट के विज्ञापन भी इस शो का हिस्सा बनाया गया है। इस कान – फोड़ू कथित लेज़र फ़िल्म के प्रदर्शन के लिए पर्दे के रूप में श्री केदारनाथ जी के मंदिर की दीवार को बनाने से उन्हें बहुत कष्ठ था। मंदिर परिसर में अनेक स्थानों पर भीमकाय राक्षस की तरह काले तिरपालों में स्पीकर और लाइट से संबंधित यंत्र रखे थे।
रात्रि 7 बजे हमें भी शो में बुलाया गया।
हम भी उत्सुक थे लेज़र शो क्या होता है , देखने के लिए।
पर मैंने और श्री गणेश गोदियाल जी, पूर्व विधायक, श्रीनगर विधानसभा और अध्यक्ष, श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ओर तीर्थ पुरोहित पंचायत के पदाधिकारियों ने राजनीतिक लोगों के विज्ञापन को मंदिर की दीवार पर दिखाने पर शो का बहिष्कार और विरोध की चेतावनी दी , तो आयोजकों (गुजरात से आये कोई सुहाग मोदी जी ) ने उस हिस्से को हटाने का आश्वासन दिया।
शो शुरू हुआ तो पता चला कि वह गलतियों के भरमार
वाली बेहद घटिया दर्जे की लाइट एंड साउंड प्रोग्राम वाली प्रस्तुति है।
आधा हिस्सा गलतियों सहित उन कहानियों का था जिन्हें केदारनाथ और केदारघाटी ही नही उत्तराखंड का बच्चा-बच्चा जानता था। देश के धार्मिक लोग भी श्रुत परंपरा में पुराणों आदि के इन प्रसंगों को सुनते-सुनाते रहते हैं।
आधे हिस्से में भगवान का तांडव था। उस समय ऐसी भयंकर ध्वनि हो रही थी कि मानों कोई नई आपदा आ गयी हो ।
शो को लेकर हमारी 3 आपत्ति थी।
1-,ग़लत समय।
2-गलत स्थान ।
3- गलत सिद्धान्त।
गलत समय – शो की तैयारी कपाट खुलने से 4-5 दिन पहले से हो रही थी। कपाट बंद होते समय भगवान की “समाधि पूजा” होती है। याने इस पूजा के बाद भगवान 6 माह के शीत काल के लिए समाधि में चले जाते हैं। जिस दिन कपाट खुलते हैं उस दिन रावल जी और प्रधान पुजारी जी की पूजा के बाद ही कोई यात्री ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर सकता है। मान्यता है कि, कपाट बंद होने के काल में देवताओं के प्रतिनिधि के रूप में नारद भगवान की अर्चना करते हैं। कपाट बंद होने के बाद बाबा समाधि याने ध्यान की गहन अवस्था में विराजमान होते हैं। इस लिए कपाट खुलने से पहले केदारनाथ में अनावश्यक शोर और हस्तक्षेप पाप होता है।
पर कपाट खुलने से 5 दिनों से चल रहा। हजारों डेसिबल के शोर और तरह तरह की रोशनियों से हमें गहन आपत्ति है।
गलत स्थान –
इस शो के लिए पर्दे के रूप में केदारनाथ जी के मंदिर की दीवार को किया गया। जो अक्षम्य है।
गलत सिद्धान्त-
केदारनाथ में बाबा शान्त रूप में जगत कल्याण के लिए ध्यान या समाधि में हैं। बाबा को स्फटिक की भांति श्वेत रंग प्रिय है। जो शांति ओर ध्यान का प्रतीक है। वंहा बाबा के मंदिर को गुलाबी रंग जो काम व वासना का प्रतीक है के अलावा कही किस्म की रंगिनियो से सरोबार कर दिया।
परंपरा से केदारनाथ के रावल जी और पुजारी , दखिन भारत के, वीर शैव लिंगायत जंगम होते हैं। केदारनाथ के रावल जी वीर शैव लिंगायत जंगमों के “केदार जगत गुरु” होते हैं और इस पीठ को वैराग्य पीठ मानते हैं। पीठ के आचार्य और भक्तों के लिए कर्म ध्यान माना गया है। वर्तमान रावल श्री श्री श्री 1008 भीमाशंकर लिंग जी 324 वें रावल( संदर्भ श्री हरिकृष्ण रतूड़ी का गढ़वाल का इतिहास) हैं।
हम पहाड़ वासी जिस भी रूप में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जाते हैं, कभी ऊंची आवाज में भी बात नही करते।
ऐसे में डर कर कम्पायमान करने वाली डरावनी ध्वनियों के साथ रंगीन रोशनी में हुए तांडव ओर बाकी कार्यक्रम सिद्धांत, परंपरा और केदारनाथ की महिमा के विरुद्ध था।
सिद्धान्त और परंपरा के विपरीत कई गलतियां भी शो में थी , जिन पर गुणी-ज्ञानी , यात्री ओर भक्त हंसः रहे थे।

अब इस कथित शो की गुणवत्ता पर –
शो निहायत कमतर दर्जे की बच्चों की एनिमेशन फ़िल्म जैसी थी। जिसमें 10 अक्षम्य गलतियां थी। जिनमें से 2 –
1- पांडवों को दर्शन न देने के उद्देश्य से भगवान बैल के रूप में बैलों के झुंड में बैल के रूप में छुप गए थे। जबकि केदारनाथ का बच्चा बच्चा जनता है कि भगवान महिष याने भैंसे के रूप में भैंसों के झुंड में छिपे और पहचाने जाने पर केदार याने दलदली भूमि में धंस गए । भीम केवल पार्श्व भाग को पकड़ पाए। जो केदारनाथ जी में ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित है।
2- शो में बताया गया है कि, केदारनाथ जी के कपाट हर साल अक्षय तृतीया के दिन खुलते हैं। जबकि सत्य ये है कि कपाट खुलने का दिन शिवरात्रि के दिन ऊखीमठ में तय होता है। जो हर साल अलग दिन होता है।
बाकी 8 गलतियां समय आने पर बताएंगे।
कुछ आशंकाएं –
1- शो को बनाने वाली कंपनी के मालिक कोई गुजरात के सुहाग मोदी जी बताए जा रहे हैं। जिन्हें करोड़ों रुपए दिए गए हैं। किसने दिए ये सरकार साफ करे।
2- लॉजिस्टिक सपोर्ट जिसमे MI-17 द्वारा कही दिनों तक 30 टन समान ढोया गया , उत्तराखंड सरकार का था। सेना के ये हेलीकॉप्टर कठिन सैन्य अभियानों या अति आवश्यक महत्ता के अभियानों में प्रयोग होते हैं। ऐसे में गुजरात के सुहाग मोदी जी के व्यापारिक शो के लिए किसने अनुमति दी इनकी इसका अंदाज कोई भी लगा सकता है।
3- इस शो का संबंध संस्कृति , धर्मस्व व पर्यटन मंत्रालय से था। उसके मंत्री प्रसिद्ध धर्मगुरु सतपाल महाराज जी हैं। उन्होंने इस शो को यदि देखा और उसकी अक्षम्म गलतियों को नही पकड़ पाए ये आश्चर्य है। मेरा पूरा भरोसा है कि या तो उन्हें इस शो की दिखाया ही नही गया अथवा पार्टी अनुशासन के भय से कंपित माननीय मंत्री महाराज जी ओर काम के बोझ से दबे अधिकारियो को – “मोदी जी के प्रचार के लिए प्रायोजित गुजरात के सुहाग मोदी ” ,के चमत्कारी शो की गलतियों को बताने की हिम्मत नही हुई।
4- इस शो के प्रायोजक राष्ट्रीय अंत्योदय संघ, RSS से जुड़ा एक NGO है। धर्म के नाम पर दुनिया भर में कार्यक्रम करने वाले इस संघटन के कर्ता- धर्ता यदि हमारे बच्चों से कम ज्ञान रखते हैं या प्रचार करते हैं तो भगवान ही जाने दुनिया में किस हिंदुत्व को प्रचारित कर रहे होंगे।
आयोजकों ने उस दिन ही हमसे गलतियों को सुधार कर ही शो चलने का वादा किया था। पर अभी भी केदारनाथ में गलतियों के साथ इस शो को दिखा रहे हैं। उत्तराखंड के ब्राह्मण गुजरात सहित कही प्रदेशों में अपने पांडित्य, ज्ञान, कर्मकांड ओर ज्योतिष की धूम मचा रहे हैं।
ऐसे में अज्ञानी , मूर्ख ओर मूढ़ गुजराती सुहाग मोदी की ,” गलतियों के सागर ” वाली इस एनिमेशन फ़िल्म को दिखाने और उस पर पानी की तरह पैसा बहाने की सरकार की क्या मजबूरी है ये समझ में नही आता।
हम सब जानते हैं कि, हर यात्री केदारनाथ यात्रा से पहले देवभूमि से संबंधित कथा -कहानी पड़-सुन कर आता है। वे इन गलत तथ्यों पर खूब हंस रहे हैं।
पर धर्म के नाम पर हर काम करने वाली सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर क्यों उत्तराखंड को अज्ञानी – कुपण्डित्य वाले राज्य की श्रेणी में रखने को आतुर है ये भी एक रहस्य है।
एक कष्ठ – हम केदारनाथ में या बाबा से संबंधित मामलों में विवाद या प्रचार नही चाहते । पर क्या करें, इस शो का विरोध नही करते तो आप और आने वाली पीढ़ियां पूछती उस दिन किस भय से आपके ओंठ सिल गए थे।
बाकी बाबा का काम बाबा जाने, उनसे मजाक करने वाले, उनका किसी भी रूप में अनावश्यक प्रयोग करने वाले आधे निपट लिए – आधे निपट जाएंगे।

मनोज रावत,
विधायक, केदारनाथ,
उत्तराखंड।.

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